आधी आबादी बनाम आधी सोच : सदन में ठहरा न्याय, आखिर क्यों अटका ‘नारी शक्ति’ का सपना..?
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आधी आबादी बनाम आधी सोच : सदन में ठहरा न्याय, आखिर क्यों अटका ‘नारी शक्ति’ का सपना..?

नारी शक्ति वंदन अधिनियम संसद में पास न हो सका। जानिए क्यों अटका महिला आरक्षण बिल, किसकी रणनीति भारी पड़ी और महिलाओं के अधिकारों पर इसका क्या असर होगा।

Written byप्रणय विक्रम सिंहप्रणय विक्रम सिंह
Apr 18, 2026, 05:50 pm IST
inभारत, मत अभिमत

लोकतंत्र केवल बहुमत का खेल नहीं, वह मूल्य और मर्यादा का विधान भी है। और जब वही लोकतंत्र उस प्रस्ताव के सामने ठहर जाए, जो आधी आबादी को निर्णय के केंद्र में स्थापित करने का साहस रखता हो, तब प्रश्न केवल एक विधेयक का नहीं, उस सोच का होता है, जो परिवर्तन से कतराती है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम और राजनीतिक मानसिकता

‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के लिए आवश्यक संविधान संशोधन बिल का सदन में पारित न हो पाना एक राजनीतिक घटना भर नहीं है, यह उस मानसिकता का अनावरण है, जो नारी के सम्मान की बातें तो करती है, पर उसे सत्ता-संरचना में वास्तविक स्थान देने से हिचकती है।

भारतीय परंपरा में नारी की भूमिका

भारतीय संस्कृति में नारी केवल शक्ति नहीं, बल्कि ‘मेधा’ और ‘लोक-मंगल’ की अधिष्ठात्री रही है। यह वही भूमि है जहां गार्गी प्रश्न करती हैं, मैत्रेयी ज्ञान को सर्वोपरि मानती हैं और द्रौपदी सत्ता से धर्म का उत्तर मांगती है। ऐसे देश में नारी के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सीमित रखना केवल विरोधाभास नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विस्मरण है। ‘नारी वंदन अधिनियम’ उसी सनातन संस्कार का आधुनिक संसदीय रूप था, जहां परंपरा नीति में रूपांतरित होती और श्रद्धा व्यवस्था में प्रतिष्ठित होती।

सरकार की पहल और व्यापक दृष्टि

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह केवल एक राजनीतिक पहल नहीं थी, बल्कि एक व्यापक दृष्टि का विस्तार थी, ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का स्वाभाविक उत्कर्ष, जिसमें नारी केवल सहभागी नहीं, बल्कि सह-निर्माता बनती है। जनधन, उज्ज्वला, शौचालय, मातृत्व सुरक्षा और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से जो आधार निर्मित हुआ, वही इस अधिनियम में अपनी तार्किक परिणति पाता।

संसद में विधेयक का ठहरना

परंतु संसद में जो हुआ, वह केवल एक विधेयक का रुकना नहीं है, यह भारत की वैचारिक परंपरा के साथ एक विचलन का क्षण है।

मतों की कमी से अधूरा रह गया ऐतिहासिक अवसर

ज्ञातव्य है कि महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत, अर्थात 352 मतों की आवश्यकता थी। किंतु इसके पक्ष में मात्र 298 मत ही प्राप्त हो सके, जबकि 230 सांसदों ने इसका विरोध किया और इसी के साथ यह ऐतिहासिक अवसर अधूरा रह गया।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और बयान

इसी संदर्भ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे ‘भारत माता के सम्मान पर आघात’ बताया, वहीं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने तीखा प्रश्न उठाया कि देश की आधी आबादी लगभग 70 करोड़ महिलाओं को अधिकार से वंचित कर कोई कैसे विजय का उत्सव मना सकता है? किंतु विडंबना यह है कि ऐसा हो भी रहा है।

राजनीति का चरित्र और विडंबना

यही वह विडंबना है, जहां राजनीति का चरित्र स्पष्ट होता है। अधिकारों के प्रश्न पर भी तर्क नहीं, तरकीबें हावी हो जाती हैं।

राहुल गांधी के तर्क और कांग्रेस की भूमिका

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के तर्क न केवल विरोधाभासी थे, बल्कि वे इस मूल प्रश्न से भी विमुख दिखाई दिए कि क्या नारी को समान प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए या नहीं। वैसे भी मातृशक्ति को अधिकार देने के मामलों में कांग्रेस हमेशा पीछे हटी है। शाहबानो मामले में पीछे हटी, ट्रिपल तलाक में पीछे हटी और अब महिला आरक्षण में भी पीछे हट गई।

अखिलेश यादव और आरक्षण पर विवाद

वहीं समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने तुष्टीकरण की एक नई रेखा खींचते हुए महिला आरक्षण के भीतर अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए पृथक कोटा की मांग कर दी। यह मांग न केवल व्यावहारिक दृष्टि से असंगत है, बल्कि सिद्धांततः भी संविधान की मूल भावना के प्रतिकूल है। भारतीय संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता है।

सपा का रुख और परिसीमन की राजनीति

वैसे महिला आरक्षण बिल का विरोध सपा के लिए कोई नया नहीं है। मुलायम सिंह यादव ने भी हमेशा इसका विरोध किया था। सपा प्रमुख अखिलेश ने भी अपनी उसी विरासत को आगे बढ़ाया है। दास्तान सिर्फ इतनी नहीं है, अखिलेश यादव के विरोध के पीछे एक बड़ा कारण परिसीमन भी माना जा रहा है।

परिसीमन और शक्ति संतुलन

प्रस्ताव के लागू होने के बाद यदि परिसीमन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है और उत्तर प्रदेश की संसदीय संरचना में परिवर्तन होता है, तो शक्ति-संतुलन का पूरा समीकरण बदल सकता है। स्वाभाविक है कि ऐसे परिवर्तन उन दलों के लिए असहजता का कारण बनते हैं, जिनकी राजनीति स्थापित समीकरणों पर टिकी रही है।

सामाजिक न्याय बनाम महिला प्रतिनिधित्व

यहीं एक बात और साफ हो जाती है कि समाजवादी पार्टी के ‘सामाजिक न्याय’ की परिकल्पना में ‘महिला प्रतिनिधित्व’ अभी भी हाशिए पर ही है।

महान नेताओं के अधूरे स्वप्न

संसद में केवल एक प्रस्ताव नहीं ठहरा… ठहर गया डॉ. भीमराव आंबेडकर का वह संवैधानिक स्वप्न, जिसमें समानता केवल शब्द नहीं, अधिकार थी। डॉ. राम मनोहर लोहिया का वह सामाजिक संघर्ष ठहर गया, जो स्त्री-पुरुष समानता को लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त मानता था। जयप्रकाश नारायण का वह लोकनैतिक आग्रह ठहर गया, जिसमें सत्ता को समाज के प्रति उत्तरदायी होना था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की वह कल्पना भी ठहर गई, जिसमें नारी को नैतिक नेतृत्व का केंद्र माना गया था। और यह केवल उत्तर भारत की चेतना नहीं थी, दक्षिण की धरती पर सावित्रीबाई फुले के संघर्ष से लेकर पेरियार के सामाजिक विद्रोह तक, नारायण गुरु के समता संदेश से लेकर किट्टूर रानी चेनम्मा के साहस तक, हर धारा ने नारी को केवल सहायक नहीं, बल्कि परिवर्तन का अग्रदूत माना। वे सब हार गए क्योंकि उनका मूल विश्वास यही था कि लोकतंत्र तब तक अधूरा है, जब तक उसमें नारी की पूर्ण भागीदारी सुनिश्चित न हो।

विपक्ष पर आरोप और राजनीतिक विश्लेषण

दुर्भाग्य यह रहा कि विपक्ष ने इस ऐतिहासिक अवसर को अपनी संकीर्ण राजनीति की भेंट चढ़ा दिया। जिस विषय पर राष्ट्र एकमत हो सकता था, वहां विरोध केवल असहमति नहीं, बल्कि उस परिवर्तन के प्रति भय का संकेत है, जो स्थापित समीकरणों को तोड़ देता है। यह विरोध तर्क का नहीं, सत्ता के संरक्षण का था।

महाभारत का संदर्भ और मौन की जिम्मेदारी

यह दृश्य अनायास ही महाभारत की उस सभा की स्मृति जगा देता है जहां द्रौपदी प्रश्न कर रही थी और सत्ता मौन थी। उस दिन केवल दुशासन दोषी नहीं था, वह मौन भी दोषी था, जिसने अन्याय को होने दिया। आज भी प्रश्न वही है… क्या हम फिर उसी मौन के सहभागी बन रहे हैं?

लोकतंत्र और महिलाओं की उम्मीदें

यह केवल विधेयक का गिरना नहीं था, यह उस अवसर का चूकना था, जहां भारतीय लोकतंत्र स्वयं को और अधिक समावेशी और संतुलित बना सकता था। यह उस विश्वास पर आघात था, जो करोड़ों महिलाओं ने इस आशा के साथ जोड़ा था कि अब उनकी आवाज निर्णयों में दिखाई देगी।

संघर्ष जारी रहेगा

परंतु इतिहास साक्षी है कि भारत में नारी कभी पराजित नहीं होती। प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय जनता पार्टी ने इस विषय को जिस स्पष्टता और दृढ़ता से उठाया है, वह यह सिद्ध करता है कि यह संघर्ष रुकने वाला नहीं है। क्योंकि यह किसी दल का नहीं, भारत की आत्मा का प्रश्न है।

राजनीतिक परिणाम और जनआंदोलन

अब प्रश्न है कि इस संशोधन अधिनियम की सियासी बिसात पर कौन जीता? विपक्ष भले ही अपनी जीत का जश्न मना रहा हो किंतु इस बिसात पर चित और पट दोनों ही पक्ष भाजपा के साथ दिखाई देते हैं। ध्यातव्य है कि यदि विधेयक लोकसभा में पारित हो जाता, तो यह नारी सशक्तीकरण की ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में भाजपा के खाते में जाता और अब जब यह ठहर गया है, तब विपक्ष का नारी विरोधी चरित्र उजागर हो गया है। पार्टी ने इस मुद्दे को तुरंत जनआंदोलन का रूप देते हुए अपनी महिला सांसदों को आगे किया है, धरना-प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं और विपक्ष पर सीधे हमले तेज़ हो गए हैं। यह मुद्दा भावनात्मक हो गया है। आधी आबादी की संसद से सड़क तक पीड़ा दिखने लगी है। स्थिति यह है कि विपक्ष, विधेयक को रोककर भी सहज नहीं है। उसके नेता भले ही अपनी ‘रणनीतिक जीत’ पर संतोष व्यक्त कर रहे हों, लेकिन जनमानस में उठ रहे प्रश्न और भाजपा की आक्रामक रणनीति ने उन्हें रक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा किया है।

विपक्ष के दोहरे रवैये पर सवाल

आश्चर्य होता है कि लोकसभा चुनाव के समय जो दल ‘संविधान बचाने’ की दुहाई दे रहे थे, उन्होंने ही डॉ. आंबेडकर के संवैधानिक स्वप्न (समानता) का गला घोंटा है। विपक्ष का असाधारण दोहरापन एक बार फिर बेनकाब हो गया।

ऐतिहासिक संदर्भ और वर्तमान क्षण

विदित हो कि जब-जब इतिहास ने कठिन प्रश्न खड़े किए हैं, तब-तब इसी परंपरा ने उत्तर दिया है। धारा 370 का अंत हो, 35A का निष्कासन, अयोध्या में श्रीराम मंदिर का स्वप्न साकार होना या CAA जैसा साहसिक निर्णय… हर बार असंभव को संभव करने का संकल्प इसी विचारधारा ने निभाया है।

समाज आगे बढ़ चुका है

अब पुनः वही क्षण है। आधी आबादी को नेतृत्व में भागीदारी अब केवल एक विधेयक का प्रश्न नहीं रहा, यह राष्ट्रव्यापी जनचेतना का विषय बन चुका है। सदन भले ठहर गया हो… पर समाज चल पड़ा है।

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प्रणय विक्रम सिंह
प्रणय विक्रम सिंह
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विगत डेढ़ दशक से समाज और राजनीति से जुड़े विविध विषयों पर निरंतर, गंभीर और विमर्श प्रधान लेखन कर रहे हैं। [Read more]
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