बांग्लादेश : हादी के जनाजे में भारत विरोधी प्रदर्शन, संसद में घुसी उन्मादी भीड़, कट्टरपंथ का दिखा जुलूस
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बांग्लादेश : हादी के जनाजे में भारत विरोधी प्रदर्शन, संसद में घुसी उन्मादी भीड़, कट्टरपंथ का दिखा जुलूस

बांग्लादेश में शरीफ उस्मान हादी के जनाजे की आड़ में भारत-विरोधी प्रदर्शन व नारों और संसद में कट्टरपंथी घुसपैठ ने क्षेत्रीय स्थिरता पर खतरा बढ़ाया। अधिक जानकारी के लिए पढ़े पूरी रिपोर्ट....

Written byShivam DixitShivam Dixit
Dec 20, 2025, 11:26 pm IST
in विश्व

बांग्लादेश के शरीफ उस्मान हादी का शव सुपुर्दे खाक कर दिया गया, लेकिन उसकी अंतिम विदाई शांति नहीं बल्कि भारत विरोधी नारेबाजी और कट्टरपंथी उन्माद की गवाही बन गई। जनाजे की नमाज हादी के बड़े भाई अबू बकर ने पढ़ाई। इस दौरान हजारों की भीड़ ने खुलेआम हिंदुस्तान के खिलाफ नारे लगाए और कहा कि “हादी का खून बेकार नहीं जाएगा।”

संसद पर हमला, दूसरी बड़ी घटना

बता दें कि हादी के जनाजे के बाद हालात बेकाबू हो गए। हजारों कट्टरपंथी प्रदर्शनकारी मजहबी और भारत विरोधी नारे लगते हुए संसद भवन में दाखिल हो गए और जमकर तोड़फोड़ की। यह शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद दूसरी बार था जब दंगाइयों की मजहबी भीड़ ने बांग्लादेश संसद को निशाना बनाया।

यह भी पढ़ें – अस्थिर बांग्लादेश में ISIS की एंट्री!: खुलेआम लहराए गए आतंकी झंडे, क्या है मोहम्मद युनुस का मौन समर्थन?

प्रदर्शनकारियों ने संसद परिसर में जमकर उत्पात मचाया, जबकि वहां पहले से मौजूद पुलिस और सेना मूक दर्शक बनी नजर आई।

कड़ी सुरक्षा के बावजूद नाकाम व्यवस्था

हालांकि दिखाने को तो अधिकारियों ने पहले से ही कड़े सुरक्षा इंतजाम करने के दावे किए थे। ढाका में बॉडी कैमरों से लैस पुलिस बल, बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश और अतिरिक्त सुरक्षा टुकड़ियां भी तैनात थीं। साथ ही एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया था और सरकारी-निजी संस्थानों में बांग्लादेश का झंडा आधा झुका रहा।

लेकिन जब हादी के जनाजे में शामिल उग्र भीड़ ने संसद का रुख किया तो उसे न तो संसद में घुसने से रोका गया, न ही हिंसा से। जिसके बाद स्पष्ट रूप से सवाल खड़ा होता है कि क्या बांग्लादेश में कट्टरपंथी तत्वों को अंतरिम सरकार का मौन समर्थन मिल रहा है..?

ढाका यूनिवर्सिटी से कब्र तक, शक्ति प्रदर्शन में बदला जनाजा

बता दे कि हादी का शव सिंगापुर से लाए जाने के बाद कड़ी सुरक्षा में ढाका यूनिवर्सिटी कैंपस ले जाया गया। जहां पूरी रात अंतिम संस्कार की तैयारियों पर चर्चा होती रही। इसके बाद उसकी कब्र राष्ट्रीय कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम के मकबरे के पास बनाई गई।

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लेकिन जब जनाजा निकला तो अंतिम विदाई के नाम पर यह पूरा आयोजन मजहबी शक्ति प्रदर्शन और कट्टरपंथी विचारधारा के मंच में बदल गया।

नेशनल चुनाव से पहले और बिगड़े हालात

बता दें कि हादी की हत्या ने पहले से बांग्लादेश के अस्थिर राजनीतिक माहौल को और विस्फोटक बना दिया है। राष्ट्रीय चुनाव से पहले इस तरह की हिंसा और संसद पर हमला यह दिखाता है कि बांग्लादेश किस तेजी से अराजकता की ओर बढ़ रहा है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि हादी की मौत के बाद कट्टरपंथी उसे एक शहादत के प्रतीक के रूप में भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं।

हिंदू समुदाय पर बढ़ती हिंसा

वहीं हादी की मौत के बाद बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक समुदाय पर हमले तेज हो गए हैं। कट्टरपंथी भीड़ देश के आंतरिक मामलों के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराते हुए हिंदुओं को निशाना बना रही है। हाल ही में दीपू दास नामक युवक को मजहबी भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला गया और उसे पेड़ से बांधकर जला दिया। इसके आलावा हिंदुओं के घरों में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं भी लगातार सामने आ रही हैं।

यह भी पढ़ें – कट्टरपंथ की आग में जलता बांग्लादेश! निशाने पर मीडिया, हिंदू और नेता, मानवाधिकार संगठनों की चुप्पी पर भी उठे सवाल?

वैश्विक दखल से ठोस कदम उठाने का समय

बता दें कि शरीफ उस्मान हादी का जनाजा सिर्फ एक अंतिम विदाई नहीं था, बल्कि वह बांग्लादेश में बढ़ते कट्टरपंथ, संसद पर हमले और अल्पसंख्यक असुरक्षा का प्रतीक बन गया। यदि समय रहते वैश्विक दखल देकर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह हिंसा और उग्रता बांग्लादेश के साथ-साथ पूरे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकती है।

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Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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