बांग्लादेश के शरीफ उस्मान हादी का शव सुपुर्दे खाक कर दिया गया, लेकिन उसकी अंतिम विदाई शांति नहीं बल्कि भारत विरोधी नारेबाजी और कट्टरपंथी उन्माद की गवाही बन गई। जनाजे की नमाज हादी के बड़े भाई अबू बकर ने पढ़ाई। इस दौरान हजारों की भीड़ ने खुलेआम हिंदुस्तान के खिलाफ नारे लगाए और कहा कि “हादी का खून बेकार नहीं जाएगा।”
संसद पर हमला, दूसरी बड़ी घटना
बता दें कि हादी के जनाजे के बाद हालात बेकाबू हो गए। हजारों कट्टरपंथी प्रदर्शनकारी मजहबी और भारत विरोधी नारे लगते हुए संसद भवन में दाखिल हो गए और जमकर तोड़फोड़ की। यह शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद दूसरी बार था जब दंगाइयों की मजहबी भीड़ ने बांग्लादेश संसद को निशाना बनाया।
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प्रदर्शनकारियों ने संसद परिसर में जमकर उत्पात मचाया, जबकि वहां पहले से मौजूद पुलिस और सेना मूक दर्शक बनी नजर आई।
कड़ी सुरक्षा के बावजूद नाकाम व्यवस्था
हालांकि दिखाने को तो अधिकारियों ने पहले से ही कड़े सुरक्षा इंतजाम करने के दावे किए थे। ढाका में बॉडी कैमरों से लैस पुलिस बल, बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश और अतिरिक्त सुरक्षा टुकड़ियां भी तैनात थीं। साथ ही एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया था और सरकारी-निजी संस्थानों में बांग्लादेश का झंडा आधा झुका रहा।
लेकिन जब हादी के जनाजे में शामिल उग्र भीड़ ने संसद का रुख किया तो उसे न तो संसद में घुसने से रोका गया, न ही हिंसा से। जिसके बाद स्पष्ट रूप से सवाल खड़ा होता है कि क्या बांग्लादेश में कट्टरपंथी तत्वों को अंतरिम सरकार का मौन समर्थन मिल रहा है..?
ढाका यूनिवर्सिटी से कब्र तक, शक्ति प्रदर्शन में बदला जनाजा
बता दे कि हादी का शव सिंगापुर से लाए जाने के बाद कड़ी सुरक्षा में ढाका यूनिवर्सिटी कैंपस ले जाया गया। जहां पूरी रात अंतिम संस्कार की तैयारियों पर चर्चा होती रही। इसके बाद उसकी कब्र राष्ट्रीय कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम के मकबरे के पास बनाई गई।
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लेकिन जब जनाजा निकला तो अंतिम विदाई के नाम पर यह पूरा आयोजन मजहबी शक्ति प्रदर्शन और कट्टरपंथी विचारधारा के मंच में बदल गया।
नेशनल चुनाव से पहले और बिगड़े हालात
बता दें कि हादी की हत्या ने पहले से बांग्लादेश के अस्थिर राजनीतिक माहौल को और विस्फोटक बना दिया है। राष्ट्रीय चुनाव से पहले इस तरह की हिंसा और संसद पर हमला यह दिखाता है कि बांग्लादेश किस तेजी से अराजकता की ओर बढ़ रहा है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि हादी की मौत के बाद कट्टरपंथी उसे एक शहादत के प्रतीक के रूप में भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं।
हिंदू समुदाय पर बढ़ती हिंसा
वहीं हादी की मौत के बाद बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक समुदाय पर हमले तेज हो गए हैं। कट्टरपंथी भीड़ देश के आंतरिक मामलों के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराते हुए हिंदुओं को निशाना बना रही है। हाल ही में दीपू दास नामक युवक को मजहबी भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला गया और उसे पेड़ से बांधकर जला दिया। इसके आलावा हिंदुओं के घरों में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं भी लगातार सामने आ रही हैं।
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वैश्विक दखल से ठोस कदम उठाने का समय
बता दें कि शरीफ उस्मान हादी का जनाजा सिर्फ एक अंतिम विदाई नहीं था, बल्कि वह बांग्लादेश में बढ़ते कट्टरपंथ, संसद पर हमले और अल्पसंख्यक असुरक्षा का प्रतीक बन गया। यदि समय रहते वैश्विक दखल देकर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह हिंसा और उग्रता बांग्लादेश के साथ-साथ पूरे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकती है।

















