राष्ट्र कोई धर्मशाला नहीं: मोदी-ट्रंप ने तोड़ा वैश्विक नैतिक पाखंड का जाल
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राष्ट्र कोई धर्मशाला नहीं: मोदी-ट्रंप ने तोड़ा वैश्विक नैतिक पाखंड का जाल

मोदी और ट्रंप की साझा नीतियाँ—सीमाओं की रक्षा, अपराधियों का उन्मूलन और संप्रभुता की मजबूती—वैश्विक व्यवस्था के लिए चुनौती हैं। सच्चाई का उजागर ही सबसे बड़ा डर है, जो वोक और सेक्युलर वर्ग को घबराहट में डाल रहा है।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Feb 5, 2026, 02:17 pm IST
inविश्लेषण
PM Modi and Donald Trump

PM Modi and Donald Trump

नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप का एक मंच पर आना उस वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था के लिए एक ऐसी चुनौती है, जिसे अब और अनदेखा नहीं किया जा सकता, जो वर्षों से अपने नैतिक पतन के साथ समझौता करती आ रही थी। राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा और आपराधिक, आतंकवादी तथा नैतिक रूप से विकृत तत्वों को हटाने पर उनका ज़ोर कोई तानाशाही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्म-रक्षा का कार्य है-ऐसे समय में जब संप्रभुता को ही पुराना और असहज विचार बताया जा रहा है।

जिस बात से तथाकथित वोक, सेक्युलर और लिबरल वर्ग सबसे अधिक घबराता है, वह नीतियां नहीं, बल्कि सच्चाई का उजागर होना है। जब सीमाएं जानबूझकर कमजोर की गईं, तब उस खाली जगह में ड्रग माफिया, कट्टरपंथी विचारधाराएं, संगठित अपराध और यौन अपराधी चुपचाप घुसते चले गए और आज वही तत्व संस्थागत संरक्षण, सहानुभूति या रणनीतिक चुप्पी का लाभ उठा रहे हैं। यह घुसपैठ अचानक नहीं हुई। यह विश्वविद्यालयों, अदालतों, मीडिया और नौकरशाही के माध्यम से धीरे-धीरे हुई-जहां अपराधियों को पीड़ित के रूप में और कानून का पालन करने वालों को असहिष्णु के रूप में प्रस्तुत किया गया। समावेशिता के नाम पर वास्तविक नागरिकों को हाशिये पर डाल दिया गया।

सत्ता के गलियारों में दिख रहा परिणाम

आज इसके परिणाम सत्ता के गलियारों में साफ दिखाई देते हैं। नीतियां जो डर से जमी हुई हैं। सीमाएं जिन्हें नैतिक बोझ समझा जाता है। आपराधिक इतिहास जिन्हें “परिस्थितियाँ” कहकर टाल दिया जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा जिसे बहस का विषय बना दिया गया है, कर्तव्य का नहीं।

राष्ट्र कोई धर्मशाला नहीं

मोदी और ट्रम्प ने इस पाखंड को उजागर किया-यह कहकर कि राष्ट्र कोई धर्मशाला नहीं होता, बिना दंड की करुणा अराजकता को जन्म देती है, और कानून के बिना बहुसंस्कृतिवाद अंततः जनजातीय संघर्ष में बदल जाता है। इसी कारण उन्हें राक्षसीकरण का शिकार बनाया गया।

इतिहास उन समाजों को माफ नहीं करता जो सहिष्णुता और आत्मसमर्पण में फर्क भूल जाते हैं। सभ्यताएँ केवल आक्रमण से नहीं गिरतीं—वे तब गिरती हैं जब अपराधी नैतिकता को फिर से परिभाषित कर सत्ता में प्रवेश कर लेते हैं। यह अब वाम और दक्षिण की बहस नहीं है। यह अस्तित्व बनाम विनाश का प्रश्न है। सीमाएँ घृणा की रेखाएँ नहीं—ज़िम्मेदारी की रेखाएँ हैं। और जो नेता उन्हें सुरक्षित रखते हैं, वे खलनायक नहीं, इतिहास की अंतिम ढाल हैं।

किसी भी व्यापारिक समझौते को अंततः तभी अंतिम रूप दिया जाता है जब दोनों पक्ष उसमें अपने-अपने लिए स्पष्ट और ठोस लाभ देखते हैं। वार्ताओं के दौरान कई बार कुछ प्रावधान जानबूझकर लचीले छोड़े जाते हैं ताकि दोनों पक्ष अपने-अपने देश में इस समझौते को इस तरह प्रस्तुत कर सकें कि वह अचानक लिए गए यू-टर्न जैसा न लगे। कूटनीति अक्सर आर्थिक वास्तविकताओं और राजनीतिक छवि के बीच संतुलन बनाने की कला होती है। जहाँ तक ऊर्जा सहयोग से जुड़ी चिंताओं का प्रश्न है, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ और ऊर्जा साझेदारियाँ इतनी जटिल होती हैं कि उन्हें रातों-रात बदला नहीं जा सकता। देश आमतौर पर अपने स्रोतों में धीरे-धीरे विविधता लाते हैं, और इस प्रक्रिया में रणनीतिक, आर्थिक तथा भू-राजनीतिक कारकों को ध्यान में रखते हैं। दीर्घकालिक बुनियादी ढाँचे की परियोजनाएँ—चाहे वे ऊर्जा गलियारे हों, परिवहन संपर्क हों या नई कनेक्टिविटी योजनाएँ—यह दर्शाती हैं कि वैश्विक शक्तियाँ व्यवहारिकता के आधार पर लगातार नए समीकरण तलाशती रहती हैं, न कि केवल बयानबाज़ी के आधार पर।

राजनीतिक बयानबाज़ी अक्सर आर्थिक वास्तविकताओं को सरल बनाकर पेश करती है। किसी अर्थव्यवस्था को “समाप्त” घोषित कर देना या किसी सरकार के पतन की भविष्यवाणी करना, अक्सर वास्तविक बाजार आँकड़ों और मतदाताओं की धारणा के सामने टिक नहीं पाता। किसी भी देश की आर्थिक मजबूती का निर्धारण राजनीतिक टिप्पणियों से नहीं, बल्कि निरंतर विकास, निवेश के माहौल, उपभोक्ता मांग और वैश्विक साझेदारियों से होता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि अमेरिकी बाजार आज भी दुनिया के सबसे लाभकारी और प्रतिस्पर्धी बाजारों में से एक बना हुआ है, और चीन, यूरोप तथा भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद उसके साथ व्यवहारिक रूप से जुड़ी रहती हैं। कोई भी गंभीर अर्थव्यवस्था उन बाजारों से स्वयं को अलग नहीं करती जो विकास और अवसर प्रदान करते हों। इसलिए धैर्य आवश्यक है। बड़े अंतरराष्ट्रीय समझौते चरणबद्ध तरीके से सामने आते हैं, और उनके वास्तविक प्रभाव समय के साथ ही स्पष्ट होते हैं। आर्थिक कूटनीति एक लंबी प्रक्रिया है, और उसका मूल्यांकन अटकलों से नहीं, बल्कि परिणामों से किया जाता है।

अंततः स्थिरता, रणनीतिक धैर्य और आर्थिक व्यवहारिकता ही राजनीतिक शोर-शराबे पर भारी पड़ती है।

Topics: राष्ट्रीय सुरक्षाराष्ट्र धर्मशाला नहींड्रग माफियाट्रंप मोदी व्यापार डीलdrug mafiaguesthouseNational securityeconomic agreementsपाञ्चजन्य विशेषकट्टरपंथsovereigntyExtremismModiमोदी ट्रंपtrumpसंप्रभुताnationTrump-Modi trade deal
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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