महिला खतना, जिसमें महिलाओं के यौनांग की ऊपरी परत को हल्का सा काट दिया जाता है। बाहरी जननांगों को पूरी तरह या फिर उसके हिस्से को काट दिया जाता है। महिला बाहरी जननांगों में क्लिटोरिस (महिला जननांगों पर एक छोटी सी गांठ जो यौन उत्तेजना के प्रति संवेदनशील होती है), लेबिया (मांसल सिलवटों या ऊतक के होंठ जो जननांग अंगों को घेरते हैं और उनकी रक्षा करते हैं), और हाइमन (एक पतली झिल्ली जो योनि के मुख को ढकती है) शामिल हैं।
शारीरिक और मानसिक पीड़ा
जिन महिलाओं को इस प्रक्रिया से होकर गुजरना होता है, उनकी पीड़ा की कोई थाह ही नहीं है। शारीरिक और मानसिक दोनों ही पीड़ाएं इस पूरी प्रक्रिया के साथ जुड़ी हैं। साथ ही महिला को जो पूरी ज़िंदगी दर्द का सामना करना होता है, वह अलग।
वैश्विक संगठनों की निंदा
इस पूरी प्रक्रिया को विश्व स्वास्थ्य संगठन और अधिकतर पश्चिमी जगत ने गलत बताया है। समय समय पर निंदा और आलोचना की है। यूनिसेफ ने भी इसकी यह कहते हुए आलोचना की है कि यह महिलाओं और लड़कियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है।
पीड़िताओं की दर्दनाक कहानियां
और जहां पर यह प्रचलित है, वहाँ पर इसकी पीड़ित लड़कियों ने भी अथाह दर्द की कहानी को साझा किया है। मगर क्या कोई कल्पना कर सकता है कि इस सीमा तक अमानवीय रिवाज का कोई मेडिकल जर्नल बचाव भी कर सकता है और इसे महज एक प्रक्रिया बता सकता है?
ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित विवादित निबंध
परंतु ऐसा हुआ है और ऐसा हुआ है ब्रिटेन के एक मेडिकल जर्नल में। और कथित अकडेमिक्स ने इस शोधपत्र में इस अमानवीय रिवाज को केवल रक्षा ही प्रदान नहीं की है, बल्कि उन्होंने इसे अल्पसंख्यक समुदाय की पहचान के साथ इसे जोड़ दिया है। इसका शीर्षक है “Harms of the current global anti-FGM campaign”।
ब्रिटिश यूनिवर्सिटीज से 25 अकडेमिक्स के एक समूह ने एक essay में यह कहा है कि वे कानून जो महिला खतना पर प्रतिबंध लगाते हैं, वे अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति हानिकारक और घृणा से भरा हुआ कलंक पैदा करते हैं।
जीबी न्यूज के अनुसार ब्रिटीस मेडिकल जर्नल के जर्नल ऑफ मेडिकल एथिक्स में प्रकाशित इस निबंध में यह कहा गया है कि महिला खतने का जो भी विरोध होता है, वह केवल सनसनी फैलाने वाले नैरेटिव्स और कट्टरपंथी स्टीरियोटाइप पर आधारित विरोध है।
अमेरिका और ब्रिटेन के शिक्षाविदों की भागीदारी
और इस निबंध में योगदान करने वाले लोग ब्रिटेन की ही नहीं बल्कि अमेरिका की यूनिवर्सिटीज से भी जुड़े हैं। यह बहुत हैरान करने वाली बात है कि महिलाओं के प्रति इस सीमा तक दर्दनाक रिवाज के प्रति नैरेटिव को लेकर कोमलता कथित पढे लिखे लोगों द्वारा क्यों दिखाई जा रही है?
पुरुष खतना से तुलना
जो कथित शिक्षाविद इस निबंध के साथ जुड़े हैं, उनका कहना यह है कि पुरुष खतने को लेकर इतना शोर क्यों नहीं मचाया जाता है? इसमें यह भी लिखा है कि जो आलोचनाएं होती हैं, उनका आधार केवल अफवाहें होती हैं, न कि सच्चाई। लेखकों का कहना है कि ऐसा केवल अनुमान लगाया जाता है कि खतना पीड़ित लड़कियां ट्रॉमा में जाती हैं।
ट्रॉमा को नकारने का तर्क
उन्होनें तर्क दिया कि “कई प्रभावित महिलाएं अपने आप शायद ही “ट्रॉमा” शब्द का प्रयोग करती हैं। यदि वे इस प्रक्रिया को लेकर अपने नकारात्मक अनुभव व्यक्त करती भी हैं तो वे इसे दर्द से भरा हुआ या कठिन बताती हैं।“ लेखकों ने मीडिया को महिला खतना को खलनायक बनाए जाने के लिए जिम्मेदार ठहराया। इनका कहना है कि अफ्रीका में भी जो हो रहा है, उसे भी केवल उनकी दृष्टि से दिखाया गया, जो इसका विरोध करते हैं।
अन्य कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं से तुलना
इस निबंध के लेखकों ने इसे उन कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं के समानांतर रखा है, जो अमेरिका और यूरोप में लड़कियों के बीच लोकप्रिय हो रही हैं। इसमें लिखा है कि ये कुछ ऐसी प्रक्रियाओं के समान है, जैसे कि उत्तरी अमेरिका और ब्रिटेन के कुछ देशों में लड़कियां करवा रही हैं, जैसे कि डिजाइनर वजाइना!
महिलाओं की पीड़ा को अनदेखा करना
इस निबंध में इस रिवाज की पीड़ित महिलाओं की पीड़ा को अनदेखा करके केवल और केवल इस बात पर बल दिया गया है कि कैसे इसके विरोध के बहाने मुस्लिमों को निशाना बनाया जा रहा है। इसमें लेखकों का कहना है कि यह अभिभावकों पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि वे अपने बच्चों के साथ क्या कराना चाहते हैं और राज्य को तब तक ऐसी भी भी रवायत से दूर रहना चाहिए, जब तक कि वे गंभीर नुकसान नहीं पहुंचा रही हैं।
इस पेपर को लेकर आलोचना तेज
इस पेपर को लेकर सोशल मीडिया पर आलोचना के स्वर तेज हो गए हैं और साथ ही राजनीतिक हलकों में भी इसकी आलोचना हो रही है। शैडो इक्वालिटीज मिनिस्टर क्लेयर कुटिनहो ने इस पेपर की तीखी आलोचना की।
क्लेयर कुटिनहो का बयान
उन्होनें कहा कि यह एक गंभीर कृत्य है और हमें इसे खतना ही कहना चाहिए। यह किसी की भी सोच से परे है कि कोई मेडिकल पेशे का व्यक्ति उस कठोर सच्चाई के प्रति विनम्र हो जाएगा, जो कई छोटी लड़कियां “डाइवर्सिटी” के नाम पर झेल रही हैं।
कार्यकर्ताओं और पीड़िताओं का आक्रोश
महिला खतना के विरोध में लड़ाई लड़ रहे कार्यकर्ता भी इसे लेकर काफी गुस्से में हैं। जो पीडिताऐं हैं, वे भी अपने अनुभव लिख रही हैं कि आखिर यह पीड़ा क्या होती है?
Alimatu Dimonekene का अनुभव
इसकी एक सर्वाइवर Alimatu Dimonekene MBE ने medium पर अपना अनुभव लिखा, जो पीड़ादायक था। उन्होनें लिखा कि महिला खतना का विरोध पश्चिमी अतिक्रमण नहीं हैं।
अफ्रीकी महिलाओं की दशकों लंबी लड़ाई
उन्होनें लिखा कि अफ्रीकी महिलाओं, दाइयों, कार्यकर्ताओं और सामुदायिक नेताओं ने इस रिवाज के प्रति दशकों तक लड़ाई लड़ी है।
महिलाओं के दर्द को अकादमिक रूप से नकारना
यह पेपर और कुछ नहीं अपितु कथित अल्पसंख्यक प्रेम के चलते उसी वर्ग की करोड़ों महिलाओं के दर्द को अकादमिक रूप से नकारना है। डीकालनिज़ैशन के नाम पर महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचारों को मानवीय जामा पहनाना है।
अमानवीय रिवाज को वैध ठहराने का प्रयास
यह अल्पसंख्यक प्रेम की आड़ में न केवल पीड़ित महिलाओं की पीड़ा को नकारना है, बल्कि एक अत्यंत दर्दनाक, एवं अमानवीय और यातनापूर्ण रिवाज को एक प्रकार से सही ठहराकर स्थापित कर देना है।

















