सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम याचिका पर सुनवाई शुरू कर दी है, जिसमें लड़कियों के खतने (फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन या FGM) पर पूरी तरह बैन की मांग की गई है। ये प्रथा खासकर दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में आम है, जहां इसे ‘खतना’ कहा जाता है। चेतना वेलफेयर सोसाइटी नाम की एक एनजीओ ने ये याचिका दायर की है। उनका कहना है कि ये न सिर्फ बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि POCSO एक्ट के तहत भी अपराध है। कोर्ट ने 29 नवंबर 2025 को केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर दिया, जिसमें जवाब मांगा गया है।
मजहबी रिवाज या बच्चों पर अत्याचार?
याचिकाकर्ताओं का तर्क साफ है – खतना इस्लाम का कोई जरूरी हिस्सा नहीं है। ये प्रथा लड़कियों के जननांगों के हिस्से को काटने या नुकसान पहुंचाने वाली है, जो WHO के मुताबिक महिलाओं और लड़कियों के मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। भारत में ये अक्सर नाबालिग लड़कियों पर किया जाता है, जिसमें बिना मेडिकल मदद के उनके प्राइवेट पार्ट्स को छुआ जाता है। POCSO एक्ट के सेक्शन 3 और 5 के तहत ये ‘पेनेट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट’ माना जा सकता है, क्योंकि इसमें नाबालिग के जननांगों को नुकसान पहुंचाया जाता है। एनजीओ का कहना है कि ये प्रथा लड़कियों को शारीरिक और मानसिक पीड़ा देती है, और इसे रोकने के लिए सख्त कानून बनना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने क्यों लिया संज्ञान?
जस्टिस बीवी नागरत्ना और आर महादेवन की बेंच ने याचिका को गंभीरता से लिया। उन्होंने केंद्र सरकार, स्वास्थ्य मंत्रालय और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस भेजा है। कोर्ट ने ये भी कहा कि जवाब जल्द से जल्द दाखिल किया जाए। पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने FGM पर चिंता जताई है। पूर्व चीफ जस्टिस बीआर गवई ने कहा था कि देश में बेटियों के संवैधानिक अधिकार होने के बावजूद ये प्रथा जारी है। कोर्ट शबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश, पारसी समुदाय की आदि यारी रस्म और अन्य धार्मिक स्थलों पर भेदभाव जैसे मुद्दों पर भी सुनवाई कर रहा है। इन सबमें महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों का सवाल जुड़ा है।
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प्रथा का रूप और कानूनी पेंच
खतना में लड़कियों के क्लिटोरिस या लेबिया के हिस्से को काटा जाता है। कुछ कट्टर मुस्लिम इसे शुद्धिकरण का तरीका मानते हैं, ताकि लड़की शादी के लायक बने। लेकिन भारत के कानून में ये अवैध है। दोषी पाए जाने पर 7 साल तक की सजा हो सकती है। कुछ डॉक्टर इसे प्लास्टिक सर्जरी के नाम पर करते हैं, लेकिन प्रथा धीरे-धीरे कम हो रही है। याचिकाकर्ता चाहते हैं कि केंद्र FGM को POCSO के दायरे में लाकर साफ कानून बनाए, ताकि ये पूरी तरह रुके। कोर्ट की अगली सुनवाई में ये साफ हो सकता है कि धार्मिक आजादी के नाम पर बच्चों के अधिकारों की अनदेखी कितनी जायज है।















