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‘दलित’ ईसाइयों का दर्द और चर्च

चर्च की निरंकुश व्यवस्था और भेदभावपूर्ण व्यवहार के विरुद्ध पीसीएलएम को संघर्ष करते गत दिनों 25 वर्ष पूरे हुए हैं। यह आंदोलन भारत के अनेक भागों में दलित ईसाइयों की पीड़ा को आवाज दे रहा

Written byPanchjanyaPanchjanya
Dec 15, 2025, 12:25 pm IST
in भारत, मत अभिमत

पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट (पीसीएलएम) ने चर्च व्यवस्था में अधिकारों के लिए संघर्ष के 25 साल पूरे किए हैं। उल्लेखनीय है कि 25 मार्च 2000 को देश के विभिन्न राज्यों से दिल्ली पहुंचे सैकड़ों दलित ईसाइयों ने मूवमेंट के संस्थापक आर.एल. फ्रांसिस के नेतृत्व में संसद मार्ग पर विरोध प्रदर्शन कर कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (सीबीसीआई) एवं चर्च नेतृत्व की दलित ईसाई विरोधी नीतियों और चर्च संरचना में उनके निरंतर शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाई थी। एकत्रित दलित ईसाई प्रतिनिधियों ने चर्च के भेदभावपूर्ण व्यवहार की कड़ी भर्त्सना करते हुए समान अधिकारों की मांग की थी।

शोषित, पीड़ित दलित ईसाई समुदाय की ओर से हुए उस विरोध प्रदर्शन ने आम जनता, प्रशासन और मीडिया का ध्यान तेजी से अपनी ओर आकर्षित किया था, क्योंकि उससे पूर्व चर्च नेतृत्व दलित ईसाइयों के साथ भेदभाव के आरोप सरकार पर मढ़ता आ रहा था। मूवमेंट की शुरुआत जल्दबाजी में अथवा किन्हीं तात्कालिक कारणों की वजह से नहीं की गई थी। इसके पीछे उन अनगिनत लाेगाें की पीड़ा थी, जो ईसाइयत अपना लेने के बाद भी चर्च व्यवस्था में शोषण के शिकार हो रहे थे और आज भी हो रहे हैं। अपनी स्थापना के बाद से विगत ढाई दशकों में पीसीएलएम ने अनेक सेमिनारों, नागरिक संवादों, धरना-प्रदर्शन, प्रेस वार्ताओं का आयोजन करके अपने आंदोलन को चहुंओर पहुंचाया है, अनेक रिपोर्ट और किताबों का प्रकाशन किया है।

आस्था गई, अधिकार गए

अब जनजातियां ही कर रहीं कन्वर्जन का विरोध

मूवमेंट ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात को पुरजोर तरीके से रखा है। कई कार्यकारी समूहों के साथ संवाद को आगे बढ़ाया है। 19 जून 2002 को मूवमेंट ने अपने संघर्ष की रूपरेखा ‘New Delhi Declaration, pclm model for development for dalit christians for the 21st century’ शीर्षक से जारी कर 10 प्रमुख मुद्दों की ओर सबका ध्यान आकर्षित किया था। दो दशकों से ज्यादा समय से मूवमेंट अपने इस घोषणा पत्र के तहत संघर्ष कर रहा है। इसने समाज के सामने आने वाली कठिन चुनौतियों का सामना करने के लिए अभिनव व्यावहारिक समाधानों की ओर अग्रसर, सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों और अवसरों का गहन अनुसंधान – विश्लेषण करने का प्रयास किया है। मूवमेंट का मत है कि भारतीय संविधान और इसकी बहुलतावादी संस्कृति के ढांचे के भीतर दलित ईसाइयों की समस्याओं को हल किया जाना चाहिए।

मूवमेंट को आज इस स्थिति तक पहुंचाने में अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का योगदान रहा है, जिनमें प्रमुख हैं, मेहरबान जेम्स, श्री पी.वी.लाेमियाे (उत्तर प्रदेश), फादर विलियम प्रेम दास चौधरी (दिल्ली कैथोलिक आर्कडायसिस), महेश पाठक (दिल्ली), साईं प्रसन्न (मुंबई, महाराष्ट्र), टी. याकूब एडवोकेट (नलगोंडा, तेलंगाना), पीटर नथानियल खालखो (झारखंड) और गाेवा मूल के गुजराती जेसुइट फादर एंथनी फर्नांडिस। इन और इन जैसे अन्य अनेक कार्यकर्ताओं ने चर्च की निरंकुश व्यवस्था में बदलाव के लिए मूवमेंट के साथ मिलकर संघर्ष किया। यह महज संयोग है कि जब वेटिकन और भारतीय कैथोलिक चर्च पूरे देश में अपना जयंती वर्ष मना रहा है, तो इसी वर्ष इस आंदोलन भी अपनी 25 साल की यात्रा पूरी की है।

आस्था गई, अधिकार गए

 

Topics: पाञ्चजन्य विशेषदलित ईसाई विरोधीपुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंटगुजराती जेसुइट फादर एंथनी फर्नांडिस
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