गत दिनों इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में कहा कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई, इस्लाम या किसी अन्य मत-पंथ को अपना लेता है, तो वह अपनी मूल जाति का दर्जा खो देता है। और इस प्रकार वह अनुसूचित जाति (एस.सी.) या अनुसूचित जनजाति (एस.टी.) के नाम पर आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता। इसके बावजूद कोई ऐसा कर रहा है, तो यह ‘संविधान के साथ धोखा’ है। इसके साथ ही न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि हिंदू धर्म छोड़ने के बाद भी जो लोग आरक्षण और सरकारी लाभ ले रहे हैं, उनके विरुद्ध कार्रवाई की जाए।

यह मामला जितेंद्र साहनी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (आवेदन धारा 482, संख्या 41457, वर्ष 2024) का है। इसकी सुनवाई न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरी की पीठ ने की। जितेंद्र साहनी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अंतर्गत एक याचिका दायर की थी। इसमें उसने 11 मार्च, 2024 के आरोपपत्र और 24 जुलाई, 2024 के संज्ञान/समन आदेश को रद्द करने की मांग की थी। यह आदेश अतिरिक्त मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, महाराजगंज द्वारा दिया गया था। यह मामला भारतीय दंड संहिता (आई.पी.सी.) की धारा 153-ए (विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना) और 295-ए (धार्मिक भावनाओं को भड़काने के इरादे से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कार्य) के अंतर्गत दर्ज मुकदमे (320/2023) से जुड़ा है। बहस के दौरान एक गवाह ने अदालत में बताया कि आवेदक, जो मूल रूप से केवट जाति का हिंदू था, अब ईसाई ‘पादरी’ बन गया है।
न्यायालय ने इस बात पर भी संज्ञान लिया कि जहां याचिककर्ता ने अपने आवेदन के समर्थन में दायर शपथपत्र में स्वयं को ‘हिंदू’ बताया है, वहीं साक्ष्य इसके विपरीत संकेत देते हैं। गवाह लक्ष्मण विश्वकर्मा के बयान से संकेत मिलता है कि आवेदक ने ईसाई मत स्वीकार कर लिया है और वह एक पादरी के रूप में कार्य कर रहा है। न्यायमूर्ति गिरी ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैरा 3 का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है- “पैरा 2 में निहित किसी भी बात के होते हुए भी, कोई भी व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध मत से अलग पंथ को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।”

छिड़ी नई बहस
न्यायालय के इस निर्णय के बाद देश में एक नई बहस छिड़ गई है। उल्लेखनीय है कि देश में बड़ी मात्रा में ईसाई मिशनरियां और तब्लीगी जमात के लोग हिंदुओं का लोभ-लालच से कन्वर्जन करा रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार कन्वर्ट हुए लोग ही जनजातियों को मिलने वाले आरक्षण का 80 प्रतिशत लाभ उठा रहे हैं। बता दें कि संविधान के अनुच्छेद 16(4) तथा 335 में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है। इसके अंतर्गत भारत की सभी जनजातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिलता है। इसके साथ ही उन्हें सरकार द्वारा चलाई जा रही अनेक विकास योजनाओं में भी आरक्षण दिया जाता है।
यही नहीं, इस वर्ग के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में सीटें आरक्षित हैं। लेकिन पिछले अनेक वर्षों से यह देखा जा रहा है कि इन सुविधाओं और आरक्षण का लाभ वे लोग उठा रहे हैं, जो लोभ-लालच से ईसाई या मुसलमान बन गए हैं। ये लोग समय और अवसर के हिसाब से अपने को कभी जनजाति बताते हैं, तो कभी ईसाई अथवा मुसलमान। ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ के राष्ट्रीय सह संयोजक डॉ. राजकिशोर हांसदा कहते हैं, “हिंदू से ईसाई या मुसलमान बने लोग पढ़ाई के दौरान अल्पसंख्यक के नाम पर सुविधाएं लेते हैं। फिर नौकरी के दौरान मूल जाति का लाभ उठाते हैं। इस तरह ये लोग दोहरा लाभ ले रहे हैं। इससे उन लोगों का नुकसान हो रहा है, जो वास्तव में अपनी प्राचीन परंपरा का पालन करते हैं यानी जो लोग सनातन संस्कृति के उपासक हैं।”

अधिकारों पर कब्जा
एक अध्ययन के अनुसार आई.ए.एस., आई.पी.एस., आई.एफ.एस. और भारतीय वन्य सेवा में जितने भी ईसाई जा रहे हैं, उनमें से अधकितर वे लोग हैं, जो पहले जनजाति थे। इन लोगों ने जनजातियों के अधिकारों पर कब्जा कर रखा है। इसी अध्ययन के अनुसार ऐसे लोग जनजातियों के लिए आरक्षित आई.ए.एस. के कोटे में से 61.54 प्रतिशत पर कब्जा कर लेते हैं और वास्तव में जो इनके हकदार हैं, उनके हिस्से में केवल 38.46 प्रतिशत भाग आता है। इसी तरह ये लोग आई.पी.एस. की 52 प्रतिशत सीटों पर कब्जा करते हैं और शेष 48 प्रतिशत पर जनजाति युवा चयनित होते हैं। आई.एफ.एस. में दोनों की भागीदारी 50-50 प्रतिशत है। भारतीय वन्य सेवा के 62.30 प्रतिशत पर कन्वर्टिड लोग कब्जा करते हैं, जबकि शेष 37.70 प्रतिशत वास्तविक हकदारों को मौका मिलता है। अन्य सेवाओं में मतांतरित लोगों का प्रतिशत 79.43 है और वास्तविक लोगों का प्रतिशत 20.57 है।
जनजाति से ईसाई या मुसलमान बने लोग संविधान के अनुच्छेद 342 का लाभ उठाते हैं। इस अनुच्छेद में जनजातियों के लिए किसी मत या पंथ की चर्चा नहीं की गई है। कहा गया है कि ये लोग एक ‘संस्कृति’ के उपासक हैं। यही ‘संस्कृति’ शब्द कन्वर्ट हुए लोगों के लिए कवच बना हुआ है। वहीं दूसरी ओर अनुच्छेद 341 में कहा गया है कि यदि अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति ईसाई या मुसलमान बनता है, तो उसे अनुसूचित जाति के रूप में मिल रही सुविधाएं नहीं मिलेंगी। यानी संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जाति के लोगों के लिए स्पष्ट रूप से तय कर दिया है कि वे यदि ईसाई या मुसलमान बने तो उन्हें अनुसूचित जाति का लाभ नहीं मिलेगा। लेकिन अनुसूचित जनजातियों के लिए ऐसा कुछ नहीं लिखा गया है। इसलिए ‘जनजाति सुरक्षा मंच’अनुच्छेद 342 में संशोधन की मांग कर रहा है। डॉ. राजकिशोर हांसदा कहते हैं, “अनुसूचित जातियों के लिए जिस तरह का प्रावधान अनुच्छेद 341 में किया गया है, ठीक वैसा ही प्रावधान अनुच्छेद 342 में अनुसूचित जनजातियों के लिए किया जाना चाहिए। इसके लिए केंद्र सरकार को आवश्यक कदम उठाने चाहिए।”

पुरानी मांग
अनुच्छेद 342 में संशोधन की मांग कोई नई नहीं है। इस तरह की पहली मांग 1967 में लोहरदगा से कांग्रेस के तत्कालीन सांसद डॉ. कार्तिक उरांव ने की थी। उनके प्रयासों से 235 सांसदों ने हस्ताक्षर कर एक मांग पत्र तत्कालीन सरकार के पास भेजा था। इसका असर यह हुआ कि इस मामले पर एक संयुक्त संसदीय समिति बनी। इसमें लोकसभा के 22 और राज्यसभा के 11 सदस्य शामिल थे। 1970 में समिति ने अनुशंसा की थी कि अनुच्छेद 342 में संशोधन किया जाए। इस अनुशंसा का विरोध समिति के एक सदस्य इमोन सिंह संगमा ने किया था। वे मेघालय के ईसाई परिवार से थे। ऐसा कहा जाता है कि ईसाई संगठनों के कहने पर समिति की अनुशंसा पर संसद में जिस दिन चर्चा होती उससे दो दिन पहले नागालैंड और मेघालय के मुख्यमंत्रियों ने नई दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आवास के बाहर धरना दिया। उन्होंने सरकार से कहा कि यदि इस समिति की अनुशंसा पर कार्रवाई हुई तो वे लोग नागालैंड और मेघालय को भारत से अलग करने का प्रयास करेंगे।
इसके बाद केंद्र सरकार ने इस पर कोई कार्रवाई करने से मना कर दिया। इससे डॉ. कार्तिक उरांव बहुत निराश हुए। इसके बावजूद उन्होंने अपना प्रयास नहीं छोड़ा। एक बार फिर से उन्होंने लोकसभा के 322 और राज्यसभा के 26 सांसदों से हस्ताक्षर करवाकर 17 जून, 1970 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक ज्ञापन सौंपा। इसके बाद उन्होंने इसे लोकसभा में भी उठाया। बहस में उन्होंने कहा कि यदि सरकार मूल जनजातियों को न्याय नहीं दे सकती है, तो उनकी जान ले ले। केंद्र सरकार ने कहा कि इस मामले पर कुछ निर्णय लेने से पहले गृह मंत्रालय, कल्याण मंत्रालय और विदेश मंत्रालय से सलाह ली जाएगी।

उस समय डॉ. कार्तिक उरांव और कुछ अन्य नेताओं ने कहा था कि गृह मंत्रालय और कल्याण मंत्रालय से सलाह लेने की बात तो समझ में आती है, लेकिन विदेश मंत्रालय से सलाह लेने की बात समझ से परे है। आखिर विदेश मंत्रालय से सलाह लेने की क्या जरूरत थी! इसका उत्तर जनजाति सुरक्षा मंच, झारखंड प्रदेश के सह संयोजक सुलेमान शंकर मुर्मू से मिला। उन्होंने बताया, ”उन दिनों देश में अकाल पड़ा था। अमेरिका और इंग्लैंड से अनाज आता था और बहुत जगह चर्च के माध्यम से इनका वितरण किया जाता था। इसकी आड़ में चर्च बड़ी संख्या में जनजातियों और अन्य गरीबों को कन्वर्ट कर रहा था। ऐसे में यदि कुछ किया जाता तो ये लोग कन्वर्जन का काम नहीं कर पाते। इसलिए भारत के ईसाई संगठनों ने विदेशी ईसाई संगठनों के माध्यम से भारत सरकार पर दबाव बनाया और अनुच्छेद 342 में संशोधन नहीं होने दिया।”
इस तरह डॉ. कार्तिक उरांव के प्रयासों को विफल कर दिया गया। इससे डॉ. उरांव और अधिक निराश हुए। इस निराशा के अंधेरे में उन्होंने ‘बीस वर्ष की काली रात’ शीर्षक से एक पुस्तक लिखी। इसमें बताया गया है कि कन्वर्ट हुए लोगों ने 1950 से 1970 तक में जनजाति समाज के अधिकारों पर किस तरह डाका डाला। आज भी यह पुस्तक चर्चा में रहती है और इस कारण यह मुद्दा भी जिंदा है।

जनजाति सुरक्षा मंच का गठन
डॉ. कार्तिक उरांव के अधूरे कार्य को पूरा करने के लिए ही 2006 में रायपुर में ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ की स्थापना की गई। यह मंच लगातार इस मामले को लेकर संघर्ष कर रहा है। 2009 में ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ के तत्कालीन संयोजक मोरेन सिंह पूर्ति के नेतृत्व में देशभर में हस्ताक्षर अभियान चलाया गया। कुछ ही दिनों में 28,00,000 लोगों ने हस्ताक्षर कर जिलाधिकारियों के माध्यम से इसे राष्ट्रपति तक पहुंचाया। इसके बाद 2010 में वनवासी कल्याण आश्रम के तत्कालीन अध्यक्ष जगदेवराम उरांव के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा सिंह पाटिल से भेंट की। फिर 2014 में मंच के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने दिल्ली में सभी राजनीतिक दलों के अध्यक्षों से भेंट कर निवेदन किया कि चुनाव में वे उन जनजातियों को टिकट न दें, जो ईसाई या मुसलमान बन गए हैं। इस निवेदन का कई दलों पर असर भी हुआ और उन्होंने ऐसे लोगों को टिकट नहीं दिया।

विहिप भी साथ
‘जनजाति सुरक्षा मंच’ के अभियान के साथ विश्व हिंदू परिषद भी है। उसने भी अनुच्छेद 342 में संशोधन की मांग की है। 2022 में गुजरात के जूनागढ़ में आयोजित विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय प्रन्यासी मंडल एवं प्रबंध समिति की संयुक्त बैठक में इस पर एक प्रस्ताव पारित किया गया था। इसमें कहा गया है, “भारत में सनातन समाज के लोग हमेशा से अपनी सुविधा,आवश्यकता और परंपरा के अनुसार नगरों, ग्रामों, वनों, पहाड़ों में रहते रहे हैं। जनजातियों के संबंध में भारतीय संविधान में स्पष्ट है कि ईसाई अथवा मुस्लिम बनने के बाद अनुसूचित जातियों को दिए गए आरक्षण एवं अन्य लाभ वे प्राप्त नहीं कर सकेंगे। यह एक प्रकार का संवैधानिक संरक्षण है। दुर्भाग्य से यह संरक्षण जनजातियों को अभी तक प्राप्त नहीं हो सका है। इसके कारण कन्वर्टिड ईसाई एवं मुस्लिम मूल अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक दोनों प्रावधानों का लाभ उठा रहे हैं।” विहिप का यह भी कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय ने केरल सरकार बनाम मोहनन के मामले में निर्णय देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि यदि जनजाति समाज का कोई व्यक्ति अपने मूल धर्म को त्याग कर दूसरा पंथ अपना लेता है और अपनी परंपरा, रीति-रिवाज, पूजा-पद्धति एवं संस्कार को छोड़ देता है, तो वह जनजाति नहीं माना जाएगा। इसलिए केंद्र सरकार जल्दी इस पर निर्णय ले।
दोहरे रवैए पर लगे रोक
भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुदर्शन भगत कहते हैं, ”जोे लोग अपने मूल धर्म को छोड़कर और किसी मजहब की मान्यताओं को मान रहे हैं, वे दोहरा लाभ रहे हैं। जब उन्हें संस्थागत लाभ लेना होता है, तो वे अल्पसंख्यक बन जाते हैं और जब व्यक्तिगत लाभ लेना होता है, तो जनजाति हो जाते हैं। ऐसे लोग मूल जनजाति समाज के लोगों का अधिकार हड़प रहे हैं। इन्हें आरक्षण का लाभ बिल्कुल नहीं मिलना चाहिए।” जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय संरक्षक और लोकसभा के पूर्व उपाध्यक्ष कड़िया मुंडा कहते हैं, “जब संविधान सभी के लिए समानता की बात करता है, तो फिर कुछ लोगों को दोहरा लाभ और कुछ लोगों को एक लाभ क्यों मिले! सबको एक जैसी सुविधाएं मिलनी चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि मिशनरी मतलब ईसाई। और यही ईसाई शिक्षण संस्थान चलाने के लिए विदेश से भी चंदा लेते हैं और अल्पसंख्यक के नाम पर सरकार से भी मदद लेते हैं। जब मजहब के नाम पर पैसा लेना होता है, तो ये लोग ईसाई बन जाते हैं और जब गरीब के नाम पर मदद की बारी आती है, तो जनजाति बन जाते हैं। इस दोहरे रवैए पर रोक लगनी चाहिए।
उम्मीद है कि देश के मूल जनजाति समाज की आवाज केंद्र सरकार तक पहुंचेगी और वह इस दिशा में उचित कदम उठाएगी।
यह निर्णय अपवाद रहे, नियम नहीं
गत 9 दिसंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने मां की जाति के आधार पर बेटी को अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र जारी करने की अनुमति दी। आमतौर पर बच्चे की जाति पिता की जाति के आधार पर ही तय होती है। यह मामला पुद्दुचेरी का है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने से इनकार कर दिया, जिसमें पुद्दुचेरी की लड़की को अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया गया था। यह आदेश अपने विशिष्ट तथ्यों पर आधारित अपवाद है। न्यायालय ने स्वयं यह स्पष्ट किया है कि उसने बालिका की शिक्षा और भविष्य की रक्षा के लिए सीमित राहत दी है, जबकि यह व्यापक प्रश्न कि जाति मातृ-पक्ष से व्यवस्थित रूप से चल सकती है या नहीं, आगे के लिए खुला रखा है। यदि मातृ-जाति के आधार पर प्रमाणपत्र देना सामान्य व्यवस्था बन गया, तो गंभीर दुरुपयोग की आशंका है। अतः यह आवश्यक है कि विधायिका और शासन तंत्र स्पष्ट, कड़े और पारदर्शी मानदंड बनाएं,जहां सिद्ध हो कि संतान वास्तव में उसी सामाजिक वातावरण, तिरस्कार और वंचना में पली-बढ़ी है। यह निर्णय अपवाद रहे, नियम नहीं; अन्यथा यह सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि भूमि-अधिकार और आरक्षण के संगठित दोहन का माध्यम बन सकता है।
—आदित्य कश्यप,अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय
पति मुसलमान पत्नी जनजाति!
झारखंड के रांची, राजमहल, साहिबगंज, पाकुड़ जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में ऐसी जनजाति महिलाएं मुखिया हैं, जिनका निकाह किसी मुसलमान से हुआ है। ये महिलाएं भले ही मुखिया हैं, लेकिन इनका काम इनके मुसलमान पति ही करते हैं। यानी ये लोग अपनी कथित जनजाति पत्नी की आड़ में पूरी व्यवस्था पर कब्जा कर रहे हैं। अब ये लोग लोकसभा का चुनाव भी सुरक्षित क्षेत्र से अपनी कथित जनजाति पत्नी को लड़वाने लगे हैं। इसका उदाहरण है राजमहल लोकसभा क्षेत्र। 2024 में राजमहल (सुरक्षित) लोकसभा क्षेत्र से बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर मरियम मरांडी ने चुनाव लड़ा। 31 वर्षीया मरियम के पति का नाम है-मोहम्मद अब्दुस शमीम। बेटे का नाम मोहम्मद शाहिद और बेटी है सीमा खातून। मरियम मरांडी गांव इस्लामपुर, पोस्ट भवानीपुर, जिला पाकुड़ की रहने वाली हैं। किसी मुसलमान का गैर-मुसलमान से निकाह तभी मान्य होता है, जब उसे इस्लाम कबूलवाया जाता है। जाहिर है कि मरियम ने इस्लाम कबूला होगा, तभी उनका निकाह अब्दुस के साथ हुआ होगा। इसके बावजूद मरियम जनजातियों के लिए आरक्षित क्षेत्र से चुनाव लड़ीं। रांची उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता विजय तिवारी इसे गलत मानते हैं। वे कहते हैं, ‘‘मरियम मरांडी ने एक मुसलमान के साथ निकाह किया, लेकिन वह चुनाव उस क्षेत्र से लड़ीं, जो जनजातियों के लिए सुरक्षित है। उन्होंने और उनके घर वालों ने कानून में मौजूद खामी का लाभ उठाया।’’ हालांकि मरियम मरांडी चुनाव हार गईं, लेकिन कल्पना कीजिए कि वह जीत जातीं तो उन पर जोर किसका चलता? स्पष्ट है कि उनके बहाने उनके पति अब्दुस शमीम ही इस क्षेत्र के लिए काम करते। यानी जनजातियों के लिए सुरक्षित इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व अपरोक्ष रूप से एक मुसलमान करता। यह तो धोखाधड़ी होती।

















