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अब जनजातियां ही कर रहीं कन्वर्जन का विरोध

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत हर उस व्यक्ति को करना चाहिए, जो 'जियो और जीने दो' के सिद्धांत पर विश्वास करता है

Written byकृृपा प्रसाद सिंहकृृपा प्रसाद सिंह
Dec 13, 2025, 05:35 pm IST
inभारत, मत अभिमत

अभी कुछ दिन पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि जो हिंदू अपने मूल धर्म को छोड़कर और किसी मत के अनुयायी हो गए हैं, उन्होंने अपनी मूल जाति को खो दिया है और इस तरह वे जाति के आधार पर आरक्षण के हकदार नहीं रह गए हैं। इस निर्णय ने ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ के उस आंदोलन को बल दिया, जो ‘डी-लिस्टिंग’ के लिए पूरे देश में चल रहा है। ‘डी-लिस्टिंग’ यानी जो लोग अपनी मूल संस्कृृति को छोड़कर किसी पराई संस्कृति के उपासक बन गए हैं, उन्हें उनकी जाति के आधार पर मिल रही सुविधाओं से वंचित करना। बिल्कुल यही बात उच्च न्यायालय ने भी कही है। इस दृष्टि से यह निर्णय बहुत ही शानदार और सराहनीय है। इसलिए इसका स्वागत होना चाहिए।

देश में कई ऐसे संगठन हैं, जो हिंदू समाज को कमजोर करने के लिए काम कर रहे हैं। इनका सबसे बड़ा हथियार है लोभ-लालच या धोखे से हिंदुओं का कन्वर्जन करना। उच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय से कन्वर्जन रुक सकता है और देश विरोधी तत्व बोरिया-बिस्तर बांधने के लिए बाध्य हो सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि चर्च और इस्लामिक संस्थान बरसों से हिंदुओं, विशेषकर दलित समाज और जनजाति समाज के लोगों का कन्वर्जन कर रहे हैं। ये लोग हिंदू समाज में कथित रूप से मौजूद छुआछूत या भेदभाव की आड़ लेकर दलितों और जनजातियों से कहते हैं, ‘‘देखो, हिंदू होने के नाते तुम लोगों के साथ किस तरह के भेदभाव हो रहे हैं। इसलिए हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई या मुसलमान बन जाओ, वहां जाति के नाम पर तुमसे कोई भेदभाव नहीं होगा।’’ उनकी इन बातों में हिंदू समाज के कुछ लोग आ रहे हैं और वे ईसाई या मुसलमान बन रहे हैं। एक बात यह भी दिख रही है कि कन्वर्जन का काम आज सबसे अधिक चर्च के लोग कर रहे हैं। मस्जिद एवं मुसलमान भी पीछे नहीं हैं। ये लोग धोखे, लालच के दम पर तो कभी जबर्दस्ती भी हिंदुओं को ईसाई या मुसलमान बनाते हैं। लव जिहाद इसका जीवंत प्रमाण है।

नागालैंड, मिजोरम जैसे राज्यों मेें हिंदू अब अल्पसंख्यक हो गए हैं। वहां ईसाइयों की संख्या बढ़ गई है और वेे सभी हिंदू से ही ईसाई बने हैं। झारखंड, ओडिशा, राजस्थान, गुजरात जैसे राज्यों के जनजाति-बहुल क्षेत्रों में भी ईसाई मिशनरियां हिंदुओं का कन्वर्जन करा रही हैं। कहीं-कहीं मुसलमान भी जनजातियों को बहला-फुसलाकर मुसलमान बना रहे हैं। भले ही ईसाई मिशनरियां या इस्लामवादी जातिगत भेदभाव का झांसा देकर हिंदुओं का कन्वर्जन कर रहे हैं, लेकिन ईसाई या मुसलमान बनने के बाद भी ऐसे लोगों के साथ भेदभाव हो तो रहा है। यहां तक कि ईसाई बने दलित हिंदुओं के लिए चर्च भी अलग बन रहे हैं। यही नहीं, इन लोगों को ईसाइयत में बराबरी का अधिकार पाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। ‘पूअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट’ जैसे संगठन बने हैं।

ये संगठन बराबरी का हक पाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। यही कारण है कि चर्च का नेतृत्व परेशान है। उसे यह नहीं सूझ रहा है कि ऐसे लोगों को कैसे समझाया जाए। यही हाल इस्लाम का भी है। इसलिए ये लोग अपनी बला को टालने और अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए कभी दलित ईसाइयों या मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग करते हैं, तो कभी ईसाई बन गए जनजातियों के लिए ‘सरना कोड’ की मांग करते हैं।

अच्छी बात यह है कि इनका विरोध जनजाति समाज और दलित समाज से ही हो रहा है। इन दोनों समाज का कहना है कि कन्वर्ट हो चुके लोगों को जाति के नाम पर मिलने वाली कोई सुविधा न मिले। इसके लिए कई संगठन देशव्यापी प्रदर्शन कर रहे हैं।

इसका असर भी हो रहा है। भारत सरकार भी मानने लगी है कि हिंदू से ईसाई या मुस्लिम बने लोगों को जातीय आधार पर आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। उल्लेखनीय है कि भारत सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने 11 नवंबर, 2022 को सर्वोच्च न्यायालय में एक शपथपत्र दिया था। इसमें कहा गया है कि कन्वर्टिड ईसाइयों और मुसलमानों को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। सरकार ने यह शपथपत्र एक गैरसरकारी संगठन ‘सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन’ की एक याचिका पर दिया था।

इस संगठन ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर मांग की थी कि मुस्लिम या ईसाई मत स्वीकारने वाले दलितों और जनजातियों को भी सरकारी नौकरियों में आरक्षण और अन्य सुविधाएं दी जाएं, जबकि अनुसूचित जाति और जनजाति से जुड़े संगठन ऐसी मांगों का लगातार विरोध कर रहे हैं।

इन संगठनों का कहना है कि ईसाई या मुस्लिम बने लोग अपने पुरखों के धर्म को छोड़कर कथित ‘छुआछूत और उत्पीड़न के दायरे’ से बाहर निकल गए हैं। इसलिए ऐसे लोगों को आरक्षण न दिया जाए। इसलिए समस्त हिंदू समाज को मिलकर सरकार पर दबाव बनाना चाहिए कि वह शीघ्र ही ऐसे लोगों को आरक्षण के दायरे से बाहर करने का निर्णय ले। यदि ऐसा होता है तो इसका सर्वाधिक लाभ हिंदू समाज को मिलेगा।

इस खबर को भी पढ़ें-

दोहरे लाभ उठाने वालों के विरुद्ध प्रदर्शन करते जनजाति सुरक्षा मंच के कार्यकर्ता (फाइल चित्र)

आस्था गई, अधिकार गए

Topics: हिंदू समाजइलाहाबाद उच्च न्यायालयहिंदूहिंदुओं का कन्वर्जनदलित समाजजनजाति समाजडी-लिस्टिंगपाञ्चजन्य विशेषकृृपा प्रसाद सिंह
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