दंतेश्वरी छत्तीसगढ़ : ‘माओवादियों ने बस्तर को उपनिवेश बनाया’
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दंतेश्वरी डायलॉग : ‘माओवादियों ने बस्तर को उपनिवेश बनाया’

वरिष्ठ साहित्यकार राजीव रंजन ने नक्सलवाद छोड़कर मुख्यधारा में लौटे नक्सलियों और  नक्सल पीड़ितों से बातचीत की, जिसके संपादित अंश इस प्रकार हैं :

Written byPanchjanyaPanchjanya
Dec 9, 2025, 04:47 pm IST
inविश्लेषण, छत्तीसगढ़, पाञ्चजन्य इवेंट
राजीव रंजन  (मघ्य में) मुख्यधारा में लाैटे पूर्व माओवादियों (बाएं से)  प्रदीप कुंजाम, संगीता और नक्सल पीड़ितों (दाएं) गाैतमराम  विश्वकर्मा एवं राधा सलाम से बातचीत करते हुए

राजीव रंजन  (मघ्य में) मुख्यधारा में लाैटे पूर्व माओवादियों (बाएं से)  प्रदीप कुंजाम, संगीता और नक्सल पीड़ितों (दाएं) गाैतमराम  विश्वकर्मा एवं राधा सलाम से बातचीत करते हुए

दिल्ली से बस्तर को देखने की जो प्रवृत्ति रही है, उसमें बस्तर की हकीकत छिप गई। हमने हमेशा दिल्ली के उन लोगों की निगाह से बस्तर देखा, जिन्होंने केवल नक्सलियों का पक्ष दिखाया। लेकिन क्या नक्सलियों का पक्ष ही बस्तर या छत्तीसगढ़ का पक्ष था? बस्तर को समझने के लिए दोनों पक्षों, नक्सल पक्ष और नक्सल पीड़ित पक्ष, को समझना आवश्यक है।

आमतौर पर बस्तर पर चर्चित पुस्तकें नक्सलियों के दैनिक जीवन (खाना, पीना, रहना, सोना-जागना) पर ही केंद्रित रहती हैं। बस्तर का कोई लड़का नक्सली कैसे बना? उसके पीछे कारण क्या थे? यह एक नैरेटिव का हिस्सा है, जहां लोग जल-जंगल-जमीन की लड़ाई का हवाला देते हैं, जिससे ‘आदिवासी’ युवा माओवादी बनते गए। इस नैरेटिव को कभी काउंटर करने की कोशिश नहीं की जाती है। कोई यह नहीं बताता कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से बस्तर आए नक्सलियों ने यहां के घने जंगलों और दुर्गम भूगोल को आश्रय के रूप में चुना, अबूझमाड़ को आधार बनाया। यह योजनाबद्ध घुसपैठ थी। मैं एक पुस्तक पर काम कर रहा हूं, जिसमें 100 आत्मसमर्पित नक्सलियों के साक्षात्कार हैं। अर्जुन नामक पूर्व माओवादी ने बताया कि संगठन में नसबंदी अनिवार्य है, तभी पति-पत्नी साथ रह सकते हैं। उसकी गर्भवती पत्नी को अलग दल में भेजा, नीम-हकीम से गर्भपात कराया, बच्चा मर गया, महिला मरणासन्न हो गई। तब मरते हुए पत्नी से मिलने की अनुमति मिली।

संगीता 12-13 साल की उम्र में 2017 में नक्सली संगठन का हिस्सा बनी। माओवादियों ने डराकर संगीता जैसे बच्चों को भर्ती किया। संगठन से न जुड़ो तो बच्चे, उनके माता-पिता से मारपीट की जाती है, उन्हें सजा दी जाती है। चूंकि संगीता छोटे कैडर (मिलिशिया सदस्य) की रही, इसलिए उसने कोई बड़ा नक्सली अभियान नहीं देखा। उसे प्रशिक्षण भी नकली बंदूक या बांस की बंदूक से मिला। लेकिन उसने नक्सलवाद की विभीषिका देखी है। उसकी पूरी यात्रा नक्सल संगठन के शोषण को दर्शाती है। जिस उम्र में वह संगठन से जुड़ी, वह क्रांति या सोच-समझने की उम्र नहीं थी, खेलने से थोड़ा आगे बढ़ने की उम्र थी, जब समझदारी पनप रही होती है। इसी तरह, प्रदीप कुंजाम प्लाटून पार्टी कमेटी में रहे, बड़े हथियार चलाते थे। 2008 में नौवीं पास करने के बाद वे संगठन से जुड़े और 2020 में आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा लौटे।

‘’खानी पड़ती थी नक्सलियों की जूठन ‘’

मैं अपनी मर्जी से मिलिशिया सेना में नहीं गई थी। मेरी दीदी  मिलिशिया में थी। गांव का मिलिशिया कमांडर यह कहकर मुझे ले गया कि दीदी ने शादी कर ली है। मम्मी-पापा न भेजते तो उनके साथ मारपीट की जाती, उन्हें सजा मिलती। इसलिए मजबूरन संगठन से जुड़ना पड़ा।शुरू में अच्छा नहीं लगा, लेकिन हंसी-मजाक, नाच-कूद से आदत हो गई।संगठन में नक्सलियों के आने पर घर-घर से राशन, चावल, सब्जी, इमली, जड़ी-बूटियां इकट्ठा करके देना पड़ता था। नक्सलियों का बचा हुआ खाना गांव वाले खाते थे, नहीं तो भूखे रहते थे। खाना नहीं मिलने पर नक्सली मारपीट करते थे। माता-पिता रोकते तो उन्हें सजा मिलती थी।पहली गलती पर माफी मिलती थी, लेकिन दो-तीन बार गलती करने पर जान से मार देते थे। मिलिशिया में शामिल होने के बाद मां से मिलने पर पाबंदी थी। संगठन में मुझे तेल-साबुन, कपड़े आदि भी नहीं मिलते थे। घर से पैसे मांगने पड़ते थे।– संगीता, पूर्व नक्सली

6 माह तक घर में नहीं सोईं

मैं नारायणपुर जिले से हूं। नक्सलियों की प्रताड़ना और दबाव के कारण मेरा परिवार बिखर गया। 1989 के आसपास मैनपुर और चांदा गांव के बीच एक मुठभेड़ हुई थी, जिसमें नक्सलियों को बहुत नुकसान हुआ था। मेरे पापा उनके लिए खाना बनाने गए थे। नक्सलियों को लगा कि उन्होंने ही मुखबिरी की। पापा को सुरक्षा तो मिली, लेकिन गांव में मां, दादा-दादी, चाचा-चाची को नक्सलियों ने 6 माह तक बहुत प्रताड़ित किया।  पुलिस से शिकायत करने पर कभी घर जलाने, तो कभी जान से मारने की धमकी देते थे। डर के कारण मां पेड़ के नीचे और दादा-दादी घर से दूर सोते थे। मैं 6 माह तक घर में नहीं सोईं। – राधा सलाम, नक्सल पीड़ित

‘‘मुझे मरा समझकर जंगल में फेंक गए थे’’

जो झेला है, उसे मैं ही जानता हूं। 2009 में नक्सलियों ने मुझे घर से उठाकर गोली मार दी और मरा हुआ समझकर जंगल में फेंक गए। घायल अवस्था में परिवार अस्पताल ले गया। किसी तरह मैं बच गया। आज भी कमजोरी महसूस होती है। घटना के समय मेरा बच्चा एक महीने का था। हमारा चार लोगों का परिवार था। पत्नी ने बहुत कुछ सहा। अब मैं गांव-घर छोड़कर बाहर रहता हूं। हालात बहुत खराब हैं। गांव लौटना या कुछ करना संभव नहीं।शासन-प्रशासन को धन्यवाद कि नई पुनर्वास नीति बनी, जिससे नक्सली समर्पण कर रहे हैं। मेरे जैसी पीड़ा किसी को न मिले । समर्पण बढ़ने से सबके दुख-दर्द खत्म होंगे।
– गौतम राम विश्वकर्मा, नक्सल पीड़ित

प्रदीप दंतेवाड़ा के जिस गांव से हैं, वहां हर घर का नक्सली संगठन से जुड़े रहना मजबूरी थी, क्योंकि एरिया कमेटी के नक्सली का दबाव था। कोई मना नहीं कर सकता था। चूंकि घर की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि परिवार का गुजारा भी मुश्किल था। इसलिए पढ़ाई छोड़कर उसे नक्सलियों के साथ जुड़ना पड़ा। गांव में एक साल तक रहने के बाद वह पूर्णकालिक नक्सली बना। प्रदीप ने संगठन इसलिए छोड़ा, क्योंकि वहां बीमारियां आम थीं और सीमित दवाओं से इलाज होता था। रात भर जागना, लंबी यात्राएं, मौसमी कठिनाइयां (जैसे बारिश-ठंड), अपर्याप्त कपड़े और पुलिस मुठभेड़ों के डर ने जीवन कष्टमय बना दिया तो मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। संगठन में पैसे भी नहीं मिलते थे। मुख्य कमांडर या लोकल पार्टी कमेटी के पास धन होता, जो जरूरतों, जैसे कपड़े या अन्य चीजों पर खर्च किया जाता। कैडर को न्यूनतम सहायता मिलती, बाकी के लिए कमेटी पर निर्भर रहना पड़ता है। नक्सली जल, जंगल, जमीन तथा श्रम और श्रमिकों के हक की बात करते हैं, लेकिन वास्तविकता में ऐसा कुछ नहीं है। ऐसी बातें करके वे सीधे-साधे लोगों को अपनी कथित क्रांति के लिए टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं।

नक्सली संगठन में कमांडर रह चुके एक युवक ने बताया कि उसके साथी ने रातोंरात संगठन छोड़ भागने की कोशिश की। दल ने उसे सड़क तक पहुंचने से पहले पकड़ लिया। उसने गुहार लगाई कि लौटने पर उसे मार दिया जाएगा। उसकी जिंदगी उस सड़क के पार है। दल के साथियों ने उसे छोड़ दिया। लौटकर कर उन्होंने कमांडर को बताया कि वह हाथ छुड़ाकर भाग गया। नतीजा, कमांडर ने उन्हें पेड़ पर उल्टा लटका दिया और तीन दिन तक भूखा-प्यासा रख कर मारा-पीटा और किसी तरह जिंदा रखा। हाल ही में एक से मिला तो वह आधा विक्षिप्त था, घटना ठीक से बता भी नहीं पाया।

बस्तर या छत्तीसगढ़ को आंध्र-तेलंगाना के माओवादियों ने उपनिवेश की तरह इस्तेमाल किया। क्षेत्र के लोगों के जीवन को उन्होंने किस तरह बर्बाद किया, इसका उदाहरण गौतम राम विश्वकर्मा, राधा सलाम जैसे पीड़ित हैं। नक्सल पीड़ितों की कहानी बहुत दर्दनाक है। किसी ने हाथ गंवाए, किसी ने पैर, कोई बारूदी सुरंग में उड़ गया तो किसी ने पिता, पति, पत्नी, बेटे-बेटी को खोया। चार दशक बाद आज बस्तर नई सुबह देख रहा है, जो सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति का परिणाम है। अब नक्सलवाद समाप्त हो रहा है। सरकार ने उजड़े परिवारों को बसाने के लिए प्रभावी कदम उठाए हैं। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में समर्पण करने वाले पूर्व नक्सलियों के लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था की जा रही है। हाल ही में ‘पंडुम कैफे’ गया, जिसे पूर्व नक्सली संचालित करते हैं। पर्यटन में भी पूर्व नक्सली सहयोग कर रहे हैं। ये प्रयास बस्तर को नई दिशा दे रहे हैं।

 

Topics: नक्सलीनक्सली संगठनघुसपैठनक्सलवादपाञ्चजन्य विशेषजल-जंगल-जमीननसबंदीदिल्ली से बस्तरविभीषिका (Vibhishika)बारूदी सुरंग
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