यह वर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केवल एक साधारण कालखंड नहीं, बल्कि भारत की महान विरासत, त्याग, बलिदान और राष्ट्रधर्म की स्मृतियों से भरा हुआ वर्ष है।
सबसे पहले, भगवान बिरसा मुंडा की150वीं जयंती का पावन वर्ष है, यह वर्ष गुरु तेग बहादुर जी का 350वां बलिदान दिवस भी है। यही नहीं, जिस ‘वंदे मातरम्’ ने प्रत्येक क्रांतिकारी के भीतर आत्मविश्वास और राष्ट्रभक्ति की ज्योति जला दी, फांसी के तख्ते पर चढ़ते समय भी क्रांतिकारियों के मन में भय नहीं होता था, यह उस वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ का भी वर्ष है। इसके साथ ही यह वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष है।
एक ऐसा संगठन जिसने पिछले 100 वर्षों में राष्ट्रनिर्माण का विलक्षण मार्ग प्रशस्त किया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूजनीय डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार उस समय के सभी प्रमुख स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रिय सहभागी थे। जिस काल में खुदीराम बोस से लेकर रामप्रसाद बिस्मिल जैसे अनगिनत क्रांतिकारी अपने प्राणों का बलिदान दे चुके थे, उस क्रांतिकारी धारा से डॉक्टर हेडगेवार प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए थे। कोलकाता के नेशनल मेडिकल कॉलेज में अध्ययन के दौरान उन्होंने इन क्रांतिकारी गतिविधियों को अत्यंत निकट से जिया और समझा
। वे प्रसिद्ध क्रांतिकारी त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती की अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य थे, इस समिति ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को एक नई उग्र दिशा दी। उस समय देशभर में जो राजनीतिक जागरण की लहर उठ रही थी, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, और महात्मा गांधी, इन सभी के प्रयासों में वे सहभागी रहे। साथ ही उस युग में चल रहे सामाजिक सुधार आंदोलनों में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समाज को जाति, भेदभाव और कुरीतियों से मुक्त कराने हेतु वे राष्ट्रीय जागृति के साथ-साथ सामाजिक पुनर्रचना के प्रयासों में भी अग्रणी बने। हम सब चाहते हैं, सबका एक ही सपना है कि हमारा देश महान बने।
भारत माता की जय-जयकार केवल भारत में नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व में गूंजे। हर दिशा में भारत माता की जय हो। देश के सभी महान चिंतकों-चाहे पूज्य महात्मा गांधी हों, नेताजी सुभाषचंद्र बोस हों या पूज्य बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर, सभी का एक ही निष्कर्ष रहा है:
“Some great people cannot make the nation great. The greatness of common people always makes the nation great.”
अर्थात, यदि सामान्य नागरिक का चरित्र ऊंचा होगा, उसके सद्गुण महान होंगे, तभी राष्ट्र महान बनेगा।
सर मानवेंद्र नाथ राय ने भी यही कहा है कि सामान्य नागरिक के सद्गुणों का स्तर बढ़ाए बिना किसी देश में वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं है।
अद्वितीय है शाखा पद्धति
अपने सामाजिक अनुभवों के आधार पर डॉक्टर हेडगेवार ने तीन महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले; पहला, समाज आत्म-विस्मृति का शिकार हो गया है, वह भूल गया है कि हम श्रेष्ठ पूर्वजों की संतान हैं, एक महान परंपरा के वाहक हैं, और उस परंपरा को आगे ले जाने वाली जीवित कड़ी हैं। दूसरा, समाज आत्मकेंद्रित हो गया है, और तीसरा, हमारा समाज बिखरा हुआ है। उसे संगठित किए बिना कोई बड़ा, स्थायी परिवर्तन संभव नहीं था। इन तीन निष्कर्षों से प्रेरित होकर डॉक्टर हेडगेवार ने मनुष्य-निर्माण की एक अनोखी पद्धति विकसित की शाखा। यह पद्धति आज भी अद्वितीय है-
रोज एक घंटे, एक निश्चित स्थान पर, निश्चित समय पर, बिना किसी स्वार्थ के एक उद्देश्य के साथ इकट्ठा होना। वेदों की प्रेरणा यही ‘संगच्छध्वं संवदध्वं’ शाखाओं में प्रत्यक्ष दिखाई देती है।
1925 में नागपुर में संघ की शुरुआत हुई, आज 100 वर्षों के बाद हम करोड़ों स्वयंसेवकों का विशाल परिवार देखते हैं। हाल ही में विजय दशमी पर 63,000 स्थानों पर कार्यक्रम हुए और 33 लाख स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हुए। कोई सरकारी व्यवस्था नहीं, सब स्वयं के प्रयासों से। आज देश में 83,000 से अधिक शाखाएं चल रही हैं।देश का कोई जिला, कोई तहसील ऐसी नहीं जहां संघ का कार्य न पहुंचा हो।
संघ केवल संगठन नहीं, एक विचार है। इसी विचार से प्रेरित होकर समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में 42 अखिल भारतीय संगठन खड़े हुए हैं। शाखा ने साधारण नागरिक को असाधारण चरित्र, अनुशासन और सामूहिकता दी। 1948 में गांधीजी की हत्या का आरोप संघ पर लगाया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने संघ को निर्दोष घोषित किया,फिर भी प्रतिबंध नहीं हटा। 77,000 स्वयंसेवक जेल गए तब जाकर प्रतिबंध हटा। 1975 में आपातकाल लगा-संघ पर फिर प्रतिबंध। 67,000 स्वयंसेवक 18 महीने तक जेलों में रहे। पर संघ का कार्य नहीं रुका। यह 100 वर्षों की यात्रा का सार है।

सौ वर्ष की प्रेरक साधना
1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उस समाज को आत्मबोध कराया जिसे समय ने आत्म-विस्मृति में धकेल दिया था। वह समाज, जिसके भीतर यह भावना व्याप्त थी कि मुझे कुछ भी कह लो, पर हिंदू मत कहो। आज सौ वर्षों में उस मानसिकता में परिवर्तन अपने आप में अद्भुत और प्रेरणास्पद है। आज तो स्थिति यह है कि समाज के भीतर स्वाभाविक रूप से यह भाव प्रकट होता है, गर्व से कहो, हम हिंदू हैं।
संघ समाज का संगठन
डॉ. हेडगेवार का स्वप्न था कि हिंदू समाज संगठित हो। आज लाखों स्वयंसेवक उसी स्वप्न को आगे बढ़ा रहे हैं। संघ हमेशा कहता आया है कि संघ समाज में संगठन नहीं, समाज का संगठन है। इसीलिए किसान, शिक्षा, विद्यार्थी, सेवा-हर क्षेत्र में शाखाएं और कार्यकर्ता समाज निर्माण में लगे हैं। संघ ने अपनी शताब्दी पर पांच प्रमुख विषय चुने हैं, कुटुंब प्रबोधन, समरसता-जाति-पाति से ऊपर उठना, पर्यावरण संरक्षण, स्व जागृति और आत्मनिर्भरता। शाखा व्यक्ति निर्माण का काम करती है, पर समाज में सज्जन शक्तियों व प्रबुद्ध वर्ग को साथ लेकर व्यापक सामाजिक परिवर्तन के लिए इन्हीं पांचों आयामों में हमें आगे बढ़ना है। संघ ने 100 वर्ष में लाखों सफल जीवनों को सार्थक जीवन में परिवर्तित किया है। संघ की साधना ध्येयपूर्ण होने तक संघ के कार्यकर्ता वही भावना लेकर चलते हैं-
“शुद्ध हृदय की ज्वाला से विश्वास दीप निष्कंप जलाकर,
कोटि चरण बढ़े जा रहे तिल-तिल जीवन गला गलाकर”
कार्य कितना भी कठिन हो, ध्येय पूरा होने तक गति नहीं रुकनी चाहिए।
वह ध्येय क्या है? एक दिन ऐसा आएगा जब विश्व भारत के दर्शन, चिंतन और जीवन-मूल्यों के प्रति नतमस्तक होगा। उस दिवस के लिए यह साधना जारी है-समर्पण, संगठन और सतत पुरुषार्थ के साथ। संघ को दूर से नहीं, अनुभव से समझा जाता है।


















