भारतीय मूल के जोहरान ममदानी न्यूयार्क के मेयर बन चुके हैं। फिलहाल वे एक शहर के मेयर हैं, लेकिन उनका नाम दुनियाभर में मशहूर हो चुका है और अब वे न्यूयार्क से लेकर दिल्ली तक उदारपंथियों के चहेते बन चुके हैं। उनसे उम्मीदें लगाई जा रही हैं। निश्चित रूप से ममदानी और उनकी राजनीति बेहद दिलचस्प है। नरेंद्र मोदी को वे ‘युद्ध अपराधी’ करार दे चुके हैं। वे बार-बार यह भी कहते आ रहे हैं कि इजराइल के प्रधानमंत्री अगर न्यूयार्क आए तो वे उन्हें गिरफ्तार कर लेंगे।
ममदानी आधुनिकता की भाषा बोलते हैं, जिसमें न्याय, स्वतंत्रता और बराबरी की बातें होती हैं। लेकिन कुछ मुद्दों पर उनकी चुप्पी ज्यादा अहम होती है। वे मोदी और नेतान्याहू के खिलाफ तो अत्यंत मुखर हैं लेकिन इस्लामी आतंकवाद पर एक शब्द नहीं कहते। चुनाव के दौरान जब एक टीवी प्रस्तोता ने उनसे इस बारे में बात की तो उनका बयान ये था कि, “मैंने कभी भी, एक बार भी नहीं, जिहाद या हिंसा का समर्थन किया है।” लेकिन तमाम तथ्य ये जरूर साबित करते हैं कि उन्होंने कभी इसका विरोध नहीं किया। ममदानी के एक मित्र ने कहा कि अमेरिका 9/11 हमले के लायक था। इसकी निंदा होने पर ममदानी ने कहा कि 9/11 को मुसलमानों को बदनाम करने और इस्लामोफोबिया फैलाने का हथियार बना लिया गया है। ममदानी के लिए ट्रेड टावरों पर हमले में निर्दोष नागरिकों की हत्या नहीं बल्कि इसके नतीजे में इस्लामोफोबिया का डर कहीं ज्यादा अहम है। नेतान्याहू को युद्ध अपराधी बताते नहीं थकने वाले ममदानी से जब हमास के हथियार डालने के बारे में पूछा गया तो वे अटक गए और कहा कि यह इजराइल और हमास का आपसी मसला है।
लिबरल्स के पोस्टर ब्वॉय ममदानी
इस दोहरे चरित्र के बावजूद ममदानी लिबरल्स के पोस्टर ब्वॉय हैं। जिहाद और इस्लामी आतंकवाद के प्रति उनकी सहनशीलता की अनदेखी की जाती है और भारत व इजराइल में मुसलमानों पर ‘काल्पनिक अत्याचारों’ को उछाला जाता है। यह अनायास नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में पश्चिमी दुनिया में एक अजीब विरोधाभास उभरा है। विश्वविद्यालयों, थिंक टैंकों और तथाकथित प्रगतिशील आंदोलनों में आज कई लोग खुद को सेक्युलर और आधुनिक बताते हैं, लेकिन उनकी भाषा और तर्क उन शक्तियों से मिलते-जुलते हैं जो मूलतः घोर असहिष्णु और कट्टर हैं। न्याय, मानवाधिकार और उपनिवेशवाद के विरोध के नाम पर आज जो नारे बुलंद हो रहे हैं, वे अक्सर ऐसे विचारों से प्रेरित हैं जिनका असली उद्देश्य स्वतंत्रता या समानता नहीं, बल्कि लोकतंत्र को कमजोर करना है।
वामपंथी और इस्लामी कट्टरता का गठजोड़
पश्चिमी वामपंथी विचारधारा और इस्लामी कट्टरता का यह जटिल गठजोड़ मौजूदा समय की सबसे जटिल और चिंताजनक प्रवृत्तियों में से एक है। दोनों ही भारत, इजराइल या अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देशों के प्रति गहरी शत्रुता रखते हैं। दोनों ही आधुनिकता की भाषा का इस्तेमाल अपने असली मकसद को छिपाने और यह साबित करने के लिए करते हैं जो समाज स्वतंत्रता, बहुलता और समान अधिकारों की रक्षा करता है, दरअसल वही असली “फासीवादी” है।
इस गठजोड़ की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह ईमानदार लेकिन भोले आदर्शवादियों को अपनी ओर खींच लेता है। लेनिन ने कभी ऐसे लोगों को “यूजफुल इडियट्स” कहा था। यानी भलमनसाहत से भरे वे लोग जो समझते हैं कि वे न्याय और समानता के लिए लड़ रहे हैं, पर वास्तव में वे उन ताकतों के लिए मैदान तैयार कर रहे होते हैं जो स्वतंत्रता और लोकतंत्र को मिटाने पर आमादा हैं।
भारत के खिलाफ होते हैं एकजुट
पश्चिमी विश्वविद्यालयों और सोशल मीडिया पर आज “भारत में हिंदू फासीवाद”, “जायोनी दमन” या “डिकोलोनाइज़ एवरीथिंग” जैसे अभियान ज्यादातर भावनात्मक हैं, तथ्यों पर नहीं। उनमें अध्ययन की गंभीरता नहीं, बल्कि एक नैतिक नशा है; दुनिया को सिर्फ दो हिस्सों में बांट कर देखने का नशा: उत्पीड़क और उत्पीड़ित। पर वास्तविकता इतनी सरल नहीं है। जब इस्लामिक कट्टरपंथी और वामपंथी, भारत जैसे लोकतंत्र के विरोध में एकजुट होते हैं, तो उसके पीछे कोई दया या न्याय की भावना नहीं होती; उनके पीछे बहुलता और सहिष्णुता से घृणा होती है। वामपंथ इसे “राष्ट्रवाद-विरोध” कहता है, और जिहाद इसे “काफिर-विरोध”। दोनों के बीच साझा तत्व है- लोकतंत्र से नफरत।
चयनात्मक आक्रोश की राजनीति
सबसे दिलचस्प बात यह है कि उनका आक्रोश भी चुनिंदा होता है। भारत या इज़राइल में कोई निर्णय या नीति विवादास्पद हो जाए तो पूरी दुनिया में शोर मच जाता है, लेकिन नाइजीरिया में ईसाइयों पर हो रहे अत्याचारों, चीन में उइगर मुसलमानों या ईरान में बहाई समुदाय का दमन और बांग्लादेश व पाकिस्तान में हिंदुओं के सफाये पर शायद ही कोई आवाज उठती है।
हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने नाइजीरिया में ईसाइयों पर हो रहे अत्याचारों की निंदा की और कहा कि यह दुनिया का सबसे “कम रिपोर्ट किया गया मानवाधिकार संकट” है। फिर भी ममदानी और उनके समर्थक खेमे से इस पर कोई टिप्पणी नहीं आई क्योंकि यह उनकी ‘राजनीतिक प्राथमिकताओं’ में फिट नहीं बैठता।
यह है सलेक्टिव आउटरेज यानी चयनात्मक आक्रोश है जो पूरी तरह राजनीतिक है। इसमें आक्रोश हमेशा उन्हीं देशों की ओर जाता है जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, क्योंकि वहीं विरोध सुरक्षित है। बंद समाजों पर चुप्पी आसान है, खुले समाजों पर हमले की कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती और लोकप्रियता भी मिलती है।
कानून की आड़ में राजनीति
इस चयनात्मक आक्रोश के साथ ही लॉफेयर यानी कानून को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है। यानी, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, मानवाधिकार आयोगों या संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों का इस्तेमाल लोकतांत्रिक देशों को बदनाम करने के लिए करना।
कानून की आड़ में राजनीति ऊपर से नैतिक दिखती है क्योंकि असली एजेंडा जल्दी सामने नहीं आता। एक झूठा या आधा-सच रिपोर्ट के रूप में सामने आता है, फिर वह मीडिया, विश्वविद्यालयों और एक्टिविस्ट सर्किलों में घूमता रहता है, और धीरे-धीरे “सत्य” बन जाता है। भारत और इजराइल इस रणनीति के सबसे आसान निशाने हैं, क्योंकि दोनों ही अपने-अपने क्षेत्रों में लोकतंत्र के प्रतीक हैं। उन्हें बदनाम करना लोकतंत्र की ही वैधता पर हमला करना है।
आधुनिकता की भाषा, कट्टरता का मुखौटा
सबसे खतरनाक बात यह है कि इस्लामी कट्टरपंथ और वामपंथ दोनों ने आधुनिकता की भाषा पर कब्जा कर लिया है। वे “न्याय”, “समानता” और “स्वतंत्रता” जैसे शब्दों का इस्तेमाल अपने असली इरादों को छिपाने के लिए करते हैं। यहां तक कि पाकिस्तान जैसे देश भी जो खुले तौर पर इस्लामिक आतंकवाद के पोषक हैं, इसकी आड़ में भारत में अल्पसंख्यकों का मुद्दा उठा लेते हैं।
इस्लामी कट्टरता आज “प्रतिनिधित्व” और “अधिकार” की भाषा बोलती है, लेकिन उसका सपना ऐसा समाज है जहां गैर मुस्लिमों, स्त्रियों और असहमति की कोई जगह नहीं। वहीं, वामपंथ का ‘डिकोलोनाइजेशन’ का नारा अब सुधार नहीं, बल्कि संस्थाओं के विघटन का औजार बन चुका है। अदालतें, संसदें, यहां तक कि लोकतंत्र स्वयं- सब कुछ औपनिवेशिक अवशेष घोषित कर दिया जाता है।
यह बौद्धिक आत्मघात है
दुखद यह है कि पश्चिम के उदारवादी संस्थान इस खेल को समझ नहीं पा रहे। विविधता दिखाने की होड़ में वे उन लोगों को मंच देते हैं जो खुद विविधता के विरोधी हैं। मानवाधिकार सम्मेलनों में ऐसे लोग भाषण देते हैं जिन्होंने अपने देशों में कभी मानवाधिकार की रक्षा नहीं की। यह बौद्धिक आत्मघात है, लेकिन “प्रगतिशीलता” के नाम पर इसे प्रशंसा मिलती है।
पश्चिमी दुनिया में यह प्रवृत्ति इसलिए पनपी है क्योंकि वहां अपराधबोध को अब नैतिकता समझ लिया गया है। औपनिवेशिक अतीत और नस्लभेद के इतिहास के कारण पश्चिमी समाज खुद को दोषी महसूस करता है, और उसी अपराधबोध को “प्रगतिशीलता” का रूप दे देता है। इसलिए वे लोकतंत्रों की आलोचना करते हैं लेकिन तानाशाहियों पर चुप रहते हैं। उन्हें इस्लामी कट्टरता पर टिप्पणी करना ‘इस्लामोफोबिक’ लगता है, लेकिन हिंदू या यहूदी पहचान पर हमला करना ‘बौद्धिक बहस’ माना जाता है। ममदानी जैसे लोग इसका फायदा उठाने में सिद्धहस्त हो चुके हैं।
कट्टरता के सभी स्वरूपों का हो विरोध
पीड़क खुद पीड़ित की भाषा बोल रहे हैं और सहानुभूति अर्जित कर रहे हैं। लेकिन सहानुभूति अगर विवेक के बिना हो, तो वह भ्रम बन जाती है। नतीजा यह कि असली उत्पीड़न छिप जाता है और नकली नैतिकता का बोलबाला हो जाता है। अब समय आ गया है कि प्रगतिशील समाज अपनी नैतिक दृष्टि को फिर से साफ करे। मानवाधिकार की रक्षा का मतलब होना चाहिए- सबके लिए, बिना भेदभाव के और यह सभी देशों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए न कि चयनात्मक तरीके से। कट्टरता के सभी स्वरूपों का विरोध होना चाहिए चाहे वह धर्म के नाम पर हो या विचारधारा के नाम पर।
दुनिया को नारे नहीं, विवेक चाहिए
आधुनिकता की भाषा आकर्षक है, लेकिन इसका शस्त्रीकरण हो चुका है। जब “न्याय” और “स्वतंत्रता” जैसे शब्द वैचारिक युद्ध के औजार बन जाएं, तो वे अपना अर्थ खो देते हैं और अंत में विश्वसनीयता भी। इससे निपटने के लिए यह समझना आवश्यक है कि कि क्या बोला जा रहा है और क्या छिपाया जा रहा है। अब दुनिया को नारे नहीं, साहस और विवेक चाहिए। ‘पोलिटिकल करेक्टनेस’ के इस दौर में यह कहने का साहस करना होगा कि न्यूयार्क के ट्रेड टावरों और मुंबई हमलों में जो मारे गए, वो असली पीड़ित हैं न कि ममदानी की फूफी जिन्हें 9/11 के बाद न्यूयार्क में हिजाब पहनने से डर लगता था। ममदानी की इन तमाम कहानियों की तरह उनकी फूफी की पीड़ा भी काल्पनिक निकली। उनका झूठ पकड़ा गया। बावजूद इसके खुद को पीड़ित दिखाने का नरेटिव फिर भी जीत गया। यही नरेटिव ममदानी जैसे लोगों की ताकत है। जिसे ध्वस्त करने की जरूरत है।

















