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दिल्ली बम विस्फोट : कैंपस में कट्टरता की नर्सरी

आतंकवाद ने भारत के विश्वविद्यालय, कोचिंग और हॉस्टल से लेकर एनजीओ को नया युद्धक्षेत्र बना लिया है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था को भी सुरक्षा ढांचे का हिस्सा बनना होगा

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Nov 17, 2025, 05:43 pm IST
inविश्लेषण, दिल्ली

दिल्ली आतंक की यादों से उबर चुकी थी, लेकिन 10 नवंबर के धमाके ने फिर चौंका दिया। यह सिर्फ विस्फोट नहीं, चेतावनी थी कि आतंक नया रूप ले चुका है। इस मॉड्यूल में एक मौलाना को छोड़ बाकी सभी डॉक्टर निकलना चिंता का विषय है। कैसे शिक्षा प्राप्त लोग कट्टरता के शिकार बने और समाज इसका उत्तर कैसे देगा?

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, अब खतरा सीमाओं से नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों, कोचिंग सेंटरों और एनजीओ से पैदा हो रहा है, जहां कट्टर मजहबी विचारों की नर्सरी धीरे-धीरे पनप रही है। यह नया आतंक शांति की आड़ में अपनी जड़ें गाड़ रहा है और इसका असर वर्षों तक दिखाई देता है। एनआईए की प्रारंभिक रिपोर्टों से स्पष्ट है कि कुछ विश्वविद्यालयों में वर्षों से सोच बदलने की साजिश चल रही है। यह बंदूक का नहीं, विचारों के जरिए दिमाग बदलने का तंत्र है, जिसका उद्देश्य देश को भीतर से कमजोर करना है।

यह प्रवृत्ति नई नहीं। 2016 में जेएनयू की देशविरोधी नारेबाजी, अलीगढ़ और हैदराबाद में आईएसआईएस मॉड्यूल का खुलासा, केरल के कॉलेजों में फैलती कट्टरपंथी जड़ें-इन सब घटनाओं को एक बड़ी तस्वीर की कड़ियों के रूप में देखना चाहिए। अब 10 नवंबर के ‘डॉक्टर मॉड्यूल’ ने दिखा दिया है कि आतंक का नेटवर्क शिक्षा संस्थानों में गहराई तक पैठ बना चुका है। कुछ कैंपस बहस के नहीं, बल्कि विचारों की कट्टरता फैलाने के केंद्र बन गए हैं-जहां ज्ञान नहीं, जहरीली सोच पनप रही है।

आतंकी नेटवर्क को धन की जरूरत होती है और यह काम एनजीओ की आड़ में आसान बन जाता है। एफसीआरए संशोधन के बाद जिन हजारों एनजीओ के लाइसेंस रद्द हुए, उनमें कई पर कन्वर्जन, अलगाववाद और सोशल मीडिया प्रोपगंडा फैलाने के आरोप लगे। इन्हीं संगठनों ने विश्वविद्यालयों और आंदोलनों में ऐसे कैडर तैयार किए जो आगे कट्टर नेटवर्क में शामिल हो गए।

इसके साथ कोचिंग हब भी आतंकियों के लिए सुरक्षित ठिकाने बन गए हैं, जहां पहचान छिपाना और नियमों से बच निकलना आसान है। डॉ. उमर का ‘डॉक्टर मॉड्यूल’ इसी पैटर्न का उदाहरण है-किराये के कमरे से नेटवर्क बनाना, अस्पताल और कैंपस में संपर्क बढ़ाना और गुप्त रूप से आतंकी हमले की तैयारी करना। दिल्ली का हालिया धमाका इसी मॉडल का परिणाम है।

टेलीग्राम और डिस्कॉर्ड जैसे प्लेटफार्म आतंकी नेटवर्क के लिए नए भर्ती केंद्र बन गए हैं। कई मामलों में यह सामने आया कि छात्र ग्रुप, कोचिंग चैट और ऑनलाइन क्लास लिंक का उपयोग युवाओं का ब्रेनवॉश करने में किया गया। यह कट्टरपंथ अब कक्षा में नहीं, मोबाइल और लैपटॉप की स्क्रीन पर चलता है।

आतंकवाद केवल हथियारों से नहीं, बल्कि बचाव और सहानुभूति के इकोसिस्टम से भी मजबूत होता है। यह इकोसिस्टम आतंकियों के पकड़े जाने पर उसे ‘बेगुनाह’ साबित करने के लिए वकीलों की फौज खड़ी कर देता है। दिल्ली धमाके के बाद समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आजमी ने कहा, “चुनाव आते ही धमाके होने लगते हैं, जांच होनी चाहिए। जुल्म और नाइंसाफी से आतंकवाद पैदा होता है। दिल्ली में विस्फोट का मतलब है-सरकार की चूक।”

देश में ‘भगवा आतंकवाद’ की थोथी थ्योरी स्थापित करने की कोशिश कर चुके पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने तर्क दिया कि आतंकवादी हमारे समाज की परिस्थितियों का परिणाम हैं, जिन्हें समझना चाहिए। उनके इस बयान पर जम्मू-कश्मीर के एक पुलिस अधिकारी प्रणव महाजन ने सटीक जवाब दिया, “आतंकवाद अन्याय का नतीजा नहीं, एक मानसिक बीमारी है, जो तब फैलती और फलती-फूलती है, जब हम कट्टरता को पीड़ित मानसिकता समझने की भूल कर बैठते हैं।”

आतंकियों को तरह-तरह से बचाने और सरकार की कार्रवाई को लेकर संदेह का माहौल बनाना समस्या की जड़ है। एक समानांतर इकोसिस्टम विदेशों से फंडिंग जुटाता है, कैंपस और कोचिंग नेटवर्क को कट्टरता का प्रयोगशाला बनाता है। अब यह सोच छोड़नी होगी कि शिक्षा केवल डिग्री और नौकरी का माध्यम है। आधुनिक आतंकवाद विचार, तकनीक और संस्थागत कमजोरियों से संचालित तंत्र बन चुका है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था को भी सुरक्षा ढांचे का हिस्सा बनना होगा।

विश्वविद्यालयों का नियमित सुरक्षा ऑडिट, एनजीओ फंडिंग की जांच, हॉस्टलों और किराये के मकानों का पुलिस सत्यापन और संवेदनशील पाठ्यक्रमों में पृष्ठभूमि की सख्त जांच जरूरी है। अब राष्ट्र की सुरक्षा केवल सीमा पर नहीं, शिक्षण संस्थानों की सजगता पर भी निर्भर है। आतंक अब बंदूक से नहीं, दिमाग और डिजिटल नेटवर्क से काम करता है-यही नई सुरक्षा चुनौती है। सरकार अपने स्तर पर उपाय करेगी, लेकिन असली जवाब समाज को देना है। कश्मीर इसका उदाहरण है, जहां कभी आतंकियों की महिमा गाई जाती थी, अब वहां विकास और स्थिरता की नई लहर है।

Topics: delhi bomb blastदिल्ली बम विस्फोटकन्वर्जनआतंकवाद का केंद्रकट्टरताकट्टरता की नर्सरीविश्वविद्यालयनया युद्धक्षेत्रअलगाववादकट्टर मजहबी नर्सरीहॉस्टलकिराये के कमरेएनजीओजहरीली सोचकैंपससोच बदलने की साजिशपाञ्चजन्य विशेषकोचिंग सेंटर
हितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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