दिल्ली के भीड़भाड़ वाले इलाके लाल किले के पास 10 नवंबर की शाम ट्रैफिक सिग्नल पर अचानक एक सफेद कार में धमाका हुआ। इसमें 13 लोगों की मौत हो गई और 30 से अधिक घायल हो गए। यह कोई मामूली धमाका नहीं था, बल्कि उत्तर भारत में हजारों लोगों को मारने की एक आतंकी साजिश थी, जो भारतीय खुफिया एजेंसियों की सतर्कता से नाकाम हो गई। पुलिस ने यूएपीए और विस्फोटक अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया। अब एनआईए आतंकी हमले की दृष्टि से इस मामले की जांच कर रही है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह लगातार अधिकारियों के साथ बैठक कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि किसी भी सूरत में दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
हुंडई आई 20 (HR-26-CE-7674) में हुआ यह विस्फोट खेती में प्रयुक्त होने वाले रसायनों से बनाए गए बम से किया गया था। इसके पीछे जैश-ए-मोहम्मद का एक आतंकी था। इसमें जैश-ए-मोहम्मद के पीछे था अल-कायदा व उसका कश्मीर विंग अंसार गजवत-उल-हिंद। एक प्रत्यक्षदर्शी विनीत सेठ ने बताया कि धमाके तीव्रता इतनी थी कि धरती हिल गई। सैकड़ों फीट दूर तक खिड़कियों के शीशे टूट गए।
जिहादी पोस्टर
इस आतंकी साजिश की शुरुआत कुछ सप्ताह पहले कश्मीर में हुई। 19 अक्तूबर, 2025 को श्रीनगर के नौगाम इलाके में दीवारों पर जैश-ए-मोहम्मद और अंसार गजवत-उल-हिंद के समर्थन में उर्दू पोस्टर मिले, जिनमें लोगों को सुरक्षा बलों से दूर रहने की चेतावनी दी गई थी। इसने सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए थे। ऐसे हथकंडे जैश-ए-मोहम्मद पहले आजमा चुका था। जांच में तीन स्थानीय युवक-आरिफ निसार डार, यासिर-उल-अशरफ और मकसूद अहमद डार गिरफ्तार हुए, जिन्होंने शोपियां के मौलाना इरफान अहमद का नाम लिया, जो मस्जिद से कश्मीर की शांत वादियों में जहर घोल रहा था। वह टेलीग्राम चैनलों से जैश-ए-मोहम्मद व अल-कायदा का प्रचार करने के साथ बहावलपुर स्थित हैंडलर उमर-बिन-खत्ताब के संपर्क में भी था। पूछताछ में गंदरबल के जमीर अहमद आहंगर उर्फ मुतलाशा का नाम भी सामने आया, जो ‘फर्जंदान-ए-दारुल-उलूम-देवबंद’ नामक समूह से जुड़ा था। यह नेटवर्क ऑनलाइन माध्यमों से हमलों की योजना, धन जुटाने और बम निर्माण जैसी जानकारियां साझा कर रहा था।
2019 में पुलवामा हमले के बाद भारत ने बालाकोट में एयरस्ट्राइक किया था। इसके बाद लंबे समय तक मसूद अजहर शांत रहा, लेकिन हालिया पोस्टरों ने खुफिया एजेंसियों को संकेत दिया कि जैश-ए-मोहम्मद फिर सक्रिय हो रहा है। मसूद ने अंसार गजवत-उल-हिंद के साथ मिलकर एक नया नेटवर्क खड़ा किया, जिसकी स्थापना 2017 में हिजबुल मुजाहिदीन से अलग हुए आतंकियों ने की थी। यह गिरोह वैश्विक जिहाद की विचारधारा से प्रेरित था और टेलीग्राम जैसे एप्स के जरिए फंडिंग, भर्ती और समन्वय करता था। आतंकियों को आम लोगों में घुलने और तकनीकी ढंग से विस्फोटक तैयार करने का प्रशिक्षण दिया गया। वर्षों की तैयारी के बाद उन्होंने खाद के नाम पर रसायन जुटाए और हथियार गुप्त स्थानों पर छिपाए। योजना थी भारत में एक साथ कई धमाके कर डर और वैमनस्य फैलाने की। आकार में छोटा होने के बावजूद अंसार गजवत-उल-हिंद की विचारधारा अधिक कट्टर और खतरनाक है, जो अल-कायदा की तर्ज पर युवाओं को यह विश्वास दिलाने का प्रयास करती है कि भारत दुश्मन है और जिहाद ही समाधान।

घाटी से फरीदाबाद तक
लंबी जांच के बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस को हरियाणा में छिपे गोदामों का सुराग मिला। इरफान व मुतलाशा से पूछताछ में पता चला कि वहां हथियार और विस्फोटक छिपाए गए हैं। 30 अक्तूबर को जम्मू-कश्मीर और हरियाणा पुलिस ने फरीदाबाद के धौज गांव में दो मकानों पर छापा मारा। ये मकान कश्मीर के डॉक्टर मुअजम्मिल शकील ने किराए पर ले रखे थे, जो अल-फलाह यूनिवर्सिटी में पढ़ाता था। एक मकान में 358 किलो सामग्री सूटकेसों में भरी थी, जबकि दूसरे में 2,563 किलो रसायन 88 बड़ी बोरियों में रखा गया था। कुल मिलाकर छापे में लगभग तीन टन (2,921 किलो) अमोनियम नाइट्रेट और फ्यूल ऑयल (एएनएफओ) बरामद हुए, साथ ही एके राइफल, टाइमर, तार, बैटरियां और वॉकी-टॉकी मिले। यह मात्रा इतनी थी कि कई कारों और इमारतों को उड़ाने के लिए पर्याप्त थी। इन रसायनों का प्रयोग पूर्व में कई बड़े आतंकी हमलों में किया जा चुका है, जैसे-1995 में अमेरिका के ओक्लाहोमा सिटी में हुए धमाके में।
शकील से पूछताछ के आधार पर 5 नवंबर को पुलिस ने सहारनपुर से डॉ. अदील अहमद राथर को गिरफ्तार किया, जो कुलगाम का रहने वाला था और स्थानीय अस्पताल में काम करता था। उसके कॉलेज लॉकर से एक बंदूक बरामद हुई। जांच में हरियाणा के मेवात निवासी हाफिज मोहम्मद इश्तियाक का नाम भी सामने आया, जो फरीदाबाद के गोदामों की चाबियां संभालता और विस्फोटक सामग्री के सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था करता था। दो वर्ष में यह नेटवर्क चरणबद्ध तरीके से बना, धन चैरिटी और छात्र सहायता के नाम पर छोटे-छोटे हिस्सों में जुटाया गया। रसायन खाद के रूप में खरीदे गए, जबकि हथियार संभवतः ड्रोन से सीमा पार भेजे गए। उनकी योजना पूरे उत्तर भारत, विशेषकर दिल्ली में सिलसिलेवार हमले करने की थी। जैश-ए-मोहम्मद ने हथियार मुहैया कराए और अल-कायदा के सहयोगी संगठन अंसार गजवत-उल-हिंद ने साजिश की रूपरेखा तैयार की। उद्देश्य था यह दिखाना कि उनका वैश्विक जिहाद अभी जीवित है और भारत में कहीं भी वार कर सकता है।
महिला विंग, छापे और दहशत
आतंकियों की मदद करने के आरोप में लखनऊ की डॉ. शाहीन सईद को फरीदाबाद से गिरफ्तार किया गया। पुलिस छापे की सूचना मिलते ही उसने घबराहट में अपनी बंदूक फेंक दी, जो कचरे के डिब्बे से बरामद हुई। शाहीन जैश-ए-मोहम्मद के महिला विंग से जुड़ी थी, जो हथियार सहित संसाधनों की आवाजाही और संदेश पहुंचाने में सहयोग करता था।
10 नवंबर को पुलिस ने दोबारा छापा मारकर फरीदाबाद से 2,921 किलो विस्फोटक जब्त किया। उधर, पुलवामा में पूछताछ और दिल्ली में नाकेबंदी बढ़ा दी गई। इसी बीच एक व्यक्ति, डॉ. उमर मोहम्मद, भाग निकलने में सफल रहा। उसकी सफेद आई20 कार में 50 से 100 किलो विस्फोटक भरे थे, जो मोबाइल फोन ट्रिगर से जुड़े थे। सीसीटीवी फुटेज में वह 10 नवंबर दोपहर को लाल किले की पार्किंग में दाखिल होते दिखा। तीन घंटे प्रतीक्षा के बाद वह 6:48 बजे निकला और 6:52 पर कार में विस्फोट हो गया। यह गलती थी या घबराहट में हुई चूक? या बम जल्दबाजी में गलत तरीके से बना था, जिससे विस्फोट समय से पहले हो गया? हालांकि, विस्फोट में 13 लोगों की मौत और कई घायल हुए, लेकिन योजना अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाई।
आतंकियों मंसूबे थे बड़े
7 नवंबर गुजरात पुलिस ने जो खुलासा किया, वह कहीं अधिक भयावह है। पुलिस के अनुसार, इस आतंकी नेटवर्क से जुड़ा डॉ. मोहिउद्दीन अरंडी के बीजों से राइसिन जहर बना रहा था। इसके लिए उसने एक निजी लैब बना रखी थी। मात्र एक चुटकी राइसिन सैकड़ों लोगों की जान ले सकती है। यह शरीर में प्रोटीन बनने की प्रक्रिया रोक देता है, जिससे अंग धीरे-धीरे काम करना बंद कर देते हैं। उसके पास ग्लॉक और बेरेटा पिस्तौलें भी मिलीं। उससे पूछताछ के बाद पुलिस ने पालनपुर के होटलों में छापा मारकर उत्तर प्रदेश से आए आजाद सुलेमान शेख और मोहम्मद सुहेल को गिरफ्तार किया, जो इस जहर से तबाही मचाने वाले थे। तीनों आरोपी 17 नवंबर तक रिमांड पर हैं।
32 स्थानों पर विस्फोट की योजना
जैश-ए-मोहम्मद और अल-कायदा जैसे आतंकी संगठन मकड़ी के जाल की तरह काम करते हैं-एक तंत्र टूटे तो दूसरा सक्रिय हो जाता है। सुरक्षा एजेंसियों की जांच में पता चला कि आतंकी 6 दिसंबर (बाबरी ढांचा विध्वंस की तारीख के दिन) को 32 स्थानों पर एक साथ विस्फोट करने वाले थे। इसके लिए पूरे नेटवर्क को चार उप-मॉड्यूल में बांटा गया था, जिनमें दो-दो सदस्य थे। इन्हें एक ही समय पर अलग-अलग स्थानों पर आईईडी विस्फोटों को अंजाम देना था। आतंकियों ने पुराने मॉडलों की 32 कारों में बम लगाकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश और अन्य शहरों में हमले की तैयारी की थी।
दिल्ली विस्फोट को एजेंसियों की नाकामी कहना गलत होगा, यह उनकी सतर्कता की जीत थी। यदि समय रहते कार्रवाई न होती, तो कई शहर आतंकी हमलों की चपेट में आ सकते थे। श्रीनगर पोस्टरों से मिली शुरुआती सूचना पर तेज और सटीक कदम उठाकर एजेंसियों ने बड़ी तबाही टाल दी।
आआपा की ओछी हरकत

दिल्ली बम धमाके के घायलों को लेकर आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज पर ओछी राजनीति का आरोप लगा। उन्होंने एक्स पर दो तस्वीरें शेयर कीं- एक मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की अस्पताल यात्रा की और दूसरी प्रधानमंत्री मोदी की। साथ ही लिखा, “नए कॉस्ट्यूम, नया प्लास्टर।”
उन्होंने पीएम पर फोटो खिंचवाने का आरोप लगाया, जिसके बाद यूजर्स ने सोशल मीडिया पर उन्हें फेक फोटो और घटिया राजनीति के लिए आड़े हाथों लिया। एक यूजर ने लिखा, “पहले दिन प्लास्टर नहीं था, रेखा गुप्ता तुरंत अस्पताल पहुंच गई थीं; आप लोग बस टिप्पणी कर रहे थे।”
एक अन्यू यूजर पल्लवी सीटी ने लिखा, “कितनी नीच राजनीति। रेखा गुप्ता उसी दिन मरीजों से मिलीं, जबकि मोदी भूटान से लौटते ही अस्पताल गए थे। एक्सरे के बाद ही प्लास्टर लगाया गया, और दोनों फोटो अलग एंगल से हैं।”
दिलीप जैन ने लिखा, “10 नवंबर को हादसा हुआ, 11 को इलाज शुरू हुआ और 12 को पीएम मिले। क्या तीन दिन मरीज बिना इलाज के रहते? ऐसी बातें शर्मनाक हैं।”
भाजपा नेता अमित मालवीय ने सौरभ भारद्वाज पर निशाना साधते हुए कहा कि “आप चुनाव हारकर बेरोजगार हो गए हैं, आपकी हताशा दिखती है।” उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने 11 नवंबर को एलएनजेपी अस्पताल में घायलों से मुलाकात की और जांच के बाद पीड़ित को प्लास्टर लगाया गया। सांसद प्रवीण खंडेलवाल भी उसी दिन दोपहर 12:15 बजे पहुंचे थे, जब मरीज का इलाज पहले ही हो चुका था।

















