बिहार ने इस बार केवल सरकार नहीं चुनी, उसने अपना भविष्य चुना, अपनी दिशा चुनी, अपनी पीढ़ियों का भाग्य चुना। बिहार विधान सभा चुनाव का ऐतिहासिक परिणाम सिर्फ भाजपा-एनडीए गठबंधन की विजय नहीं, बल्कि बिहार की सामूहिक चेतना का पुनर्जन्म है। यह वह क्षण है जब इतिहास ने करवट ली है और जनता ने स्पष्ट शब्दों में कहा है “हम अतीत के अंधकार में लौटने वाले नहीं, हम जनराज के उजाले में आगे बढ़ने वाले बिहार हैं।”
यह चुनाव दो विचारों जंगलराज और जनराज का संघर्ष था। एक तरफ वह अतीत था जहां डर कानून बन जाता था, अपराध सत्ता बन जाती थी और जनता सांझ ढलने के बाद अपने दरवाज़े बंद कर लेती थी। दूसरी तरफ वह वर्तमान था, जहां सड़कों पर रोशनी है, पुलिस व्यवस्था सचेत है और युवा अपने करियर की योजनाएं बना रहा है। इस चुनाव में बिहार ने अतीत की परछाइयों को देखा और दृढ़ता से कहा “नहीं। हम अब उस अंधकार में वापस नहीं जाएंगे।”
इस निर्णायक जनादेश में बिहार की जेन-जी ने चमत्कार कर दिखाया। यह वह पीढ़ी है जो जातीय खांचों में नहीं पनपी, न ही किसी भय-राज में पली। उसने गूगल की गति देखी है, दुनिया की दौड़ देखी है, और अवसरों के महासागर को महसूस किया है। यह पीढ़ी जानती है कि गिरती बिजली-पानी और बढ़ता अपराध सपनों का ताबूत बन जाते हैं। इसलिए उसने जातिगत नारों को ठुकराकर विकास की भाषा बोली। उसने भीड़ से प्रभावित न होकर भविष्य से संवाद किया। उसने स्पष्ट का की “हम अवसर चाहते हैं, अराजकता नहीं। हम सुशासन चाहते हैं, स्याह शासन नहीं।”
यही कारण है कि भाजपा-एनडीए की जीत केवल एक गठबंधन की विजय नहीं, बल्कि जेन-जी की आकांक्षाओं की विजय है। यह उस युवा मतदाता की जीत है जिसने पहली बार मतदान केंद्र में जाते हुए महसूस किया कि उसकी उंगली पर लगी स्याही उसके भविष्य का हस्ताक्षर है, किसी जातिय समीकरण का नहीं।
इस जनादेश में लोहिया की आत्मा मुस्कुराती दिखती है। लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जनशक्ति की गूंज सुनाई देती है। कर्पूरी ठाकुर का सामाजिक न्याय यहां नए रूप में साकार होता दिख रहा है। वर्षों से इन महानतम जननायकों की विरासत को कुछ लोगों ने अपने राजनीतिक हितों के लिए जकड़ रखा था, जबकि उनके नाम पर सिर्फ झंडों का व्यापार होता रहा। लेकिन इस चुनाव ने दिखा दिया कि लोहिया का सपना केवल नाम का नहीं था, वह विकास, समानता और सच्चे जनसरोकारों की राजनीति का था और वही आज जनता ने चुना है।
जन सुराज की स्थिति भी इसी प्रवाह का हिस्सा है। उसे इस चुनाव में लोकप्रियता मिली, चर्चा मिली लेकिन जनादेश नहीं मिला। बिहार की राजनीति गंगा नदी की तरह है, हर धारा स्वागत योग्य है, पर हर धारा प्रवाह नहीं बदलती। जन सुराज की धारा दिखाई दी, लेकिन अभी वह इतनी प्रबल नहीं बनी कि नदी का रुख बदल दे। प्रशांत किशोर को यह समझना चाहिए कि बिहार को कभी अहंकार रास नहीं आया। इस धरती ने अहंकारी सम्राटों की वंशबेल भी उखाड़ फेंकी है। इसलिए जो भी विकल्प बनना चाहता है, उसे नंद सम्राटों सा अहंकार नहीं, चंद्रगुप्त सी विनम्रता लेकर ही आना होगा।
जन सुराज का प्रदर्शन यह प्रमाण है कि जनता प्रयोग करती है, पर पूरी स्थिरता उसी पर सौंपती है जिस पर भरोसा जमता है। नए विकल्पों की जिज्ञासा हो सकती है, पर शासन का अधिकार वही पाता है जिसकी जड़ें जमीन पर हों और जिसका तर्क भविष्य से तनातनी कर सके।
तेज प्रताप यादव की पराजय भावनाओं को झकझोरने वाली है और खेसारी लाल यादव की हार सियासी यथार्थ का साफ संदेश देती है कि सिर्फ नाम, नशा और तमाशे से जनादेश नहीं मिलता है।
मिथ्या अहंकार से भरे राहुल गांधी और सामाजिक अज्ञानता से सराबोर तेजस्वी यादव को भी अविलंब अपनी ‘पॉलिटकल एप्रोच’ को बदलने की प्रबल आवश्यकता है।
बिहार के इस निर्णायक जनादेश में तीन नेतृत्व-ध्रुवों की भूमिका स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति भरोसा, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रशासनिक स्थिरता और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सुशासन मॉडल।
मोदी ने राष्ट्र के मंच पर जो भरोसा गढ़ा है, वह बिहार के युवा की आंखों में भी चमकता है। नीतीश कुमार की स्थिर शासन शैली ने राज्य को अनिश्चितता से उबारा है और योगी आदित्यनाथ की अपराध-विरोधी कठोरता ने जनता को यह संदेश दिया कि कानून का राज कोई नारा नहीं, एक जीवंत संभावना है। इन तीनों नेतृत्वों का सम्मिलित प्रभाव इस चुनाव में उस जनभावना की तरह मौजूद रहा, जो भले बोले नहीं, पर हर मतपेटी में दर्ज हो गई कि ‘जनराज’ ही भविष्य है।
महागठबंधन की ऐतिहासिक पराजय भी महज सीटों का गणित नहीं है। यह जनता का वह फैसला है जिसे वर्षों दबाया गया, धुंधलाया गया, पर मिटाया नहीं जा सका। लोग याद रखे हुए थे कि जब शासन सड़कों पर नहीं, अपराधियों की चौपालों पर चलता था। जब अस्पतालों की जगह अपराधियों के कुनबे फलते थे। जब स्कूलों की जगह भय की दीवारें खड़ी थीं और जब ‘शाम’ शब्द खतरे का पर्याय बन गया था। इस चुनाव में जनता ने उस इतिहास का हिसाब चुकता कर दिया।
बिहार ने दिखा दिया कि नेता चाहे कितने भाषण दे दें, जनता अंततः उन्हीं का हाथ पकड़ेगी जो व्यवस्था देते हैं, अवसर देते हैं और सम्मान देते हैं। बिहार ने जंगलराज का अध्याय बंद कर दिया है, और जनराज का पन्ना खोल दिया है।
यह चुनाव एक घोषणा है कि बिहार बदल रहा है, बिहार समझ रहा है, बिहार आगे बढ़ना चाहता है और वह किसी भी कीमत पर अराजकता को अपने सपनों में घुसने नहीं देगा। यही बिहार की जन-इच्छा है। यही जेन-जी की जनभावना है। यही लोकतंत्र की जनघोषणा है। यही बिहार का नया इतिहास है।

















