भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था, वह आत्मा की मुक्ति का आंदोलन भी था। उस आत्मा की सबसे प्रखर अभिव्यक्ति थी-‘वंदे मातरम्’। 1901 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में दक्षिणरंजन सेन ने जब पियानो पर यह गीत बजाया, तो पूरा सभागार ‘वंदे मातरम्’ के स्वर से गूंज उठा। यही वह अधिवेशन था, जहां महात्मा गांधी पहली बार कांग्रेस के मंच पर उपस्थित हुए। बाद में उन्होंने ओपिनियन पत्रिका में ‘वंदे मातरम्’ को भारत का राष्ट्रगान घोषित करने का प्रस्ताव रखा।

इतिहास संकलन समिति, महाकाैशल प्रांत
आचार्य जे.बी. कृपलानी ने सिस्टर निवेदिता अकादमी के प्रथम प्रकाशन, वी. रंगराजन द्वारा लिखित ‘वंदे मातरम्’ की प्रस्तावना (21 अप्रैल, 1977) में लिखा, ‘‘श्री वी. रंगराजन ने हमारे राष्ट्रगान ‘वंदे मातरम्’ का इतिहास प्रस्तुत करने में मौलिक कार्य किया है। स्वतंत्रता पूर्व हजारों देशभक्तों को इस गीत को गाने में कष्ट सहने पड़े, अनेक ने प्राण तक न्योछावर किए। खुदीराम बोस से लेकर भगत सिंह और राजगुरु तक, हर देशभक्त ने ‘वंदे मातरम्’ के मंत्र को अपने होंठों पर लिए प्राण त्यागे। यह स्वत: स्फूर्त रूप से राष्ट्रगान बन गया था।’’
राष्ट्रभाव से राष्ट्रगीत तक
‘वंदे मातरम्’ 24 पंक्तियों का काव्य है, जो चार छंदों में विभाजित है। पहला छंद मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता, समृद्धि और गरिमा का वर्णन करता है। दूसरे छंद में मातृभूमि को सशक्त मां के रूप में चित्रित किया गया है, जो अपनी संतानों की सामूहिक शक्ति से शत्रुओं का संहार करती है। तीसरे और चौथे छंद में भारत माता की तुलना देवी दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती से की गई है, जो क्रमशः शक्ति, संपदा और ज्ञान की देवी हैं। इस प्रकार, बंकिमचंद्र ने मातृभूमि को न केवल एक भौगोलिक स्थान के रूप में, बल्कि एक नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है।
लाला लाजपत राय ने ‘वंदे मातरम्’ नामक उर्दू अखबार निकाला, जिसके संपादन में विपिनचंद्र पाल और महर्षि अरविंद जैसे प्रखर राष्ट्रनायक जुड़े। इससे ब्रिटिश सरकार असहज हुई और 1907 में मुकदमा चलाकर संपादक विपिनचंद्र पाल को जेल भेज दिया। पर यह दमन राष्ट्रभाव को और प्रज्ज्वलित कर गया। इस गीत की प्रतिध्वनि दक्षिण तक पहुंची। तमिल कवि सुब्रमण्य भारती ने इसे तमिल में गाया और पंतलु ने इसे तेलुगु में रूपांतरित किया। इस प्रकार ‘वंदे मातरम्’ भारतीय भूगोल, भाषाओं और लोकमानस में गहराई से रच-बस गया। परंतु समय के साथ राजनीति ने इसे ‘तुष्टीकरण की नीति’ का विषय बना दिया। काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन में प्रसिद्ध संगीतज्ञ पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर द्वारा ‘वंदे मातरम्’ के गायन पर मौलाना मोहम्मद जौहर अली ने आपत्ति जताई। यह राष्ट्रगीत, जो सबको जोड़ने वाला था, वहीं से विभाजन की राजनीति के घेरे में आ गया। आज इसकी 150वीं वर्षगांठ पर भी वही विरोध स्वर सुनाई दे रहा है।
1906 में मुस्लिम लीग के गठन के बाद विरोध संगठित हुआ। लीग के नेताओं का कहना था कि इस गीत में देवी दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती आदि देवियों का उल्लेख है, जो इस्लामी तौहीद (एकेश्वरवाद) के सिद्धांत के विपरीत है। 1930 के दशक में मुस्लिम लीग और कुछ उलेमाओं ने विरोध को तूल दिया, तब मौलाना अबुल कलाम आजाद ने बीच का रास्ता सुझाया कि ‘वंदे मातरम्’ के केवल पहले दो पदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जाए, क्योंकि इसमें सांस्कृतिक और भौतिक वर्णन हैं। इस मांग से कांग्रेस दोराहे पर आ गई। एक तरफ राष्ट्रगीत का सम्मान था, तो दूसरी तरफ मजहबी भावनाओं का संतुलन।
कई कांग्रेस नेताओं, विशेषकर गोपाल कृष्ण गोखले और लोकमान्य तिलक ने इसे राष्ट्र की आत्मा बताया। लेकिन महात्मा गांधी ने सुलह का एक और रास्ता सुझाया। फिर भी कांग्रेस ने मुस्लिम प्रतिनिधियों की असहजता को देखते हुए 1937 में केवल पहले दो पदों को आधिकारिक राष्ट्रगीत माना। इसी समय से गीत के प्रति राजनीतिक तुष्टीकरण की भावना जुड़ी। स्वतंत्रता संग्राम में ‘वंदे मातरम्’ के विरोध का प्रश्न गंभीर है, क्योंकि यह हर आंदोलन का घोषवाक्य था। 15 अगस्त, 1947 को सरदार पटेल के निमंत्रण पर पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने इसे पूरे उत्साह से गाया, जिसने स्वतंत्र भारत की पहली सुबह को पावन बना दिया। इस गीत की विविध रागों में प्रस्तुतियों ने मातृभूमि की वंदना को भिन्न-भिन्न संगीत रूपों में जीवंत किया, परंतु राजनीति ने इस संगीत को भी संकीर्ण वर्गीय विवादों में बांट दिया।
मुस्लिम देश बनाम भारत
विश्व के सबसे बड़े मुस्लिम देश, इंडोनेशिया का राष्ट्रीय प्रतीक गरुड़ व मुद्रा पर गणेश की छवि अंकित है। वहां की सरकार वार्षिक ‘रामायण महोत्सव’ मनाती है, लेकिन कोई मुस्लिम संगठन इसका विरोध नहीं करता। तुर्की के राष्ट्रगान ‘इस्तिकलाल मार्शी’ में मातृभूमि के प्रति शपथ है। वहां की ‘अनवतन पार्टी’ का अर्थ ही ‘मातृभूमि पार्टी’ है। मिस्र के राष्ट्रीय प्रतीक स्फिंक्स और पिरामिड, जो इस्लाम-पूर्व मूर्तियां हैं, को राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक माना जाता है। बांग्लादेश में भी दुर्गा पूजा पर सार्वजनिक अवकाश होता है। इसी तरह, मलेशिया में तमिल-हिंदू त्योहार थाईपुसम कई राज्यों में सरकारी स्तर पर मनाया जाता है। यूएई में दीपावली और अन्नकूट जैसे हिंदू पर्व मनाए जाते हैं। यही नहीं, मिस्र के राष्ट्रगीत में भी धरती माता का उल्लेख है। मालदीव के राष्ट्रगीत में कई बार सलाम आता है, वहीं जॉर्डन में बादशाह को सलाम किया जाता है। चीन, रूस, जर्मनी आदि देशों में मातृभूमि या पितृभूमि का सम्मान होता है। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि मुसलमान बहुल देशों में भी मातृभूमि और राष्ट्रीय प्रतीकों सम्मान होता है, जब उन्हें मजहब से हटकर सांस्कृतिक और राष्ट्रीय संदर्भ में प्रस्तुत किया जाता है।
जब रेडियो केंद्र की बत्ती गुल कर दी
7 अगस्त, 1938 को शास्त्रीय गायक मास्टर कृष्णराव ने मुंबई रेडियो स्टेशन में शास्त्रीय गायन ‘वंदे मातरम्’ को जोड़कर गाया। तब स्टे शन निदेशक जेड.ए. बुखारी ने बिजली गुल कर प्रसारण रोक दिया। इस घटना के बाद पुणे-मुंबई के अखबारों के पहले पन्ने पर खबर छपी- ‘मुंबई रेडियो केंद्र पर ‘वंदे मातरम्’ का गला दबोच दिया गया’, ‘मास्टर कृष्णराव के कर्ण-मधुर गायन का निंदनीय अंत’। इसके बाद कृष्णराव ने 10 वर्ष तक आकाशवाणी का बहिष्कार किया। पर अपने कार्यक्रमों में न केवल ‘वंदे मातरम्’ गाते रहे, बल्कि इसके सामूहिक गान की शुरुआत कराई। इसी क्रम में पुणे में उन्होंने 50,000 श्रोताओं से ‘वंदे मातरम्’ का सामूहिक गायन करवाया। लगभग एक दशक बाद 1947 में सरदार वल्लभ भाई पटेल के आग्रह पर उन्होंने स्टेशन निदेशक बुखारी की उपस्थिति में पूरा ‘वंदे मातरम्’ गाया। इसके प्रसारण के साथ उनका आकाशवाणी के बहिष्कार का प्रण भी समाप्त हुआ।
संविधान सभा में बहस
जब संविधान सभा भारत का संविधान तैयार कर रही थी, तब ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम्’, दोनों गीतों पर विचार हुआ। कई सदस्यों ने ‘वंदे मातरम्’ को प्राथमिकता दी, लेकिन इसके कुछ पदों में देवी-पूजा के संकेतों के कारण मुस्लिम प्रतिनिधियों ने आपत्ति जताई। 1948 में कई सदस्यों ने यह प्रश्न उठाया कि क्या ‘वंदे मातरम्’ का धार्मिक स्वरूप भारत की पंथनिरपेक्ष भावना से मेल खाता है? लंबी बहस के बाद अंतत: 24 जनवरी, 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ऐतिहासिक घोषणा की कि ‘जन गण मन’ को राष्ट्रीय गान बनाया जाएगा और ‘वंदे मातरम्’ को समान सम्मान के साथ राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया जाएगा। इससे मजहबी भावनाओं और राष्ट्रभाव के बीच संतुलन कायम हुआ।
सम्मान अधूरा
1976 में जब 42वां संविधान संशोधन हुआ तो उसमें अनुच्छेद 51ए(ए) जोड़ा गया, जिसमें नागरिकों का कर्तव्य बताया गया है कि वे संविधान, उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज व राष्ट्रगान का सम्मान करें। इसमें विशेष रूप से ‘वंदे मातरम्’ का उल्लेख नहीं है, जिससे यह स्पष्ट नहीं होता कि इसका कारण क्या था। यह सवाल भी उठता है कि ‘वंदे मातरम्’ को संविधान में स्पष्ट रूप से न जोड़ना क्या राष्ट्र की आत्मा के साथ खिलवाड़ है? हालांकि, अदालत ने इसका सम्मान संविधान की मूल भावना से जोड़ा है। 2017 के श्याम नारायण चोकसे एवं यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्देश में कहा है कि राष्ट्रीय प्रतीक, झंडा, राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत सभी का सम्मान संविधान की भावना में शामिल है, यानी नाम न भी हो तो भी सम्मान जरूरी है। परंतु इस सम्मान को व्यवहार में लागू करना, जैसे गाना या खड़े होना, कानूनी तौर पर अनिवार्य नहीं है। प्रश्न है-क्या किसी गीत का सम्मान केवल भावना से होगा या उसे कानूनी और राष्ट्रीय मान्यता भी दी जानी चाहिए?
‘वंदे मातरम्’ की 150वीं जयंती भारत के लिए राष्ट्रीय आत्मा के पुनर्जागरण का अवसर है। इसलिए सरकार और संसद को चाहिए कि वह ‘वंदे मातरम्’ को औपचारिक ‘राष्ट्रगीत’ घोषित कर इसे ‘जन गण मन’ जैसा संवैधानिक दर्जा दे। संविधान के अनुच्छेद 51ए में संशोधन कर ‘राष्ट्रगीत’ शब्द शामिल किया जाए। स्कूलों और सरकारी संस्थानों में इसे राष्ट्रगान के समान महत्व दिया जाए। इसे किसी मत विशेष का गीत न मानकर ‘भारतीय’ गीत कहा जाए। इतिहास की पुस्तकों में इसकी महत्ता बताई जाए और ‘वंदे मातरम् दिवस’, निबंध, गीत प्रतियोगिताएं आयोजित हों।
संसद और विधानसभाओं के सत्र ‘वंदे मातरम्’ के साथ प्रारंभ किए जाएं और राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में इसे स्थान दिया जाए। अभियान चलाकर युवाओं में इसके प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए। संगीतकारों, कवियों और फिल्मकारों को नए रूप में प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित किया जाए। ‘वंदे मातरम्’ को सर्वधर्म प्रतीक बनाकर भारतीय नागरिकता का गीत घोषित किया जाए। इसमें मातृभूमि के प्राकृतिक सौंदर्य, समृद्धि और सांस्कृतिक सम्मान की अभिव्यक्ति है, न कि किसी पंथ की आराधना। यह गीत मातृभूमि के प्रति करुणा, कृतज्ञता और गर्व का प्रतीक है। किसान, सैनिक और मां के प्रेम में ‘वंदे मातरम्’ की आत्मा बसी है। अतः ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, भारत की आत्मा का अमर स्वर है। 150वीं जयंती इस महान धरोहर को नई संवैधानिक मान्यता देने का सुनहरा अवसर है।

















