अखिल भारतीय साहित्य परिषद के 17वें अधिवेशन में डॉ कुमुद शर्मा ने प्रथम सत्र को संबोधित करते हुए ‘आत्म बोध से विश्व बोध’ विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत का विश्व को इसके वेदों और आध्यात्मिकता का संदेश जाएगा। क्योंकि जब जीव का ब्रह्म के साथ एकत्व हो जाता है तो मनुष्य अपने स्व के चरमोत्कर्ष को प्राप्त कर लेता है। भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल वेद है। हमारे आत्मबोध को प्रभावित करने वाले जो घटक हैं वो हमें वैदिक साहित्य से ही मिलते हैं। वहीं से हमें अपनी अंतर्रदृष्टि मिलती है।
इस अंतर्दृष्टि की विशेषता मनुष्य और देव, जड़ और चेतन को एक दूसरे के समान बनाने का मार्ग प्रशस्त करता है। हमारी भाषा, कला, संस्कृति और दर्शन अपने सांस्कृतिक स्वभाव को बढ़ाने के लिए वेदों की तरफ ही जाते हैं। शायद इसीलिए किसी ने बहुत सही बात कही है कि हमारे देश की विशेषता राजा या साम्राज्य अथवा युद्ध नहीं हैं। देश की विशेषता हमारे ऋषि और धर्म ग्रंथ हैं। वर्षों से ही हमारे साहित्यकारों ने इन्हीं से प्रेरणा ली है। और इसीलिए वेद के बाद वेदों की परंपरा में जिस साहित्य की रचना की गई, वह वेदों को ही सार्थकता प्रदान करती है।
रामचरित मानस का उदाहरण
इस मौके पर वेदों की सार्थकता को लेकर एक उदाहरण देते हुए कुमुद शर्मा ने कहा कि गोरखपुर की गीता प्रेस से जिस रामचरित मानस का प्रकाशन होता है, उसमें एक तथ्य लिखा है कि तुलसी रचित रामचरित मानस को वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में रखा गया तो उस पर लिख कर आया सत्यम शिवम सुंदरम। लेकिन, गोस्वामी तुलसीदास की कृतियों से ईर्ष्या करने वाले पंडितों इसे मानने से इंकार करते हुए कहा कि इसकी और अच्छे से परीक्षा होनी चाहिए। इसके तहत परीक्षा भी ली गई, जिसमें एक सिक्वेंस में उनके आलोचना करने वालों ने सबसे ऊपर वेद, उसके नीचे, उपनिषद फिर स्मृतियां और फिर सबसे नीचे रामचरित मानस को रखा। जब काशी विश्वनाथ मंदिर का कपाट बंद हुआ और दूसरे दिन उसे खोला गया तो सबसे ऊपर रामचरित मानस मिली।
ये कुछ और नहीं विकास का एक क्रम है। असल में रामचरित मानस वेद को सार्थक बनाने का कार्य करता है। और वेदों के निचोड़ की बात करें तो काल का नाद, सृष्टि की निरंतरता, सत्य का सिद्धांत , मानवता का मंगल विधान, सर्वग्राहिता, परस्पर दृढ़ता, समग्रता बोध, कर्मयोग, यज्ञशाला, प्रकृति, मनुष्य ये सब मिलकर आपके भीतर एक दूसरे से मिलकर जुड़ने का संयोग बनाते हैं। यही वो सूत्र हैं, जो कि प्रकृति को मनुष्य और मनुष्य को प्रकृति का आकांक्षी बनाते हैं। मतलब ये कि वेद के बाद हमारी जो काव्यात्मक विधा चलती है, हमारी जो संपदा, व्याकरण और मूल का बोध सब वहीं से जन्म लेते हैं।
हम अलग-अलग प्रांतों में बसते हैं और हमारी परंपराएं व रीतियां अलग-अलग हैं। लेकिन, इन सब के बाद भी हम अपने देश के धर्मग्रंथों, इतिहास, पुराणों से एकत्व को महसूस करते हैं। हमारी भारतीय भाषाओं में हमारे साहित्यकार अपने अंत: को जानने के लिए वेदों और पुराणों की ओर ही जाते हैं और वहां अपने सांस्कृतिक बोध और अपने आत्मबोध से परिचित होते हैं।

















