वाराणसी: बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) के सोशल साइंस फैकल्टी के हिस्ट्री डिपार्टमेंट में चौथे सेमेस्टर की पोस्टग्रेजुएट परीक्षा में पूछा गया एक सवाल विवाद का विषय बन गया है। प्रश्न था: “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता से आप क्या समझते हैं? चर्चा कीजिए कि किस प्रकार ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ने प्राचीन भारत में महिलाओं की प्रगति में बाधा डाली?” ज्योतिष विभाग के प्रोफेसर सुभाष पांडे ने कहा कि यह प्रश्न बिल्कुल निराधार है। काशी विद्वत परिषद के सदस्य और BHU में प्रोफेसर विनय पांडे ने कहा कि यह सवाल बेबुनियाद है और BHU ऐसे सवाल रखने के पूरी तरह खिलाफ है।
बीएचयू का पक्ष: प्रश्न अकादमिक संदर्भ में पूछा गया, विवाद अनावश्यक
इतिहास विभाग की प्रोफेसर अनुराधा सिंह के अनुसार, शब्द समय, स्थान और परिस्थितियों के अनुसार बदलते हैं। ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ जैसा शब्द 90 के दशक में प्रचलित होना शुरू हुआ था। प्राचीन काल में महिलाओं की क्या स्थिति थी, उसका आकलन अब करना उचित नहीं है। यदि प्राचीन काल में कहीं महिलाओं की स्थिति खराब थी, तो उससे पूरे भारतवर्ष का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए। बीएचयू प्रशासन ने इस विवाद पर अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों को शैक्षणिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। विश्वविद्यालय के अनुसार, संबंधित प्रश्न ‘वुमेन इन मॉडर्न इंडियन हिस्ट्री’ विषय के निर्धारित पाठ्यक्रम का हिस्सा था। बीएचयू प्रशासन ने कहा कि विद्यार्थियों में ज्ञान और विश्लेषणात्मक क्षमता विकसित करने के लिए जरूरी है कि वे पाठ्यक्रम से जुड़े अलग-अलग पक्षों और संदर्भों को समझें। बीएचयू ने यह भी साफ किया कि इस मुद्दे को लेकर किसी तरह का अनावश्यक विवाद खड़ा नहीं किया जाना चाहिए।
एबीवीपी ने प्रश्न को वैचारिक पूर्वाग्रह से प्रेरित बताया
इस प्रश्न को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी), बीएचयू इकाई ने इतिहास विभाग का घेराव कर विरोध प्रदर्शन किया। इसके बाद परिषद के प्रतिनिधिमंडल ने विभागाध्यक्ष से मुलाकात की और उन्हें ज्ञापन सौंपा। परिषद ने उक्त प्रकरण की निष्पक्ष समीक्षा और आवश्यक कार्रवाई की मांग की है। एबीवीपी का कहना है कि विश्वविद्यालयों में अकादमिक विमर्श के नाम पर वैचारिक पूर्वाग्रहों से प्रेरित प्रश्न पूछना शिक्षा की मूल भावना के विरुद्ध है। परिषद ने आरोप लगाया कि भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और सभ्यता को एकांगी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने का प्रयास कुछ वर्गों द्वारा लगातार किया जा रहा है। “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” जैसी शब्दावली न केवल वैचारिक रूप से विवादित है, बल्कि इसका कोई स्पष्ट एवं सर्वमान्य अकादमिक आधार भी नहीं है। ऐसे प्रश्न विद्यार्थियों पर एक विशेष विचारधारा थोपने का प्रयास प्रतीत होते हैं।
पाठ्यक्रम के दायरे में था प्रश्न, विशेषज्ञों ने बताया अकादमिक मुद्दा
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, बीएचयू इकाई के अध्यक्ष पल्लव सुमन ने कहा, “काशी हिंदू विश्वविद्यालय जैसी प्रतिष्ठित संस्था में विद्यार्थियों से वैचारिक रूप से प्रेरित प्रश्न पूछना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। विश्वविद्यालय ज्ञान, शोध और निष्पक्ष चिंतन का केंद्र होना चाहिए, न कि किसी विशेष विचारधारा के प्रचार का माध्यम। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को निरंतर अपराधबोध के दायरे में खड़ा करने का प्रयास अब छात्र समाज स्वीकार नहीं करेगा।” उल्लेखनीय है कि तीन घंटे के प्रश्न-पत्र में तीन अलग-अलग सेक्शन थे, जिनमें लघु उत्तरीय, दीर्घ उत्तरीय और वैकल्पिक प्रश्न शामिल थे। हालांकि जानकारों का कहना है कि यह प्रश्न निर्धारित पाठ्यक्रम के दायरे में ही पूछा गया था और इसे शैक्षणिक परिप्रेक्ष्य से ही देखा जाना चाहिए। वैकल्पिक प्रश्नों में गेरडा लर्नर की पुस्तक ‘द क्रिएशन ऑफ पितृसत्ता’ के मुख्य तर्कों, नारीवाद की परिभाषा तथा नारीवाद की तीन लहरों पर भी प्रश्न पूछे गए थे।
















