अखिल भारतीय साहित्य परिषद का 17वां अधिवेशन: आत्मबोध से विश्वबोध साहित्य ही सिखाता है-रामनाथ कोविंद
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अखिल भारतीय साहित्य परिषद का 17वां अधिवेशन: आत्मबोध से विश्वबोध साहित्य ही सिखाता है-रामनाथ कोविंद

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के 17वें अधिवेशन में रामनाथ कोविंद ने कहा- आत्मबोध से विश्व बोध तक साहित्य ही मार्गदर्शक है। रीवा की विरासत, राष्ट्र चेतना और हिंदी का सेतु रोल पर प्रेरक संबोधन।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Nov 7, 2025, 07:12 pm IST
in कला-साहित्य, मध्य प्रदेश
dr Ramnath Kovind Akhil bhartiya sahitya Parishad

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के 17वें अधिवेशन को संबोधित करते पूर्व राष्ट्रपति डॉ रामनाथ कोविंद

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के 17वें अधिवेशन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए पूर्व राष्ट्रपति डॉ रामनाथ कोविंद ने सत्य और साहित्य के मुद्दे पर बात की। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि जब सत्य और साहित्य का सामंजस्य हो जाता है तो वो विज्ञान से भी बड़ा बन जाता है। एक उदाहरण के साथ समझाते हुए पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि सत्य ये है कि गुलाब का फूल है, लेकिन एक सत्य ये भी है कि कांटे पहले आएंगे और फूल बाद में आएंगे।

रीवा के साहित्य में योगदान की सराहना करते हुए पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि विंध्य की ये धरती साहित्य, संगीत और साधना की पवित्र भूमि रही है। यहां तानसेन और बीरबल के सुरों की उत्पत्ति भी यहीं से हुई है। यहीं पर महाराज विश्वनाथ सिंह के द्वारा हिंदी भाषा के पहले नाटक की भी रचना हुई। यहीं पर महाराजा कर्णदेव, रेवा प्रसाद द्विवेदी, सैफुद्दीन सैफू और शेषमणि शर्मा जैसे साहित्यकारों ने भारतीय साहित्य को समृद्ध बनाया।

इस मौके पर पूर्व राष्ट्रपति ने सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी और नौसेना चीफ एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी का जिक्र करते हुए कहा कि ये दोनों विभूति केवल रीवा ही नहीं पूरे राष्ट्र के लिए प्रेरणा के स्त्रोत हैं। इन दोनों ने रीवा के ही सैनिक स्कूल से शिक्षा ग्रहण की। इस दौरान उन्होंने इन दोनों ही अधिकारियों के उज्जव भविष्य की कामना की और कहा कि जब मैं राष्ट्रपति था तो इन दोनों ही अधिकारियों से मेरा संपर्क रहा है। उन्होंने साहित्य के मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए कहा कि भारतीय दर्शन में कहा गया है कि ‘आत्मानम् विधंति जगद्विधति’ अर्थात अपने को जानों उसके बाद जगत स्वत: प्रकट होता है।

उपनिषदों से लेकर महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर तक हमारे आचार चिंतन का आधार रहा है। यहां अपने आपको जानने का आशय अपने भीतर के मूल स्वरूप, अपने भीतर की सामाजिक चेतना का बोध होना है। रीवा सफेद शेरों के लिए प्रसिद्ध है और जब भी मैं एडमिरल दिनेश त्रिपाठी से मिलता हूं तो मुझे रीवा की याद आती है सफेद शेर की, क्योंकि वो हमेशा सफेद परिधान में ही रहते हैं। जब आपका आत्मबोध गहराई से जागृत होता है तो फिर आत्मबोध से कुटंब बोध, फिर संस्था और फिर समाज बोध, समाज बोध से राष्ट्र बोध और राष्ट्र बोध से पूरी प्रकृति के एकत्व बोध से होते हुए ये विश्व बोध में परिवर्तित हो जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि खुद को जानने वाला ही विश्व को सही तरीके से समझ सकता है। शास्त्रों में इसे ही वसुधैव कुटुंबकम् कहा गया है।

इस अधिवेशन का विषय आत्मबोध से विश्व बोध है। यह हमारी राष्ट्रीय चेतना और आत्मा को जगाने और उसे वैश्विक संदर्भ में प्रस्तुत करने का आह्वान है। इस आत्मबोध की चेतना क्षीण होने लगती है तो ही इसका महत्व समझ आता है, क्योंकि ऐसा होने पर व्यक्ति या राष्ट्र दोनों ही अपने मूल से भटक जाता है। आत्म चेतना ही हमें अपने उद्देश्य का बोध कराती है। लेकिन, इसके कमजोर होने पर बाहरी शक्तियों का आक्रमण हमारी सीमाओं पर ही नहीं, हमारी संस्कृति और आत्मा पर होने लगता है। यही वो कारण था कि विदेशी शक्तियों पर हमारे ऊपर शासन करने का मौका मिला। इसीलिए कहा गया है कि जब व्यक्ति स्वयं को भूलता है तो संसार भी उसे भूल जाता है।

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गुलामी के दिनों को किया याद

पूर्व राष्ट्रपति ने आत्मबोध के महत्व पर जोर डालते हुए कहा कि इसके क्षरण के चलते ही हमारे से औपनिवेशक शासन के दौरान हुआ। हमारी भाषा, परंपरा औऱ प्राचीन शिक्षण पद्धतियों पर सवाल खड़े किए गए। ताकि सनै:-सनै: हम अपने ही गौरव को भूल जाएं। हुआ भी ऐसा ही स्वतंत्रता मिलने के तुरंत बाद ये मानसिक गुलामी तुरंत समाप्त नहीं हुई। 1947 में राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिल गई, लेकिन मानसिक स्वतंत्रता अब पिछले कुछ दशकों में बढ़ी है। आज भारत फिर से अपनी जड़ों से जुड़ रहा है और अपनी विरासत पर गर्व कर रहा है। यह पुनर्जागरण ही एक दिन हमारे सुनहरे भविष्य का आधार बनेगा। साहित्य किसी भी सभ्यता का आधार होता है। साहित्य का ये सामर्थ्य है कि वो बिखरी सोच को जोड़ कर एकत्व की भावना को पैदा करता है।

राष्ट्र की चेतना को जागृत करता है साहित्य

डॉ रामनाथ कोविंद कहते हैं कि साहित्य हमारे राष्ट्र की चेतना को जागृत करता है और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन बड़ा उदाहरण है। जब विदेशी शासन ने भारत की राजनीतिक ही नहीं मानसिक स्वतंत्रता को भी जकड़ने का प्रयास किया था। तब साहित्य ने आत्म गौरव की ज्योति जलाई। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के द्वारा रचित वंदे मातरम् का आज 150 वां वर्ष पूरा हो रहा है। पूरा देश इसका उत्सव मना रहा है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर के जन गण मन ने भी भारत को सांस्कृतिक चेतना से जोड़ दिया।

लोकमान्य तिलक, भारतेन्दु हरिश्नचंद्र, मैथिलीशरण गुप्त और सुब्रमण्यम भारती समेत अनगिनत कवियों और लेखकों ने भारतीय जन मानस को ये अहसास कराया कि गुलामी हमारी मजबूरी होती है और स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। आज एक बार फिर से भारत वैश्विक मंच पर अपने स्वत्व, आत्मनिर्भरता के साथ उभर रहा है। हमने 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य रखा है और ऐसे में साहित्य को एक मार्गदर्शक की भूमिका अदा करनी है।

भाषा विवाद पर बोले पूर्व राष्ट्रपति

पूर्व राष्ट्रपति डॉ रामनाथ कोविंद ने भाषा विवाद पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कुछ लोगों को भ्रान्तियां है कि हिन्दी भाषा बाकी की क्षेत्रीय भाषाओं के साथ प्रतियोगिता कर रही है। लेकिन, ऐसा नहीं है ऐसा कुछ राजनीतिक पार्टियां अपने स्वार्थ के वैमनस्य फैला रही हैं। हकीकत केवल इतना ही है कि हिन्दी भाषा का उद्देश्य क्षेत्रीय भाषाओं की जगह लेना नहीं है। ये तो एक सेतु की तरह है।

Topics: Ramnath Kovindरामनाथ कोविंदआत्मबोध विश्व बोधरीवा साहित्यिक विरासतसाहित्यAll India Sahitya Parishad 17th sessionअखिल भारतीय साहित्य परिषदAtmabodh Vishwa BodhLiteratureRewa Literary HeritageVasudhaiva Kutumbakamवसुधैव कुटुंबकम्All India Sahitya Parishad
कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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