सनातन धर्म की विशालता और सहृदयता ने विभिन्न विचारों, मतों तथा पंथों को अपने भीतर इस तरह से समाहित किया जैसे विभिन्न नदियां अलग-अलग मार्ग से होते हुए अंततः सागर से एकाकार करती हैं। सनातन धर्म भारतवर्ष की आत्मा है। भारत भूमि की आध्यात्मिक छटा को जीवंत करने वाली ऊर्जा भारत का वह सहिष्णु दर्शन ही है जिसने विपरीत विचारों का भी आलिंगन कर यह विचार प्रस्तुत किया — “एकम् सत् विप्र बहुधा वदन्ति” अर्थात एक सत्य को ही विप्रजन या ज्ञानी पुरुष विभिन्न शब्दों में अपने-अपने अनुभव के अनुसार अभिव्यक्त करते हैं।
यह भारत का दर्शन ही है जिसने अनेक प्रहार सहकर भी भारत भूमि में इस तरह प्राणों का संचार किया जैसे दम तोड़ती मरुभूमि को वर्षा की बूंदों का उपहार मिलना। अपनी इस सहिष्णुता का मूल भारत ने अपने ऊपर सांस्कृतिक आघात सहकर चुकाया। कुछ घाव भरे और कुछ आज भी पीड़ा देते हैं। सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण, काशी विश्वनाथ मंदिर पर आक्रमण तथा दर्शन, गणित, विज्ञान, चिकित्सा जैसे बहुमुखी विषयों का केंद्र रहे नालंदा विश्वविद्यालय पर आक्रमण — ये इतिहास की ऐसी घटनाएं हैं जिनसे सनातन धर्म से घृणा करने वाले तथा इसे मिटाने के स्वप्न देखने वाले भी मुंह नहीं मोड़ सकते।
सनातन धर्म का वास्तविक स्वरूप
सनातन धर्म की विकृत परिभाषा प्रस्तुत कर उसे समाज को विभाजित करने वाला बताने वाले लोग सनातन धर्म को उन परंपराओं का द्योतक मानते हैं, जिनसे वास्तव में सनातन धर्म का कोई सरोकार नहीं। सनातन धर्म का मूल तत्व तो उस दर्शन में, उस विचार में निहित है जो अनेकता में एकता की बात करता है, जो “वसुधैव कुटुम्बकम्” की बात करता है तथा जो “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” की बात करता है।
परंपराओं, मान्यताओं तथा पद्धतियों से होते हुए सभी विचार उस मूल तत्व तक पहुंचते हैं। यही कारण है कि शैव्य, शाक्त, वैष्णव, तंत्र, भक्ति, स्थान तथा ग्राम देवता जैसी विभिन्न वृहद विचार परंपराओं के होते हुए भी सभी में एक समन्वय दिखाई देता है और यदि कहीं संघर्ष होता भी है तो वह धर्म की खंडित परिभाषा को आत्मसात करने का परिणाम है।
आध्यात्म और विज्ञान का संबंध
आधुनिक विज्ञानवादी तर्क देते हैं कि आध्यात्म और विज्ञान दो भिन्न विषय हैं। सतही रूप से यह संभव हो सकता है, पर मेरे मतानुसार गहन अध्ययन करने से समझ आता है कि सभी विषयों में एक गूढ़ एकत्व स्थापित है। अब यह समझने वाले की बौद्धिक क्षमता पर निर्भर करता है कि वह क्या समझता है, परंतु अपनी क्षमता से सत्य को भिन्न-भिन्न शब्दों तथा भाषाओं में परिभाषित कर देने से सत्य बदल नहीं जाता। सत्य तो वह मूल तत्व है जो देश, काल और परिस्थिति से ऊपर है और सदा विद्यमान रहेगा।
जो विचार आधुनिक विज्ञान ने आज सिद्ध किए हैं, जहां यह विचार स्पष्ट होता है कि पदार्थ ऊर्जा का ही एक परिवर्तित रूप है क्योंकि ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न उसका विनाश संभव है, परंतु ऊर्जा के गुण, रूप और धर्म में परिवर्तन होता रहता है — यही विचार उपनिषदों ने सभ्यताओं के जन्म लेने से पहले कह दिए थे।
तैत्तिरीय उपनिषद के अनुसार ब्रह्म तत्व से आकाश तत्व उत्पन्न हुआ, आकाश तत्व से वायु तत्व, वायु तत्व से अग्नि तत्व, अग्नि से जल तथा जल से पृथ्वी तत्व उत्पन्न हुआ। सूक्ष्म रूप में स्थित इन पंचतत्वों के पंचीकरण के बाद स्थूल तत्व (पंचमहाभूत) अर्थात स्थूल जगत बना। इस विचार से “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” तथा “E=mc²” में कोई भेद दिखाई नहीं देता।
भारत की सांस्कृतिक चुनौतियां और पुनर्जागरण
सदियों की गुलामी, अपने मूल तत्व से दूर होकर मात्र सतही स्तर पर धर्म का अनुपालन, और बाहरी आक्रांताओं द्वारा उत्पन्न की गई सामाजिक फूट के कारण सदियों तक हमारी जीवन ऊर्जा केवल जीवित रहने और जीविकोपार्जन में नष्ट होती रही और हमारे मूल विचारों के प्रति हमारे मानस पटल में हीनता भर दी गई। यह स्थिति एक बार नहीं हुई, बल्कि विभिन्न कालखंडों में अलग-अलग रूपों में हुई, जिसके लिए विभिन्न रूपों में दैवीय कृपा ने ही भारत भूमि की रक्षा की।
आदि शंकराचार्य और वैदिक पुनर्जागरण
एक ऐसा समय आया जब बौद्ध मत अपने चरम पर था। हिंदू धर्म में वैदिक परंपरा का हास हो रहा था तथा लोग अनुष्ठान पद्धतियों तक सीमित हो चुके थे। ऐसे में भारत के दार्शनिक पुनर्जागरण के लिए आदि शंकराचार्य का उदय हुआ। हिंदू धर्म को नियमित करने के लिए आदि शंकराचार्य ने सामाजिक रूप से हिंदू धर्म तथा संन्यासियों के लिए नियम बनाए और मठों की स्थापना की तथा दार्शनिक रूप से ग्रंथों पर भाष्य लिखे, जिससे सनातन धर्म का मूल दर्शन जन-जन के लिए सहजता से उपलब्ध हो सके।
भक्तिकाल और सामाजिक समरसता
इसके बाद मुगल तथा ब्रिटिश काल आया जिसने हिंदू धर्म के लिए कई कठिनाइयां उत्पन्न कीं। ऐसे में समाज में अखंडता और दृढ़ता बनी रहे, इसके लिए संपूर्ण भक्तिकालीन संतों ने भारत भूमि का उद्धार किया। सूरदास, कबीरदास, गोस्वामी तुलसीदास, रहीमदास, स्वामी हरिदास, मीराबाई, संत तुकाराम, चैतन्य महाप्रभु आदि संतों तथा भक्तिकालीन कवियों ने भारत में सामाजिक एकता तथा समरसता का संचार किया, जो उस कालखंड में अत्यावश्यक था।
स्वामी विवेकानंद और आधुनिक भारत
तीसरा कालखंड वह था जब नवीन युग भारत की चौखट पर खड़ा था, पर सांस्कृतिक तथा सामाजिक आघातों ने भारत को अपंग बनाने का प्रयत्न किया। ऐसे में उदय हुआ स्वामी विवेकानंद का। “नर सेवा ही नारायण सेवा है” का विचार रखने वाले स्वामी जी का विरोध तो बहुत हुआ, परंतु इसी विचार से सामाजिक एकता तथा उपनिषदों के वाक्यों का वास्तविक जीवन में चरितार्थ हो पाना संभव हुआ, जहां प्रत्येक जीव में ईश्वर के दर्शन की बात सिद्ध होती है।
स्वामी विवेकानंद ने वास्तव में युवाओं को वह दिशा, वह विचार दिए जो आज तक उपयोगी हैं तथा समाज का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
सनातन धर्म पर आघात और वर्तमान चुनौतियां
इन सभी बातों का संक्षिप्त सार बस इतना सा है कि सनातन हिंदू दर्शन के समूल नाश का प्रयास समय-समय पर कई आक्रांताओं द्वारा, कई राष्ट्रविरोधी तत्वों द्वारा किया जाता रहा है, लेकिन हर प्रकार के आघात सहकर भी वास्तव में सनातन धर्म की ध्वजा आज भी लहरा रही है।
भले ही समय के साथ आघात और प्रहारों के तरीकों में परिवर्तन आया हो, भले ही आज भौतिक हिंसा द्वारा दमन न किया जा रहा हो, परंतु हमारे विचार को, हमारी चेतना को राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक रूप से तोड़ने का प्रयत्न भी एक तरह की हिंसा ही है, जो आज के परिदृश्य में दिखाई पड़ रही है।
युवाओं की भूमिका और धर्म रक्षण
परंतु आज धर्म रक्षण का कार्य भी उसी तरह से चल रहा है जिस तरह से विभिन्न कालखंडों पर होता आया है। आवश्यकता है तो समाज में प्रसारित गलत परिभाषाओं को लेकर लोगों को जागरूक कर सनातन धर्म की वास्तविक परिभाषा, वास्तविक मर्म और वास्तविक दर्शन को जन-जन तक पहुंचाने की। संसार को बताने की कि हमारा दर्शन वह दर्शन है जो सभी को ईश्वर स्वरूप देखने की बात करता है, सभी में उस परब्रह्म चैतन्य के दर्शन करता है और बार-बार हमें “तत्त्वमसि” तथा “अहम् ब्रह्मास्मि” जैसे उपनिषदों के महावाक्यों से अपने वास्तविक स्वरूप का बोध कराता है।
लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि हम सबसे पहले स्वयं अपनी जड़ों से जुड़ें। अधिक से अधिक युवा स्वामी विवेकानंद की उस कल्पना को साकार करने के मार्ग में आएं, जिसमें स्वामी जी कहते हैं कि “नचिकेता जैसे दस बालक इस राष्ट्र का भाग्य बदल सकते हैं।”
बृहदारण्यक उपनिषद का संदेश
बृहदारण्यक उपनिषद का वाक्य है —
“ॐ असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मामृतं गमय॥”
अर्थात हम असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरता की ओर अग्रसर हों। जब वास्तव में युवा राष्ट्र निर्माण और धर्म रक्षण में सकारात्मक योगदान देंगे, हम तभी इस वाक्य को चरितार्थ कर पाएंगे।
ॐ तत् सत्

















