वृहत्तर भारत रेशम मार्ग और मध्य एशिया में भारतीय सभ्यता का स्वर्णिम विस्तार
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होम भारत

वृहत्तर भारत रेशम मार्ग और मध्य एशिया में भारतीय सभ्यता का स्वर्णिम विस्तार

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी — edited by Mahak Singh
Jul 12, 2026, 08:00 pm IST
inभारत
(Ai Generated Image)

(Ai Generated Image)

भारत का इतिहास सीमाओं से नहीं बांधा जा सकता। यह विचारों का, संस्कृति का इतिहास है , जिसने हिमालय को पार किया, मरुस्थलों को लांघा और संपूर्ण एशिया को एक सांस्कृतिक धागे में बांध दिया।  भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी  विशेषता यह रही है कि इसने जहां भी प्रवेश किया, राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने की बजाय सांस्कृतिक आत्मीयता का विस्तार किया।

रेशम मार्गों पर जब भारतीय व्यापारियों के कारवाँ  चलते थे, वह अपने साथ मसाले, सूती वस्त्र, चंदन, हाथी दांत, रत्न-आभूषण के साथ-साथ भारत का दर्शन, भाषा, चिकित्सा, कला और जीवन दृष्टि की भी यात्रा कराते थे।  इन कार्यों के पीछे बौद्ध भिक्षु, संत, विचारक भी हिमालय और हिंदूकुश को पार  कर मध्य एशिया पहुंचे। उनके हाथों में तलवार नहीं, भारतीय दर्शन था, उनके पास सेना नहीं करुणा और वसुधैव कुटुंबकम था, उनका उद्देश्य विजय नहीं, संवाद था।  यही कारण है कि भारत और मध्य एशिया का संबंध एक साम्राज्य की कहानी नहीं है, यह सभ्यताओं के संवाद की कहानी है।

आज 21वीं सदी  में जब भारत कनेक्ट -सेंट्रल एशिया नीति,अंतरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC), शंघाई सहयोग संगठन (SCO) मध्य एशिया देश रणनीति साझेदारी को नई गति दे रहा है, तो यह जानना जरूरी है कि यह कोई नई यात्रा नहीं है बल्कि उसे प्राचीन संबंध का आधुनिक पुनर्जागरण है।

मध्य एशिया – हैलफोर्ड ने विश्व का हार्टलैंड कहा

मध्य एशिया में समरकंद, बुखारा, बल्ख , फरगना, खोतान , काश्गर, कुचा , यारकन्द आदि नगर शामिल हैं।  ब्रिटिश भू राजनीतिक चिंतक हैलफोर्ड मैकिंडर ने इस क्षेत्र को विश्व का हार्टलैंड कहा था। भारत के लिए मध्य एशिया का महत्व भू-राजनीतिक के साथ साथ सांस्कृतिक भी है।  इन्हीं मार्गो से व्यापारी आए, विद्वान आए, घोड़े आए, विचार आए और अनेक बार आक्रमणकारी आए।

रेशम मार्ग – विचारों का महामार्ग

जर्मन भूगोलवेत्ता फर्डिनेंड वॉन रिचथोफेन ने सिल्क रूट शब्द का प्रयोग किया जो, बाद में व्यापक रूप से प्रचलित हो गया।  भारत से सूती वस्त्र, मसाले, औषधियां, हाथीदांत ,नील चंदन, बहुमूल्य रत्न  मध्य एशिया पहुंचते थे। चीन से रेशम आता था, मध्य एशिया से घोड़े आते थे।  लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि  इसी  मार्ग से  धर्म-दर्शन, चिकित्सा, ज्योतिष, गणित आदि  भारत से मध्य एशिया और चीन पहुंचा।

सोग्दीय व्यापारी सिल्क रूट के नायक

समरकंद बुखारा के आसपास का क्षेत्र सोग्द कहलाता है और यहीं के व्यापारी, सोग्दीय व्यापारी होते हैं, जो अनेक भाषाओं के ज्ञाता और उत्कृष्ट मध्यस्थ होते हैं।  इन्हीं व्यापारियों के माध्यम से भारत की संस्कृति मध्य एशिया तक पहुंची थी।

तारिम बेसिन – जहां सभ्यताओं ने  एक-दूसरे को पहचाना

मध्य एशिया के दक्षिणी भाग में से तारिम बेसिन देखने में तो मरुस्थलीय क्षेत्र है, यहीं पर व्यापारी, भिक्षु, कलाकार, अनुवादक और विद्वान एक दूसरे से मिलते थे।  यदि नालंदा ज्ञान का स्रोत था तो तारिम बेसिन उसे ज्ञान का प्रसारक था।

खोतान से ल्हासा तक

मौर्येत्तर काल में अनेक बौद्ध भिक्षु, संस्कृत के विद्वान, मूर्तिकार, कलाकार भी यात्रा करने लगे।  चीन के शिनजियांग क्षेत्र में स्थित खोतान भारतीय संस्कृति का दीप स्तंभ था।  भारत से आने वाले व्यापारी कराकोरम और  लद्दाख के मार्ग से  यहां पहुंचते थे, साथ ही चीन और मध्य-एशिया के व्यापारी भी खोतान  में एकत्रित होते थे।  तिब्बती परंपरा में उल्लेख मिलता है कि सम्राट अशोक के पुत्र कुणाल ने यहाँ भारतीय राज्य की स्थापना की थी , उसके पुत्र मेउल तथा पौत्र विजितसम्भव शासक हुआ था। विरोचन नामक आचार्य ने बौद्ध मत के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पांचवी सदी  के चीनी यात्री फाह्यान ने खोतान  का विवरण प्रस्तुत किया है – उसके अनुसार प्रत्येक नागरिक अपने घर के सामने छोटा स्तूप बनाता था, गोमती बिहार में लगभग 3000 भिक्षु  निवास करते थे, प्रतिवर्ष बुद्ध प्रतिमा का भव्य जुलूस निकाला जाता था, स्वयं राजा अपना मुकुट उतार कर नंगे पैर बुद्ध प्रतिमा के पीछे चलते थे।

कुचा/कुची  -जहां भारत, मध्य एशिया और चीन मिले

यदि खोतान भारतीय संस्कृति का प्रवेश-द्वार था, तो कूचा उसका विश्वविद्यालय था। कूची के नरेश भारतीय नाम सुवर्णपुष्प, हरिपुष्प, हरदेव  जैसे नाम धारण करते थे।  भारतीय इतिहास के महान सांस्कतिक दूतो में कुमार जीव का नाम आता  है। चीनी परंपरा के अनुसार उनके पिता कुमारायण राजगुरु बने, उनका विवाह राजकुमारी जीवा से हुआ और इन्हीं दोनों से कुमारजीव का जन्म हुआ।  कुमारजीव  ने अनेक संस्कृत ग्रंथो का चीनी भाषा में अनुवाद किया, उन्हें  चीनी बौद्ध दर्शन का निर्माता माना जाता है।

गंधार दो महान कलाओं का मिलन

वर्तमान अफगानिस्तान और  उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान का  क्षेत्र भारतीय, ईरानी और यूनानी सभ्यताओं का संगम था।  गांधार शैली में भारतीय आध्यात्मिकता, यूनानी यथार्थवाद, रोमन मूर्ति कला तथा मध्य एशिया के सौंदर्य का समन्वय दिखाई देता है। बाद में ही कला मध्य एशिया में प्रसारित हुई।

कनिष्क – भारत-मध्य एशिया संबंधों का स्वर्ण युग

कनिष्क ने महायान बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया, चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन किया और उसी के समय यह बौद्ध परंपरा और भारत की संस्कृति पूरे मध्य एशिया में प्रसारित हो गई। इसलिए इसे भारत मध्य एशिया संबंधों का स्वर्ण युग कहते हैं।

तिब्बत जहां भारत में सांस्कृतिक स्मृति सुरक्षित रखी है

महाभारत और कालिदास के रघुवंश में हिमालय के उत्तर स्थित प्रदेशों का उल्लेख मिलता है। तिब्बत के महान राजा सांग संगमपो ने भारतीय विद्या में गहरी रुचि दिखाई , उन्होंने अपने मंत्री थोनमी सम्भोट  को भारतभाषा व्याकरण लिपि के  अध्ययन हेतु भेजा।  नालंदा से तिब्बत महान विद्वान आचार्य शान्तरक्षित एवं पदमसम्भव  को तिब्बत आमंत्रित किया। इन विद्वानों ने बौद्ध धर्म के साथ साथ शिक्षा साहित्य, कला , विज्ञानं औषदि आदि का विकास किया।  11वीं सदी  में विक्रमशिला विश्वविद्यालय के महान आचार्य आतिश दीपांकर श्रीज्ञान तिब्बत पहुंचे, 17 वर्षों तक वहां रहे और उन्होंने बौद्ध परंपराओं को समृद्ध करने का कार्य किया। यहाँ स्थित समय विहार के वास्तु पर नालंदा एवं ओदंतपुरी की झलक मिलती है।  विक्रमशीला के मॉडल पर यहाँ साक्या विहार राजनीती एवं धर्म का केंद्र रहा है।

भारत और चीन दो प्राचीन सभ्यताओं का संवाद

महाभारत एवं मनुस्मृति में चीन का तथा  कौटिल्य के अर्थशास्त्र में चीनी रेशम (चीनांशुक ) का उल्लेख मिलता है। चीनी परंपरा के अनुसार हान  वंश के सम्राट मिंगती  ने स्वप्न में तेजस्वी पुरुष को देखा तो  विद्वानों ने उसकी की पहचान बुद्ध के रूप में की।  इसके बाद मध्य एशिया से दो विद्वान  कश्यप मातंग और धर्मरत्न चीन आए।  चीनी सम्राट ने श्वेताश्वव विहार की स्थापना की।  दक्षिणी चीन के राजा लियांग -वृती ने बौद्ध धर्म को राजकीय धर्म बना दिया। अनेक भारतीय विद्वान धर्मरक्ष , कुमारजीव , वज्रमित्र , धर्मगुप्त गुणभद्र आदि चीन पहुंचे।  चीनी यात्री फाह्यान , ह्वेनसांग और इत्सिंग भारत आये , इन्होने यहाँ की राजनितिक सामाजिक और धार्मिक स्थिति का वर्णन किया।  ह्वेनसांग नालंदा के  आचार्य शीलभद्र के शिष्य बने। भारतीय संस्कृति का प्रभाव आज किज़िल गुफाएँ (Kizil Caves) बेज़ेल लिक गुफाएँ (Eziklik Caves) – दुनहुआंग की मोगाओ गुफाएँ (Mogao Caves) –में भी दिखाई देते है।

बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी -बदलती भू-राजनीति

19वीं शताब्दी में ब्रिटेन रूस के बीच ग्रेट गेम प्रारंभ हुआ,  1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद यहां कजाकिस्तान उज़्बेकिस्तान किर्गिस्तान तुर्कमेनिस्तान आदि देश बने। इक्कीसवीं शताब्दी में चीन ने बेल्ट रोड इनिशिएटिव  (BRI) के माध्यम से इस क्षेत्र में विशाल निवेश किया। दूसरी ओर भारत ने कनेक्ट सेंट्रल एशिया नीति , अंतर्राष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC)-, शंघाई सहयोग संगठन , तथा उच्चस्तरीय भारत–मध्य एशिया शिखर सम्मेलनों के माध्यम से अपने ऐतिहासिक संबंधों को आधुनिक रणनीतिक साझेदारी में रूपांतरित करने का प्रयास किया।

ऊर्जा और क्रिटिकल मिनरल भविष्य की साझेदारी

कजाकिस्तान विश्व के प्रमुख यूरेनियम उत्पादकों में से एक है,तुर्कमेनिस्तान विशाल प्राकृतिक गैस भंडार,उज़्बेकिस्तान सोना, यूरेनियम ,ताजिकिस्तान जलविद्युत क्षमता के लिए प्रसिद्ध है। हरित ऊर्जा बैटरी निर्माण, इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर के उद्योग  के साथ क्रिटिकल मिनरल्स का महत्व लगातार बढ़ रहा है।  आज कारवां  बदल गए हैं, घोड़ो/ऊंटों  की जगह कंटेनर ट्रेन आ गई है, ताड़पत्र की जगह डिजिटल  नेटवर्क आ गए हैं, विहार की जगह विश्वविद्यालय एवं थिंक  टैंक संवाद कर रहे हैं, परंतु भारत मध्य एशिया की यात्रा आज भी जारी है और शायद इतिहास का भी यही संदेश है कि  सभ्यता युद्ध से नहीं संवाद से अमर होती है।  भारत और मध्य एशिया का सम्बन्ध उसी अमर संवाद का जीवंत प्रमाण है।

 

Topics: Vasudhaiva KutumbakamIndian civilization and cultureCultural DialogueIndia-Central Asia relationsexchange of civilizationsglobal role of ancient Indiacultural diplomacy of Indiaexpansion of civilization
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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