‘असली अपराधी छुपाकर फर्जी आरोप मढ़े इंदिरा सरकार ने’-ललित नारायण मिश्रा
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ललित नारायण मिश्रा हत्याकांड: ‘असली अपराधी छुपाकर फर्जी आरोप मढ़े इंदिरा सरकार ने’

भारत की आजादी के बाद के सबसे रहस्यमय हत्याकांडों में से एक है ललित नारायण मिश्रा हत्याकांड। जनवरी 1975 में बिहार के समस्तीपुर में रेल परियोजना के उद्घाटन के दौरान हुए विस्फोट ने न केवल एक लोकप्रिय केंद्रीय मंत्री की जान ले ली थी,

Written byPanchjanyaPanchjanya
Nov 4, 2025, 08:24 pm IST
inसाक्षात्कार, बिहार

भारत की आजादी के बाद के सबसे रहस्यमय हत्याकांडों में से एक है ललित नारायण मिश्रा हत्या कांड। जनवरी 1975 में बिहार के समस्तीपुर में रेल परियोजना के उद्घाटन के दौरान हुए विस्फोट ने न केवल एक लोकप्रिय केंद्रीय मंत्री की जान ले ली थी, बल्कि भारतीय राजनीति और न्याय-व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गहरे प्रश्न भी खड़े कर दिए थे। इसी विषय पर पाञ्चजन्य की सलाहकार संपादक तृप्ति श्रीवास्तव ने ललित मिश्रा के पोते वैभव मिश्रा से बातचीत की, जो सर्वोच्च न्यायालय में वकील हैं और इस हत्याकांड में न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं।

पचास साल बीत जाने के बाद भी ललित नारायण जी का हत्याकांड चर्चा में है। क्यों?

मेरा परिवार आज भी न्याय की प्रतीक्षा में है। आप कह सकते हैं कि निराशा और थकान दोनों हैं, लेकिन उम्मीद अब भी है। पचास साल बाद भी अगर एक केंद्रीय मंत्री की हत्या का सच पता नहीं चल पाए, तो यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है। बिहार और पूर्वांचल के इलाकों में बच्चा-बच्चा जानता है कि ललित बाबू की हत्या क्यों और कैसे हुई, लेकिन कानून की नजरों में सच अब तक साबित नहीं हो पाया है।

उस दिन क्या हुआ था समस्तीपुर में?
2 जनवरी 1975 को मेरे दादाजी रेल ब्रॉडगेज लाइन के उद्घाटन के लिए समस्तीपुर गए थे। उनका भाषण लगभग समाप्त ही हुआ था कि मंच पर दो ग्रेनेड फेंके गए। विस्फोट में कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए। उन्हें दरभंगा मेडिकल कॉलेज ले जाया गया और वहां से ट्रेन से दानापुर लाया गया। केवल 135 किलोमीटर की दूरी तय करने में 14 से 16 घंटे लगे। इतनी कम दूरी को तय करने में उस समय भी इतना समय लगे, यह असामान्य लगता है। अगले दिन, 3 जनवरी 1975 को वह इस दुनिया में नहीं रहे।

वैभव मिश्रा से बातचीत करतीं तृप्ति श्रीवास्तव

शुरुआती जांच में क्या पता चला था?
बिहार पुलिस ने शुरुआती दस दिनों में ही कुछ लोगों को गिरफ्तार किया था। उन्होंने मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 के तहत कबूलनामा दिया था, जो कानूनी रूप से मजबूत साक्ष्य माना जाता है। इन बयानों में तत्कालीन सरकार के कुछ प्रभावशाली लोगों के नाम आए थे। लेकिन जब इमरजेंसी लगी, तब जांच की दिशा ही पलट गई।

जांच का रुख कैसे बदला गया?
पहले जिन लोगों को पकड़ा गया था, उन्हें छोड़ दिया गया और उनकी जगह आनंदमार्ग संगठन के कुछ लोगों को आरोपी ठहरा दिया गया। बाद में उन्हीं में से कुछ लोग सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए.एन. रे पर हुए हमले के केस में भी आरोपी बनाए गए। एक ही समूह का नाम दो अलग-अलग घटनाओं में आना अपने आप में असंगत प्रतीत होता है।

क्या केस को जानबूझकर भटकाया गया?
हां, बिल्कुल। जैसे ही असली नाम सामने आने लगे, केस का पूरा ताना-बाना बदल दिया गया। सीबीआई ने खुद उन आरोपियों को छोड़ने की अर्जी दी, जिनके बयान सरकार से जुड़े नामों की ओर इशारा कर रहे थे। उस समय के सीबीआई निदेशक डी. सेन का नाम शाह आयोग और जस्टिस तारकुंडे रिपोर्ट, दोनों में आया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि राजनीतिक दबाव में जांच को गलत दिशा में मोड़ा गया।

उस समय आपके परिवार ने क्या कदम उठाए थे?
मेरी दादीजी स्वयं तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर और तत्कालीन गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह से मिली थीं। उन्होंने कई बार पुनः जांच की मांग रखी। अरुण शौरी की किताब “हू किल्ड एल.एन. मिश्रा” में इन बैठकों का पूरा ब्योरा है। बिहार पुलिस की रिपोर्ट और जस्टिस तारकुंडे रिपोर्ट, दोनों में यह स्पष्ट है कि प्रारंभ में जिन लोगों को पकड़ा गया, वही इस साजिश में शामिल थे; बाद में आनंदमार्ग संगठन को झूठे आरोपों में फंसाया गया।

इसके बाद मामला किस दिशा में गया?
1979 में सीबीआई ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की कि केस को बिहार से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया जाए। बिहार पुलिस ने इसका विरोध किया और कहा कि यदि केस बाहर गया, तो इसे दबा दिया जाएगा। अंत में हुआ भी वही। 1980 में केस दिल्ली स्थानांतिरत कर दिया गया। वहां यह केस 30,000 से अधिक पन्नों के रिकॉर्ड के साथ चला। 2014 में ट्रायल कोर्ट ने आनंदमार्ग संगठन से जुड़े चार लोगों को आजीवन कारावास की सजा दी। 2015 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने उन्हें जमानत दे दी और अपने आदेश में लिखा कि “प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट नहीं होता कि आरोपी घटना-स्थल पर उपस्थित थे।”

आपने कहा कि आपने खुद पूरा ‘ट्रायल रिकॉर्ड’ पढ़ा। उसमें आपको क्या दिखाई दिया?
मैं इसे जितनी गहराई से पढ़ता गया, उतना स्पष्ट होता गया कि पहले जो अफवाह लगती थी, अब उसके पीछे प्रमाण हैं। जैसे कहते हैं कि धुआं वहीं से निकलता है जहां आग हो। लेकिन अब धुआं नहीं, आग दिख रही है।

क्या यह सच है कि आपने पुनः जांच के लिए अदालत का रुख किया है?
बिल्कुल। मैंने 2021 में दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की थी। सीबीआई से अनुरोध किया कि पुनः जांच की जाए। अदालत ने छह सप्ताह में जवाब देने का आदेश दिया। सीबीआई ने कहा कि चूंकि अपील लंबित है, इसलिए अभी पुनः जांच कानूनी रूप से संभव नहीं। मैंने अदालत से स्वयं आग्रह किया कि मुझे अपील में ‘इंटरवीनर’ के रूप में सुना जाए। अदालत ने यह अनुमति दे दी। मुझे ट्रायल रिकॉर्ड का प्रत्यक्ष अध्ययन करने की अनुमति भी मिली।

इस केस की सुनवाई इतनी लंबी क्यों चली थी?
यह न्यायिक विलंब और संस्थागत जड़ता का उदाहरण है। लगभग पैंतीस साल तक यानी 1980 से 2014 तक ट्रायल चला, जज बदलते रहे, गवाह बूढ़े होते गए। जब अदालत ने अंततः सजा दी, तो अनेक साक्ष्य और गवाह अस्पष्ट हो चुके थे। फिर 2015 में उच्च न्यायालय ने कहा कि साक्ष्य इतने कमजोर हैं कि आरोपियों की उपस्थिति भी संदेहास्पद है।

परिवार को फैसले की लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ रही है!
क्योंकि हम व्यवस्था पर भरोसा करते रहे। मेरी दादी, मेरे पिता और अब मैं – तीन पीढ़ियां न्याय की प्रतीक्षा में हैं। पहले तो कानूनी रूप से परिवार की आवाज सुनी भी नहीं जाती थी। अब जाकर पीड़ित परिवार को कोर्ट में ‘लोकस स्टैंडी’ मिल पाया है। हमने कभी हार नहीं मानी।

क्या यह मामला भारत की न्याय-व्यवस्था के लिए भी एक प्रतीक बन गया है?
बिल्कुल। अगर एक केंद्रीय मंत्री के हत्याकांड में न्याय पचास साल तक अटका रह सकता है, तो आम नागरिक के लिए क्या उम्मीद बचती है? मैंने अदालत से यह आग्रह किया है कि एक स्वतंत्र विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित किया जाए। पुनः जांच केवल इसलिए नहीं कि पुराने दोषमुक्त हों, बल्कि इसलिए कि सच्चे अपराधी सामने आएं। यह केस भारत के न्याय-इतिहास में ‘फर्जी भगवा आतंकवाद केस’ का पहला उदाहरण भी हो सकता है , जहां धार्मिक संगठन को झूठे आरोप में फंसाया गया ताकि असली नाम दबे रहें।

क्या आपको अब भी भरोसा है कि सच्चाई सामने आएगी?
हां। कानून में उदाहरण हैं-दिल्ली उच्च न्यायालय 1984 के सिख दंगों के केस को वर्षों बाद फिर से खोला था। अगर अदालत को लगता है कि कोई केस अधूरा है या गलत दिशा में गया है, तो वह पुनः जांच का आदेश दे सकती है। सवाल बस इतना है कि क्या इसके लिए न्यायिक इच्छाशक्ति होगी। यह साफ किया जाए कि सीबीआई ने केस क्यों पलटा, किसके आदेश पर पलटा और असली अपराधी कौन हैं। अगर यह नहीं हुआ, तो इतिहास बार-बार यही सवाल पूछेगा कि एक सच्चे जननेता की हत्या का सच आखिर क्यों दबा दिया गया?

Topics: पाञ्चजन्य विशेषललित नारायण मिश्रा हत्याकांडसमस्तीपुर विस्फोटन्याय की लड़ाईव्यवस्था की विफलताआनंदमार्ग संगठनइमरजेंसी
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