पश्चिम बंगाल, असम और बिहार की सीमाओं पर घुसपैठ का मुद्दा भारत की आंतरिक सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन के लिए एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। 2025 में यह समस्या और तीव्र हो गई है, जब बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों की संख्या में भारी उछाल दर्ज किया गया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जनवरी से अक्टूबर 2025 तक सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने 3,500 से अधिक अवैध प्रवासियों को पकड़ा, जो 2024 की तुलना में तीन गुना अधिक है। लेकिन सवाल यह नहीं कि घुसपैठ हो रही है—इसमें कोई संदेह नहीं। असली सवाल यह है कि ये घुसपैठिए भारत की सीमा पार करने के बाद कहां छिपते हैं? उन्हें कौन संरक्षण देता है? कौन उनका ‘लोकल गार्जियन’ बनकर दस्तावेज जुटाता है, नौकरियां दिलाता है और वोट बैंक में तब्दील करता है? इस लेख में हम इस समस्या की जड़ तक जाएंगे, ऐतिहासिक संदर्भों को खंगालेंगे और उन राजनीतिक ताकतों का पर्दाफाश करेंगे जो दशकों से इस घुसपैठ को बढ़ावा दे रही हैं।
2025 की तस्वीर
भारत-बांग्लादेश सीमा की कुल लंबाई 4,096 किलोमीटर है, जो पश्चिम बंगाल (2,217 किमी), असम (262 किमी), मेघालय (878 किमी), त्रिपुरा (856 किमी) और मिजोरम (318 किमी) से गुजरती है। बिहार की सीमा सीधे बांग्लादेश से नहीं लगती, लेकिन नेपाल के रास्ते से अवैध प्रवासियों का प्रवाह यहां भी महसूस किया जाता है। 2025 में बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता (शेख हसीना सरकार के पतन के बाद) ने घुसपैठ को बढ़ावा दिया। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के अनुसार, अगस्त 2024 से जनवरी 2025 तक 1,000 से अधिक अवैध प्रवासियों को पकड़कर वापस भेजा गया। मई 2025 में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत 2,000 से अधिक संदिग्धों को हिरासत में लिया गया, और बांग्लादेश भेजा गया।
पश्चिम बंगाल घुसपैठ का हॉटस्पॉट
पश्चिम बंगाल में मुर्शिदाबाद, मालदा जैसे जिलों में घुसपैठ के हॉटस्पॉट बने हुए हैं। बीएसएफ ने जनवरी 2025 में मालदा में बाड़ लगाने के दौरान बांग्लादेशी बॉर्डर गार्ड (बीजीबी) के साथ टकराव की घटनाएं दर्ज कीं। असम में ‘पुष-बैक’ नीति के तहत सैकड़ों बांग्लादेशियों को बांग्लादेश भेजा गया। बिहार में, 2025 विधानसभा चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग ने वोटर लिस्ट से अवैध बांग्लादेशियों, रोहिंग्या और नेपाली नाम हटाए।
भारत में 1.2 करोड़ अवैध बांग्लादेशी
ये आंकड़े केवल बर्फीले पहाड़ की नोक हैं। अनुमान है कि भारत में 1.2 करोड़ से अधिक अवैध बांग्लादेशी प्रवासी रहते हैं, जिनमें से 57 लाख पश्चिम बंगाल में हैं। लेकिन ये प्रवासी अकेले नहीं आते-उन्हें स्थानीय नेटवर्क का सहारा मिलता है। दिल्ली, गुजरात, हैदराबाद और अन्य शहरों में बंगाली-भाषी मजदूरों पर छापेमारी में फर्जी आधार कार्ड, पैन और जन्म प्रमाणपत्र बरामद हुए। मई 2025 में दिल्ली पुलिस ने 47 बांग्लादेशियों और 5 भारतीय एजेंटों को गिरफ्तार किया। ये एजेंट कौन? ज्यादातर स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता या दलाल, जो वोट के बदले संरक्षण देते हैं।
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सहायता देने वाले ‘लोकल गार्जियन’
घुसपैठिए सीमा पार करते ही गायब हो जाते हैं। उन्हें छिपाने, दस्तावेज बनवाने और बसाने का काम स्थानीय स्तर पर होता है। असम में हिमंता सरमा ने जुलाई 2025 में एक्स (पूर्व ट्विटर) पर चेतावनी दी: “मुस्लिम घुसपैठ से जनसांख्यिकीय बदलाव हो रहा है।” पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सरकार पर आरोप है कि वह सीमा पर बाड़ लगाने के लिए केंद्र को जमीन नहीं दे रही। कुछ सामाजिक संगठनों का दावा है कि घुसपैठ केवल उन राज्यों में हो रही है, जहां भाजपा सत्ता से बाहर है।
ये ‘गार्जियन’ कौन हैं? रिपोर्ट्स बताती हैं कि वे स्थानीय मुस्लिम प्रभावशाली लोग, दलाल और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। उदाहरणस्वरूप, जयपुर, बेंगलुरु, चेन्नई और गुवाहाटी में एनआईए ने 44 मानव तस्करों को गिरफ्तार किया, जिनके पास 200 फर्जी आधार कार्ड थे। हैदराबाद में 7,200 रोहिंग्या प्रवासी छिपे हैं। पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में प्रभावशाली बांग्लादेशी किसान स्थानीय प्रभावशाली मुस्लिमों की मदद से जमीन खरीद रहे हैं। 1980 के दशक से यह पैटर्न चला आ रहा है, जब सीपीआई के एक ज्ञापन में ज्योति बसु को चेतावनी दी गई थी कि “सीमा पार से घुसपैठियों का झुंड कानून-व्यवस्था के लिए समस्या पैदा कर रहा है।”
ज्योति बसु और सीपीएम की विरासत
पश्चिम बंगाल में घुसपैठ की जड़ें 1977 में ज्योति बसु की सीपीएम सरकार से जुड़ी हैं। बंगाल के लोग ही बताते हैं कि ज्योति बाबू की सरकार ‘घुसपैठियों के दम’ पर चली। 1977 से 2011 तक 34 वर्षों तक चले लेफ्ट फ्रंट शासन में अवैध प्रवास को अनदेखा किया गया। 2004 में यूपीए सरकार के मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने संसद में कहा कि भारत में 1.2 करोड़ अवैध बांग्लादेशी हैं, जिनमें से 57 लाख पश्चिम बंगाल में। इससे असम में विरोध हुआ, लेकिन आंकड़े अस्वीकार्य नहीं थे।
सीपीएम की रणनीति वोट बैंक पर टिकी थी। 1979 के मरीचझापी नरसंहार में ज्योति बसु सरकार ने बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों पर गोली चलवाई, लेकिन मुस्लिम घुसपैठियों को संरक्षण दिया। 1992 में गणशक्ति (सीपीएम का बंगाली अखबार) में ज्योति बसु ने खुद लिखा कि 1977-1992 के बीच बीएसएफ ने 2,35,529 बांग्लादेशी घुसपैठियों को धकेला, जिनमें 73% मुस्लिम थे। लेकिन सरकार ने इन्हें बसाने में मदद की-जमीन बांटकर, वोटर लिस्ट में नाम डालकर। असम में 1979-85 के आंदोलन में 855 लोग मारे गए, लेकिन पश्चिम बंगाल में सीपीएम ने घुसपैठ को ‘साम्राज्यवादी साजिश’ बताकर दबाया।
जनसांख्यिकीय बदलाव स्पष्ट है: 1951-2001 के बीच मुस्लिम आबादी 41.82% बढ़ी, जबकि हिंदू 41.42%। यह प्राकृतिक वृद्धि नहीं-घुसपैठ का नतीजा था। सीपीएम ने आंखें बंद कीं, इससे सांप्रदायिक तनाव बढ़ा। 1983 के नेल्ली नरसंहार जैसी घटनाएं असम में हुईं, जहां बंगाली मुसलमानों को निशाना बनाया गया। ज्योति बसु की सरकार ने बांग्लादेशी मुसलमानों को ‘सेकुलरिज्म’ के नाम पर स्वागत किया, जबकि हिंदू शरणार्थियों को दंडित किया।
तृणमूल कांग्रेस: सीपीएम की विरासत को संभालते हुए
2011 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने सीपीएम को सत्ता से हटाया, लेकिन घुसपैठ पर नीति में कोई बदलाव नहीं आया। बल्कि, टीएमसी ने सीपीएम की विरासत को और मजबूत किया। ममता बनर्जी ने 1990 के दशक में संसद में घुसपैठ का मुद्दा उठाया था, लेकिन सत्ता में आने के बाद वोट बैंक की राजनीति ने उन्हें बांध लिया। 2025 में टीएमसी पर आरोप है कि वह सीमा बाड़बंदी के लिए केंद्र को जमीन नहीं दे रही। जनवरी 2025 में ममता और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी ने केंद्र पर उल्टा आरोप लगाया: “बीएसएफ घुसपैठ को बढ़ावा दे रही है ताकि बंगाल अस्थिर हो।”
टीएमसी शासित पश्चिम बंगाल में अवैध प्रवासियों को संरक्षण मिलता है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि टीएमसी कार्यकर्ता फर्जी दस्तावेज बनवाते हैं। 2025 के इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स बिल पर बहस में यह बात सामने आई कि घुसपैठ टीएमसी-शासित राज्य में हो रही है। टीएमसी की रणनीति सीपीएम जैसी है, जहां वेलफेयर स्कीम्स से वोटर की लॉयल्टी खरीदी जाती है। । लेकिन इससे घुसपैठिए लाभान्वित होते हैं- उन्हें आधार कार्ड, राशन कार्ड मिल जाता है। 2025 में ओडिशा, महाराष्ट्र और गुजरात में बंगाली मजदूरों पर छापे पड़े, जिनमें से कई अवैध पाए गए। टीएमसी ने इन्हें ‘भारतीय नागरिक’ बताकर बचाने की कोशिश की।
जड़ तक जाना जरूरी
घुसपैठ समस्या नहीं, लक्षण है। जड़ वे राजनीतिक दल हैं जो वोट के लिए सीमा की रक्षा भूल गए। ज्योति बसु की सीपीएम ने आधार रखा, टीएमसी ने उसे मजबूत किया। 2025 के इमिग्रेशन बिल ने केंद्र को मजबूत शक्तियां दीं, लेकिन राज्य सरकारों का सहयोग इसके बावजूद जरूरी था। बिना राजनीतिक इच्छाशक्ति के, घुसपैठ की समस्या नहीं सुलझ सकती। घुसपैठियों के ‘लोकल गार्जियन’ सीमा के इस पार सक्रिय रहेंगे और फिर उस तरफ से घुसपैठ जारी रहेगा। इसे जड़ से खत्म करने के लिए प्रदेश सरकारों के सहयोग से घुसपैठ पर एक सर्जिकल स्ट्राइक जरूरी है।
बंगाल के लोग जानते हैं-समस्या की जड़ राजनीतिक संरक्षण है। समय है कि इसे सबके सामने लाया जाए, ताकि भारत की सीमाएं सुरक्षित हों और जनसांख्यिकीय संतुलन बरकरार रहे।

















