आईएनएस महेंद्रगिरि: पर्वत सी दृढ़ता, सागर सा सामर्थ्य, 'ब्लू वॉटर नेवी' की दिशा में भारत की ऐतिहासिक छलांग
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आईएनएस महेंद्रगिरि: पर्वत सी दृढ़ता, सागर सा सामर्थ्य, ‘ब्लू वॉटर नेवी’ की दिशा में भारत की ऐतिहासिक छलांग

महेंद्रगिरि का नाम ओडिशा की पूर्वी घाट पर्वतमाला के प्रसिद्ध महेंद्रगिरि पर्वत पर रखा गया है, जो भारतीय परंपरा में दृढ़ता, साहस, आध्यात्मिक शक्ति और अडिग संकल्प का प्रतीक माना जाता है।

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल — edited by Mahak Singh
Jul 11, 2026, 05:45 pm IST
inभारत
(Ai Generated Image)

(Ai Generated Image)

हिंद महासागर आज केवल समुद्री व्यापार का मार्ग नहीं बल्कि 21वीं सदी की वैश्विक भू-राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक मंच बन चुका है। विश्व के लगभग दो-तिहाई तेल परिवहन और एक-तिहाई समुद्री व्यापार का आवागमन इसी क्षेत्र से होता है। चीन की बढ़ती नौसैनिक सक्रियता, इंडो-पैसिफिक में बदलते सामरिक समीकरण, समुद्री आतंकवाद, पनडुब्बियों की बढ़ती तैनाती और वैश्विक शक्ति-संतुलन की नई प्रतिस्पर्धा के बीच भारत के लिए अपनी समुद्री शक्ति को अभूतपूर्व रूप से सुदृढ़ करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है। ऐसे समय भारतीय नौसेना के बेड़े में अत्याधुनिक स्टील्थ फ्रिगेट ‘आईएनएस महेंद्रगिरि’ का शामिल होना केवल एक रक्षा उपलब्धि नहीं बल्कि भारत की समुद्री रणनीति, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक सामरिक महत्वाकांक्षा की ऐतिहासिक घोषणा है। विशाखापत्तनम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा भारतीय नौसेना को समर्पित किया गया आईएनएस महेंद्रगिरि भारतीय नौसेना की महत्वाकांक्षी ‘प्रोजेक्ट-17ए’ श्रृंखला का छठा स्टील्थ फ्रिगेट है। यह युद्धपोत भारत की उस बदलती सोच का प्रतीक है, जिसमें देश अब केवल रक्षा उपकरणों का आयातक नहीं बल्कि विश्वस्तरीय युद्धपोतों का डिजाइनर, निर्माता और निर्यातक बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यह युद्धपोत समुद्र में भारत की बढ़ती शक्ति का ऐसा आधुनिक प्रतीक है, जो आने वाले दशकों तक हिंद महासागर में भारत की सामरिक बढ़त सुनिश्चित करेगा।

75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी तकनीक

‘आईएनएस महेंद्रगिरि’ युद्धपोत की सबसे बड़ी उपलब्धि इसका पूर्णतः स्वदेशी डिजाइन है। भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो ने इसे आधुनिक युद्ध की सभी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर विकसित किया है जबकि इसका निर्माण मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड ने किया है। यह तथ्य विशेष महत्व रखता है कि इसके निर्माण में 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री, प्रणालियों और तकनीकों का उपयोग किया गया है। सैंकड़ों भारतीय उद्योगों तथा बड़ी संख्या में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) ने इस परियोजना में योगदान दिया है। इससे भारत का रक्षा औद्योगिक आधार न केवल मजबूत हुआ है बल्कि अत्याधुनिक रक्षा विनिर्माण में देश की आत्मनिर्भरता भी नई ऊंचाइयों पर पहुंची है। यह आत्मनिर्भर भारत अभियान की सबसे प्रभावशाली सफलताओं में से एक है।

पर्वत जैसी दृढ़ता, सागर जैसा सामर्थ्य

महेंद्रगिरि का नाम ओडिशा की पूर्वी घाट पर्वतमाला के प्रसिद्ध महेंद्रगिरि पर्वत पर रखा गया है, जो भारतीय परंपरा में दृढ़ता, साहस, आध्यात्मिक शक्ति और अडिग संकल्प का प्रतीक माना जाता है। यह नाम केवल औपचारिक पहचान नहीं बल्कि इस युद्धपोत के स्वभाव का परिचायक भी है। जैसे पर्वत विपरीत परिस्थितियों में भी अटल रहता है, उसी प्रकार यह युद्धपोत समुद्र में भारत की सुरक्षा का अडिग प्रहरी बनकर कार्य करेगा। लगभग 149 मीटर लंबा और 6,670 टन विस्थापन वाला यह स्टील्थ फ्रिगेट आधुनिक समुद्री युद्ध की हर आवश्यकता को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। इसकी अधिकतम गति लगभग 28 नॉट (करीब 52 किलोमीटर प्रति घंटा) है तथा यह हजारों समुद्री मील तक लगातार अभियान चलाने में सक्षम है। इसमें 225 से 230 नौसैनिक और अधिकारी तैनात रह सकते हैं। इसकी लंबी परिचालन क्षमता इसे हिंद महासागर, अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में लगातार निगरानी एवं युद्ध संचालन के लिए अत्यंत उपयुक्त बनाती है।

समुद्र का अदृश्य शिकारी

महेंद्रगिरि की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी स्टील्थ तकनीक है। आधुनिक नौसैनिक युद्ध में अब केवल हथियारों की संख्या नहीं बल्कि अदृश्य रहकर आक्रमण करने की क्षमता निर्णायक भूमिका निभाती है। महेंद्रगिरि की बाहरी संरचना विशेष कोणों पर तैयार की गई है ताकि रडार तरंगें न्यूनतम मात्रा में परावर्तित हों। इसके निर्माण में प्रयुक्त विशेष सामग्री इसकी रडार क्रॉस सेक्शन को अत्यंत कम कर देती है। साथ ही इसका इंजन और निकास प्रणाली इस प्रकार डिजाइन की गई है कि तापीय (इन्फ्रारेड) संकेत भी न्यूनतम रहें। ध्वनिक हस्ताक्षर कम होने के कारण पनडुब्बियों द्वारा भी इसकी पहचान करना अत्यंत कठिन हो जाता है। यही कारण है कि इसे ‘समुद्र का अदृश्य शिकारी’ कहा जा रहा है। यदि हथियारों की बात करें तो महेंद्रगिरि किसी तैरते हुए किले से कम नहीं है। इसकी सबसे बड़ी मारक शक्ति विश्व की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ‘ब्रह्मोस’ है। लगभग तीन मैक की गति से उड़ने वाली यह मिसाइल कुछ ही मिनटों में सैंकड़ों किलोमीटर दूर स्थित दुश्मन के युद्धपोतों को सटीकता के साथ नष्ट कर सकती है। इसकी अत्यधिक गति के कारण दुश्मन की रक्षा प्रणाली को प्रतिक्रिया देने का समय लगभग नहीं मिलता। भविष्य में ब्रह्मोस के और उन्नत संस्करणों के एकीकरण की संभावना भी इस युद्धपोत की युद्ध क्षमता को और अधिक बढ़ा सकती है। हवाई सुरक्षा के लिए इसमें लंबी दूरी की एयर डिफेंस मिसाइल प्रणाली बराक-8 लगाने की व्यवस्था है। यह प्रणाली दुश्मन के लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों, ड्रोन, एंटी-शिप मिसाइलों और अन्य हवाई खतरों को काफी दूरी पर ही नष्ट करने में सक्षम है। आधुनिक युद्ध में जब मिसाइल हमले कुछ ही सैकेंड में परिणाम तय कर देते हैं, तब बराक-8 जैसी प्रणाली किसी भी युद्धपोत की जीवनरेखा बन जाती है।

समुद्री युद्ध का स्मार्ट कमांडर

महेंद्रगिरि समुद्र की सतह पर ही नहीं बल्कि समुद्र की गहराइयों में छिपे खतरों से भी समान दक्षता से मुकाबला कर सकता है। इसमें उन्नत सोनार प्रणाली, अत्याधुनिक टॉरपीडो तथा एंटी-सबमरीन रॉकेट लगाए जा सकते हैं, जो शत्रु पनडुब्बियों का दूर से पता लगाकर उन्हें नष्ट करने में सक्षम हैं। आज जब हिंद महासागर में अनेक देशों की आधुनिक पनडुब्बियां सक्रिय हैं, तब यह क्षमता भारतीय नौसेना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। इस युद्धपोत पर 76 मिमी नौसैनिक तोप, अत्याधुनिक क्लोज-इन वेपन सिस्टम तथा अन्य आधुनिक हथियार भी लगाए जा सकते हैं। निकट दूरी पर आने वाली मिसाइलों, ड्रोन या छोटे युद्धपोतों के विरुद्ध ये प्रणालियां अंतिम सुरक्षा कवच का कार्य करती हैं। महेंद्रगिरि की शक्ति केवल उसके हथियार नहीं बल्कि उसकी डिजिटल बुद्धिमत्ता भी है। इसमें ‘इंटीग्रेटेड प्लेटफॉर्म मैनेजमेंट सिस्टम’ लगाया गया है, जो जहाज के इंजन, बिजली, ईंधन, अग्निशमन, सुरक्षा, जल आपूर्ति तथा अन्य सभी महत्वपूर्ण प्रणालियों को एकीकृत रूप से नियंत्रित करता है। इससे चालक दल का कार्यभार कम होता है, संचालन अधिक सुरक्षित बनता है तथा युद्ध की स्थिति में किसी भी तकनीकी समस्या का तुरंत समाधान संभव हो जाता है।

आधुनिक इलैक्ट्रॉनिक युद्ध का महारथी

इसी प्रकार इसकी आधुनिक ‘इलैक्ट्रॉनिक वॉरफेयर प्रणाली’ दुश्मन के रडार, संचार नेटवर्क और मिसाइल मार्गदर्शन प्रणाली को बाधित करने में सक्षम है। आधुनिक युद्ध में इलैक्ट्रॉनिक स्पैक्ट्रम पर नियंत्रण ही वास्तविक बढ़त प्रदान करता है। महेंद्रगिरि इसी अवधारणा के अनुरूप विकसित किया गया है, जहां सेंसर, हथियार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निर्णय प्रणाली एकीकृत रूप से कार्य करती हैं। इस युद्धपोत पर ‘एमएच-60आर’ जैसे अत्याधुनिक मल्टी-रोल नौसैनिक हेलीकॉप्टरों के संचालन की सुविधा भी उपलब्ध है। ये हेलीकॉप्टर पनडुब्बी खोज, समुद्री निगरानी, विशेष बलों की तैनाती, खोज एवं बचाव अभियान तथा लक्ष्य पहचान जैसे अनेक मिशनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हेलीकॉप्टर के कारण महेंद्रगिरि की परिचालन क्षमता समुद्र की सतह से कहीं आगे तक विस्तारित हो जाती है।

आर्थिक सुरक्षा का समुद्री कवच

महेंद्रगिरि केवल युद्ध के लिए नहीं बना है। यह समुद्री डकैती विरोधी अभियान, समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा, मानवीय सहायता, प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत कार्य, खोज एवं बचाव अभियान तथा मित्र देशों के साथ संयुक्त नौसैनिक अभ्यासों में भी समान दक्षता से भाग ले सकता है। हिंद महासागर में आने वाले चक्रवात, सुनामी या अन्य आपदाओं के समय यह युद्धपोत राहत सामग्री, चिकित्सा सहायता और बचाव दल पहुंचाने वाला एक तैरता हुआ कमांड सेंटर बन सकता है। आज भारत का 90 प्रतिशत से अधिक विदेशी व्यापार समुद्री मार्गों से होता है। ऊर्जा आपूर्ति, व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा और समुद्री संचार मार्गों की निर्बाध उपलब्धता भारत की आर्थिक सुरक्षा का मूल आधार है। ऐसे में महेंद्रगिरि जैसे अत्याधुनिक युद्धपोत केवल सैन्य शक्ति नहीं बल्कि आर्थिक सुरक्षा के भी संरक्षक हैं। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती चीनी नौसैनिक उपस्थिति, स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स जैसी रणनीतियां तथा समुद्री प्रतिस्पर्धा भारत को अपनी समुद्री क्षमता लगातार बढ़ाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। महेंद्रगिरि इस रणनीतिक आवश्यकता का सशक्त उत्तर है।

ब्लू वॉटर नेवी का सशक्त आधार

यह युद्धपोत भारत के ‘ब्लू वॉटर नेवी’ के लक्ष्य को भी मजबूती देता है। ब्लू वॉटर नेवी वह होती है, जो अपने तटीय क्षेत्रों तक सीमित न रहकर विश्व के किसी भी महासागर में लंबे समय तक प्रभावी सैन्य उपस्थिति बनाए रख सके। महेंद्रगिरि जैसी लंबी परिचालन क्षमता, अत्याधुनिक हथियार, डिजिटल नेटवर्क, स्टील्थ तकनीक और बहुआयामी युद्ध क्षमता भारतीय नौसेना को इसी दिशा में आगे बढ़ा रही है। आर्थिक दृष्टि से भी यह परियोजना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके निर्माण में भारतीय उद्योगों, स्टार्टअप्स और एमएसएमई की व्यापक भागीदारी ने रक्षा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को नई गति दी है। इससे हजारों लोगों को रोजगार मिला है, नई तकनीकों का विकास हुआ है और भारत वैश्विक रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में अधिक सशक्त बनकर उभरा है। आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन केवल सुरक्षा का विषय नहीं बल्कि आर्थिक विकास, तकनीकी नवाचार और रणनीतिक स्वतंत्रता का भी आधार है।

विज्ञान, शक्ति और स्वाभिमान का संगम

कुल मिलाकर, आईएनएस महेंद्रगिरि केवल एक अत्याधुनिक युद्धपोत नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भारत की वैज्ञानिक क्षमता, इंजीनियरिंग उत्कृष्टता, औद्योगिक कौशल और सामरिक दूरदृष्टि का सशक्त प्रतीक है। स्वदेशी डिजाइन, आधुनिक स्टील्थ तकनीक, अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों और डिजिटल युद्धक क्षमताओं से लैस यह फ्रिगेट भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता की उस नई यात्रा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें देश केवल रक्षा उपकरणों का उपभोक्ता नहीं बल्कि वैश्विक स्तर का निर्माता और निर्यातक बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। महेंद्रगिरि उस नए भारत का परिचायक है, जो अपने समुद्री हितों की रक्षा करने, हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने तथा नियम-आधारित वैश्विक समुद्री व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए पूरी तरह सक्षम और प्रतिबद्ध है। इसकी तैनाती भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता, प्रतिरोधक शक्ति और दूरगामी रणनीतिक पहुंच को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी। साथ ही यह रक्षा उद्योग, एमएसएमई, स्टार्टअप और उच्च तकनीकी विनिर्माण को भी नई गति प्रदान करेगा। आने वाले वर्षों में जब भारत के समुद्री उत्थान और आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण की गाथा लिखी जाएगी, तब आईएनएस महेंद्रगिरि को उस ऐतिहासिक युद्धपोत के रूप में याद किया जाएगा, जिसने भारतीय नौसेना को नई शक्ति, नया आत्मविश्वास और वैश्विक समुद्री परिदृश्य में नई पहचान प्रदान की। यह वास्तव में विकसित भारत की सामरिक महत्वाकांक्षाओं का सशक्त ध्वजवाहक है।

Topics: Indian Oceandeveloped indiaNational securityआईएनएस महेंद्रगिरिINS MahendragiriBlue Water NavyIndigenous Defence ProductionIndian WarshipsDefence IndustryIndian NavyNaval ModernisationBrahMos Missile
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