क्या हम उस मोड़ पर पहुँच गए हैं जहाँ असहमति का मतलब अनुशासन भंग हो गया है? हाल ही में न्यायालय परिसर में एक अधिवक्ता द्वारा न्यायमूर्ति पर जूता उठाने की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। “पाञ्चजन्य” के विशेष कार्यक्रम ‘परख’ में आज चर्चा — क्या यह केवल एक व्यक्ति की उग्रता थी, या फिर लोकतंत्र की मर्यादा पर चोट? क्या आस्था और व्यवस्था का रिश्ता अब विरोध का हो गया है? सनातन का सार न्याय है, और न्याय का सार सनातन। दोनों का सम्मान ही भारत की पहचान है। सवाल ज़रूर पूछिए, पर आस्था के मंदिर को अपवित्र मत कीजिए। देखिए पूरा एपिसोड — “परख | न्याय के मंदिर में सनातन का अपमान”















