संघ के स्वयंसेवकों की हत्या किसने की? 15 साल बाद भी नहीं मिला न्‍याय, शमील, अब्बास समेत 14 बरी
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संघ के स्वयंसेवकों की हत्या किसने की? 15 साल बाद भी नहीं मिला न्‍याय, शमील, अब्बास समेत 14 बरी

केरल के थलास्सेरी कोर्ट ने 2010 के RSS कार्यकर्ताओं विजित-शिनोज हत्याकांड में 16 आरोपियों को बरी कर दिया। पुलिस सबूत पेश करने में नाकाम, VHP ने राज्य सरकार से हाईकोर्ट में अपील की मांग की। 50 सालों में 300+ स्वयंसेवकों की हत्याओं पर सवाल।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी — edited by कुलदीप सिंह
Oct 10, 2025, 10:12 am IST
inकेरल
Kerala court freed RSS Swayam Sevak murder

प्रतीकात्मक तस्वीर

केरल में पंद्रह साल पहले आरएसएस के दो कार्यकर्ताओं की हत्या के मामले ने राज्य की कानून-व्यवस्था को झकझोरा था। अब इसी मामले में अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। कन्नूर के थालास्सेरी अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए कहा कि सरकार अभियोजन पक्ष ठोस सबूत पेश करने में विफल रही। अब सवाल उठता है कि आखिर ये सभी हत्‍याकांड में शामिल नहीं थे तो हत्‍या किसने की ? क्‍या पुलिस ने गलत नाम एफआईआर में दर्ज किए? यदि ऐसा है तो पुलिस पर कार्रवाई के निर्देश अदालत ने क्‍यों नहीं दिए और क्‍यों नहीं राज्‍य सरकार की इस मामले में जिम्‍मेदारी तय की? कोर्ट का निर्णय बुधवार को सामने आया है।

संघ कार्यकर्ताओं की हत्या में 16 थे आरोपी

इस हत्याकांड में 16 आरोपी थे जिसमें से दो की मौत ट्रायल के दौरान हो चुकी है, जबकि बाकी 14 आरोपी केके मुहम्मद शफी, के शिनोज, टी सुजीत, टीके सुमेश, राहुल, केवी विनेश, पीवी विजिथ, फैसल, सारिश, टीपी शमील, एके शम्मास, केके अब्बास, एनके सुनील कुमार उर्फ कोडी सुनी, और टीपी सजीर अब अदालत से बरी कर दिए गए हैं।

राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ताओं विजित और शिनोज पर 28 मई 2010 को पल्लूर में हमला हुआ था। वे माहे की एक अदालत में पेश होकर घर लौट रहे थे। दोनों पर बम से हमला किया गया था। सामने आया था कि यह हमला सीपीएम से जुड़े कार्यकर्ताओं ने संघ के प्रति नफरत और बदले की भावना से किया था।

इसे भी पढ़ें: मेलोनी का ‘कल्चरल सेपरेटिज्म’ बिल: बुर्का-नकाब पर रोक, मुस्लिम फंडिंग पर सख्ती

विश्व हिंदू परिषद की कड़ी प्रतिक्रिया

इस संबंध में विश्‍व हिन्‍दू परिषद की प्रतिक्रिया सामने आई है। विहिप के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता विनोद बंसल ने कहा, “केरल से सामने आया ये निर्णय न्‍यायालय से अधिक तंत्र की विफलता की पोल खोलता है, यह राज्‍य पर जिहादियों और कम्‍युनिस्टों के शिकंजे का भी द्योतक है। अदालत ने कहा, पुलिस सही साक्ष्‍य प्रस्‍तुत करने में विफल रही है, जबकि साक्ष्‍य प्रस्‍तुत करना सरकारी तंत्र का काम है, जिसमें कि यहां देखा गया कि जानबूझकर उदासीनता बरती गई और अपराधी मुक्‍त हो गए।”

उन्‍होंने कहा, “अब राज्‍य सरकार को अविलम्‍ब इसके विरुद्ध केरल हाईकोर्ट में अपील फाइल करके दोषियों को मुत्‍यु दंड दिलाकर पीड़‍ित परिवारों के साथ खड़े होने का काम करना चाहिए। इससे ऐसे निर्मम कांड करनेवालों के मन में डर पैदा होगा। वहीं सरकार और न्‍यायव्‍यवस्‍था के प्रति भी विश्‍वास को बहाल किया जा सकेगा।”

केरल में स्वयंसेवकों को बनाया गया निशाना

इस प्रकरण में केरल में रह रहे वीएचपी के राष्‍ट्रीय पदाधिकारी वेंकटेश कुमार का कहना है कि राज्‍य में लगातार स्‍वयंसेवकों को निशाना बनाया जा रहा है, विशेषकर उत्‍तर केरल में ऐसी घटनाएं आए दिन हो रही हैं। आरएसएस कार्यकर्ता, जिसकी पहचान शाजू के रूप में हुई, एक मंदिर उत्सव में जाते समय हमला किया गया। संघ के कार्यकर्ता श्रीनिवासन की हत्या पलक्कड़ जिले में हुई। केरल के अलाप्पुझा के वायलार ग्राम पंचायत के नागमकुलंगरा में 22 वर्षीय आरएसएस शाखा मुख्य शिक्षक आर. नंदू उर्फ नंदू कृष्णा की हत्या की गई। रंजीत श्रीनिवासन की बेहरमी से हत्या कर दी गई थी।

चित्तरिप्परम्बा निवासी 17वीं मील शाखा के मुख्य शिक्षक श्यामा प्रसाद की कोमेरी स्थित बकरी फार्म के पास मार दिया गया। इसी तरह त्रिशूर में बाइक से आईटीआई कॉलेज से लौटते समय आनंदन की चार सीपीआईएम के कार्यकर्ताओं ने बेरहमी से पिटाई की।पुलिस अस्पताल ले गई, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। केटी जयकृष्‍ण मास्‍टर को तो स्‍कूल में पढ़ाते वक्‍त बच्‍चों के सामने ही मार दिया गया था! पुलिस साक्ष्‍य ठीक ढंग से नहीं रखती, इसलिए ज्‍यादातर मामलों में अपराधी न्‍यायालय से छूट जाते हैं। उन्‍होंने कहा कि इस मामले में भी यही हुआ है, अपराधी साक्ष्‍यों के अभाव में छोड़ दिए गए, हम इस मामले को ऊपरी अदालत में लेकर जाएंगे।

केरल में 50 साल से स्‍वयंसेवकों पर हो रही हिंसा

केरल में राज्य पुलिस, मानव अधिकार संगठनों और कई स्वतंत्र जांच के रिकॉर्ड बताते हैं कि 1970-1990 के बीच लगभग 60 आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्या की गई। 1990-2010 के दौरान 140 से अधिक राजनीतिक हत्याएं हुईं। 2010-2025 के बीच तकरीबन 100 नई वारदातें रिकॉर्ड की गईं, जिनमें आरएसएस और भाजपा कार्यकर्ता थे। न्यायालयों में अधिकांश मामलों में साक्ष्य की कमी, गवाहों के मुकरने और राजनीतिक दबाव के चलते सजा का प्रतिशत बेहद कम है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राजनीतिक हत्या के 80 प्रतिशत मामलों में आरोपितों को बरी कर दिया गया है।

आखिर किसने की स्वयंसेवकों की हत्या?

पीड़ित परिवारों और समर्थकों का कहना है कि अदालत का यह फैसला न केवल हत्या के दोषियों को राहत देता है बल्कि राज्य की न्याय प्रणाली पर भी गहरा प्रश्नचिह्न लगाता है। कन्नूर से लेकर कोच्चि तक इस पर प्रश्न उठ रहे हैं कि अगर इन 16 लोगों ने हत्या नहीं की, तो फिर हमारे भाइयों को किसने मारा? कई लोगों ने इसे “प्रणालीगत विफलता” कहा है। उनका कहना है कि पिछले 50 वर्षों से हमारे सैकड़ों कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं, लेकिन दोष सिद्ध होने की घटनाएं गिनी-चुनी हैं।

पिछले 50 वर्षों में 300 से अधिक संघ स्‍वयंसेवकों की हत्या, सैकड़ों मुकदमे, और बार-बार के बरी आदेश यह सब एक बड़े संवैधानिक प्रश्न की ओर इशारा करते हैं, क्या राज्य न्याय देने में विफल रहा है या राजनीति ने न्याय को अपनी मुट्ठी में कैद कर लिया है? यह सवाल अनुत्तरित है कि अगर इन हत्याओं को किसी ने अंजाम नहीं दिया, तो फिर मरने वाले स्‍वयंसेवकों को किसने और क्‍यों मारा?

Topics: राजनीतिक हत्या केसकेरल कानून व्यवस्थाKerala RSS murderThalassery court verdictस्वयंसेवकों की हत्याVHP reactionसंघ के स्वयंसेवकpolice evidence failureआरएसएस न्यूजCPM violence Keralaकेरल RSS हत्याpolitical murder caseथलास्सेरी कोर्ट फैसलाKerala law and orderVHP प्रतिक्रियाकेरल संघ स्वयंसेवकCPM हिंसा केरल
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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