आज के समय में नौजवान बच्चे पूरी-पूरी रात रील्स देखने में बिता देते हैं। आठ-आठ घंटे लगातार मोबाइल पर लगे रहते हैं। दो-दो, तीन-तीन, चार-चार बच्चे मिलकर चार-पांच घंटे केवल रील्स में समय गंवा देते हैं। कितना बहुमूल्य समय व्यर्थ जा रहा है।
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इस पर प्रेमानंद महाराज ने कहा कि- “अब ऐसे बच्चे पढ़ पाएंगे कैसे? पढ़ने के लिए भी एकाग्रता चाहिए। जैसे एक तपस्वी की एकाग्रता होती है, जैसे एक वैज्ञानिक की एकाग्रता होती है, वैसे ही एक विद्यार्थी की भी एकाग्रता होनी चाहिए। विद्यार्थी का जीवन तपस्या-मय होना चाहिए — व्यसन रहित, व्यभिचार रहित, पवित्र चिंतन और पवित्र स्वभाव वाला। तभी वह अपने विद्या-अध्ययन में प्रगति कर सकता है।” आज तो स्थिति यह है कि छोटे-छोटे बच्चे हुक्का पीने लगे हैं, बहन-बेटियां सिगरेट पीने लगी हैं, नशे की ओर बढ़ रही हैं। यह सब समाज के लिए अत्यंत हानिकारक है। ऐसे गलत संस्कार बढ़ते जा रहे हैं, जिससे भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है। इसलिए हमें अभी से संभलना होगा- महाराज जी कहते हैं, “हमें तो लगता है कि इसी जन्म में भजन कर लें, यही जीवन का सच्चा उपयोग है।”













