एक व्यक्ति ने प्रेमानंद जी महाराज से पूछा- “महाराज, क्या हमारा भाग्य कर्म से बनता है या भाग्य से हमारे कर्म तय होते हैं?”
महाराज जी ने बहुत सरल शब्दों में उत्तर दिया- “कर्म से ही भाग्य बनता है, और भाग्य के अनुसार हमें उसका फल – सुख या दुख मिलता है।” जिस प्रकार हम जैसा बीज बोते हैं, वैसा ही फल पाते हैं, उसी तरह हमारे कर्म ही हमारे जीवन का भविष्य तय करते हैं। अच्छे कर्म करेंगे तो अच्छा फल मिलेगा, बुरे कर्म करेंगे तो दुख मिलेगा। परंतु महाराज जी ने एक बहुत गहरी बात कही- “हमारे नए कर्म ऐसे होने चाहिए जो सुख और दुख दोनों से परे हों।” ऐसे कर्म केवल भगवान का भजन, नाम-जप और सेवा ही हैं, जो मनुष्य को सच्चा आनंद देते हैं। यह आनंद किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति पर निर्भर नहीं होता; यह भीतर से आता है- यह परमानंद है।
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महाराज जी कहते हैं- “सारे कर्म भगवान को समर्पित कर दो। जो भी करो, ईश्वर की भक्ति समझकर करो। तब जीवन अभी से आनंदमय हो जाएगा।” उन्होंने यह भी कहा कि किसी को नहीं पता कि आगे जन्म में क्या होगा। हमारे कर्मों के अनुसार हम किसी भी योनि में जा सकते हैं- मनुष्य, देवता, पशु या पक्षी कुछ निश्चित नहीं। इसीलिए उन्होंने समझाया “नाम-जप ही हमारा सच्चा रक्षक है। भगवान का नाम हमें हर जन्म में बचा लेगा।”













