कुछ लोगों को यह भ्रम होता है कि जीवन में जो कुछ भी घटित होता है- सुख-दुख, लाभ-हानि, सफलता-असफलता सब पहले से ही तय है। वे सोचते हैं कि जैसे पशु-पक्षी और अन्य योनियाँ पूर्व-नियत गति से चलती हैं, वैसे ही मनुष्य का जीवन भी पूर्व निर्धारित है। लेकिन यह विचार ठीक नहीं है।
प्रेमानंद जी महाराज ने कहा कि मनुष्य योनि विशेष है- यह केवल भोग के लिए नहीं, बल्कि पुरुषार्थ (संकल्प, परिश्रम और साधना) के लिए मिली है। मनुष्य को यह अधिकार प्राप्त है कि वह अपने कर्मों द्वारा प्रारब्ध को बदल सकता है, अपने भाग्य को मिटाकर भगवान की प्राप्ति कर सकता है।
यदि सब कुछ केवल भाग्य के अधीन होता, तो फिर दो ही बातें शेष रह जातीं सुख और दुख, जो कि पुण्य और पाप के फल हैं। लेकिन इनके बाद जो क्रमाण (अर्थात वर्तमान के कर्म) हैं- जैसे कि आप पाप करते हैं या पुण्य, या फिर भजन करते हैं ये सब आपकी स्वतंत्र इच्छा पर आधारित होते हैं। आलसी और प्रमादी जीव सोचते हैं- “जो होगा, सो होगा”, और इसी प्रमाद में पड़े रहते हैं। लेकिन ऐसे व्यक्तियों का न तो लौकिक कल्याण हो सकता है और न ही पारलौकिक। सच्चा कल्याण तभी संभव है जब पुरुषार्थ किया जाए। चाहे जीवन में धन-संपत्ति, ज्ञान या मोक्ष की बात हो- बिना परिश्रम और संकल्प के कुछ भी प्राप्त नहीं होता। भक्ति का मार्ग भी पुरुषार्थ चाहता है। कुछ लोग ‘आलस्य के भक्त’ होते हैं। वे कोई ऐसी बात खोजते हैं जिससे उन्हें मेहनत न करनी पड़े और शरीर का राग कम हो जाए। परंतु भक्ति का मार्ग सरल है लेकिन प्रमादी के लिए नहीं।
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हम कहते हैं कुछ मत खोजो, नाम जपो। शरीर से जो चेष्टाएँ स्वाभाविक रूप से हो रही हैं- जैसे गृहस्थ जीवन, व्यापार, नौकरी या खेती वो करते रहो लेकिन साथ ही ‘राधे राधे’, ‘कृष्ण कृष्ण’, ‘राम राम’ का नाम जपो। देखो, सब ठीक हो जाएगा। जीवन में आनंद आ जाएगा। पर बिना भगवान के नाम के, प्रमाद की स्थिति में पड़े रहने से कुछ नहीं होगा। नाम जप करना पड़ेगा और उसमें डटना पड़ेगा।













