वीरांगना दुर्गा भाभी : भारतीय स्वातंत्र्य समर में क्रांति की अग्निशिखा
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वीरांगना दुर्गा भाभी : भारतीय स्वातंत्र्य समर में क्रांति की अग्निशिखा

वीरांगना दुर्गा भाभी की जयंती 7 अक्टूबर पर विशेष

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा — edited by Sudhir Kumar Pandey
Oct 7, 2025, 02:10 pm IST
in भारत

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास लेखन में कांग्रेस के दरबारी इतिहासकारों और उसके द्वारा रोपित वामपंथी इतिहासकारों ने तथाकथित गांधीवाद की आड़ में एकांगी इतिहास लिखा। नारी नायिकाओं के साथ उचित न्याय नहीं हुआ! वीरांगना दुर्गा भाभी तथाकथित सुनहरे इतिहास के पन्नों में लुप्तप्राय एक सुनहरा व्यक्तित्व हैं। यूं तो भारतीय इतिहास के पन्नों में, भारत के स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम दर्ज किए गए। लेकिन ऐसे कई महान सेनानी भी हैं, जिन्होंने न केवल अपना पूरा जीवन इस संघर्ष के नाम किया, वरन् अद्वितीय योगदान भी दिया है। वे पर्दे के पीछे रहकर अपने अग्रणियों को आगे बढ़ने और डटे रहने का साहस प्रदान किया।

लेकिन दुर्भाग्यवश! इन्हें न तो हमारे इतिहास के पन्नों पर उचित स्थान दिया गया और न ही इनके बलिदान को वह सम्मान मिल सका, जिनके ये अधिकारी थे और वे महत्वपूर्ण व्यक्तिव धीरे-धीरे हमारे सुनहरे इतिहास की चमक से पीछे विस्मृति के गर्भ में समाते से जा रहे हैं। ऐंसी ही विभूतियों में से एक हैं-‘वीरांगना दुर्गा भाभी’।

‘दुर्गा भाभी’ का वास्तविक नाम था-दुर्गावती देवी। इनका जन्म 7 अक्टूबर 1907 में शहजादपुर ग्राम में पण्डित बांके बिहारी के यहां हुआ था। विवाह भगवती चरण वोहरा के साथ हुआ। दुर्गावती के पिता इलाहाबाद कलेक्ट्रेट में नाज़िर थे और उनके ससुर शिवचरण जी रेलवे में ऊंचे पद पर तैनात थे।

वोहरा जी, क्रन्तिकारी संगठन एच. एस. आर. ए. के प्रचार सचिव थे। दिल्ली के क़ुतुब रोड में स्थित घर में वोहरा, विमल प्रसाद जैन के साथ बम बनाने का काम करते थे, जिसमें दुर्गा भाभी भी उन लोगों की सहायता करतीं। प्रारंभिक दिनों में दुर्गा भाभी सूचना एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने और बम के सामान को लाने पहुंचाने का भी काम करती थीं।

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को दी शरण

16 नवम्बर,1926 में लाहौर में नौजवान भारत सभा ने भाषण का आयोजन किया, जहां दुर्गावती नौजवान भारत सभा की सक्रिय सदस्य के तौर पर सामने आयीं। दुर्गावती अद्भुत योजना-निर्मात्री थी, जिनकी योजना कभी-भी असफल नहीं होती थी। भगवती चरण कलकत्ता में ही थे कि 17 दिसंबर, 1928 को लाला लाजपत राय पर जेम्स एंडरसन स्काट के आदेश से लाठी चलाने वाले अंग्रेज पुलिस अधिकारी जॉन सांडर्स का वध कर दिया गया। ब्रिटिश सरकार ने लाहौर पर तरह-तरह की पाबंदियां थोप दीं। दुर्गा भाभी अपने तीन वर्षीय अबोध पुत्र के साथ घर पर अकेली थीं। देर रात किसी ने उनके घर की कुंडी धीरे से खटखटाई। दरवाजा खोला तो भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु सामने खडे़ थे। उन्हें समझते देर न लगी कि सांडर्स का वध इन्हीं का काम है।

लाहौर से भगत सिंह को सुरक्षित निकाला

दुर्गा भाभी ने इन लोगों को अपने घर में पनाह दी, पर इतना पर्याप्त न था। उन्हें मालूम था कि जब घर-घर तलाशी ली जा रही हो, तब आज नहीं तो कल पुलिस यहां भी आ धमकने वाली है। भगत सिंह और उनके साथियों के पकड़े जाने का तात्पर्य होता, क्रांति की उफनती धारा का रुक जाना। अनिश्चितता के उन्हीं लम्हों में वीरांगना दुर्गावती वोहरा ने एक अत्यंत साहसिक निर्णय लिया। वे भगत सिंह की पत्नी का स्वांग धरकर उन्हें लाहौर से सुरक्षित बाहर निकाल ले गईं। भगत सिंह अगर उस दौरान जीवित बच सके, तो उसके पीछे दुर्गावती का दृढ़ निश्चय और असीम साहस था। उनके पतिदेव जो धन गाढ़े समय के लिए उन्हें सौंप गए थे, वह भी क्रांतिकारियों की राह सुगम करने में व्यय हो गया। उन दिनों पांच हजार की रकम बहुत बड़ी राशि मानी जाती थी।

जतिंद्र नाथ का लाहौर में अंतिम संस्कार कराया

भगवती चरण वोहरा और दुर्गा भाभी का रिश्ता अनूठे विश्वास और साहचर्य का था। इसीलिए उनकी भूमिका केवल क्रांतिकारियों की सहयोगी भर की नहीं थी। दुर्गावती वोहरा को भारत की अग्नि भी कहा जाता है। यह दुर्गा भाभी ही थीं जिन्होंने अपने पति के बम कारखाने पर छापा पड़ने के बाद, क्रांतिकारियों के लिए ‘’पत्र मंजूषा “का काम किया। जुलाई 1929 में, उन्होंने भगत सिंह की तस्वीर के साथ लाहौर में एक जुलूस का नेतृत्व किया और उनकी रिहाई की मांग की। इसके कुछ सप्ताह बाद, 63 दिनों तक भूख हड़ताल करने वाले जतिंद्र नाथ दास की जेल में ही बलिदान हो गया था। ये दुर्गा देवी ही थीं, जिन्होंने लाहौर में उनका अंतिम संस्कार करवाया।

ब्रिटिश सार्जेंट और उसकी पत्नी पर गोली चलाई

भगवती चरण ने दुर्गा को भलीभाँति बंदूक चलाना सिखाया था। 8 अक्टूबर, 1930 को उन्होंने दक्षिण बंबई के लैमिंग्टन रोड पर स्थित पुलिस स्टेशन के आगे एक ब्रिटिश पुलिस सार्जेंट और उसकी पत्नी पर गोली चला दी थी। यह कदम उन्होंने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को एक दिन पहले सुनाई गई फांसी की सजा के प्रतिकार में उठाया था।

ब्रिटिश सरकार के लिए यह बडे़ आश्चर्य की बात थी कि कोई महिला इतनी दुस्साहसी कैसे हो सकती है? फलस्वरूप सारा अमला उनके पीछे लग गया और वह अंतत: सितंबर 1932 में गिरफ्तार कर ली गईं। यद्यपि उस गोलीकांड में उनकी भूमिका पर कुछ सवाल उठाए गए, परन्तु इससे उनकी वीर गाथा पर अंतर क्या पड़ता है? दुर्गा भाभी, ब्रिटिश सरकार की आंखों में कितना खटकती थीं, इसका खुलासा तत्कालीन इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस एसटी होलिन्स की पुस्तक नो टेन कमांडेंट्स से भी होता है।

पति की प्रेरणा को संजोए रखा

इस बीच दो वर्ष पूर्व 28 मई, सन् 1930 को भगवती चरण वोहरा का रावी नदी के तट पर बम बनाते समय हुए विस्फोट में बलिदान हुआ था। दुर्गा भाभी को उनके आखिरी दर्शन तक प्राप्त नहीं हुए थे, पर अपने स्वर्गीय पति की प्रेरणा को उन्होंने मरते समय तक संजोए रखा।

क्रांतिकारी इसलिए कहते थे भाभी

क्रांतिकारी उन्हें भाभी भी इसीलिए कहते कि वह उनके अग्रज भगवती चरण वोहरा की सहधर्मचारिणी थीं।इस सबके बाद दुर्गावती एकदम अकेली पड़ गई, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और पंजाब के पूर्व राज्यपाल लार्ड हैली को मारने की साजिश रच डाली,जो क्रांतिकारियों का बड़ा दुश्मन था।

हैली की गाड़ी को बम से उड़ाया

1 अक्टूबर,1931 को बंबई के लेमिंग्टन रोड पर दुर्गावती ने साथियों के साथ मिलकर हैली की गाड़ी को बम से उड़ा दिया, जिसके बाद पूरी ब्रिटिश पुलिस दुर्गावती की तलाश में जुट गई। लेकिन वे दुर्गावती को खोज नहीं पाए, 8 अक्टूबर को उन्होंने दक्षिण बॉम्बे में पुनः लैमिंगटन रोड पर खड़े हुए एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी पर हमला किया। यह पहली बार था जब किसी महिला को ‘इस तरह से क्रन्तिकारी गतिविधियों में शामिल’ पाया गया था। इसके लिए, उन्हें सितंबर 1932 में गिरफ्तार कर लिया गया और तीन साल की जेल हुई।

समाज सेवा के क्षेत्र में कार्य

भारत के स्वाधीनता संग्राम में योगदान के अतिरिक्त दुर्गा भाभी ने समाज सेवा के क्षेत्र में भी सराहनीय कार्य किये। सन् 1939 में, उन्होंने मद्रास में मारिया मोंटेसरी (इटली के प्रसिद्ध शिक्षक) से प्रशिक्षण प्राप्त किया। एक साल बाद, उन्होंने लखनऊ में उत्तर भारत का पहला मोंटेसरी स्कूल खोला। इस स्कूल को उन्होंने पिछड़े वर्ग के पांच छात्रों के साथ शुरू किया था। स्वतंत्रता के बाद के वर्षों में दुर्गा देवी लखनऊ में गुमनामी का जीवन जीती रहीं। 15 अक्टूबर, 1999 को 92 साल की उम्र में वे इस दुनिया से विदा लेकर अनंत यात्रा की ओर निकल गयीं।

नारी के सशक्त रूप का प्रतीक हैं दुर्गा भाभी

सदा यही होता आया है कि हमारा इतिहास उन महिलाओं के बलिदान और उनकी बहादुरी को सदैव भूल सा जाता है जिन्होंने तत्कालीन सत्ताधारियों की चाटुकारिता कभी नहीं की। अनेक ऐसी वीरांगनाएं सदैव छिपी ही रह जाती हैं। दुर्गा देवी वोहरा भी उन्हीं वीरांगनाओं में से एक हैं। स्वाधीनता के अमृत काल में ऐसी ही वीरांगनाओं का इतिहास रेखांकित किया जा रहा है।

दुर्गा भाभी की मृत्यु हुए, यूं तो अनेक वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन आज भी उनकी वीरता की कहानी हर हिन्दुस्तानी के ध्यान को आकृष्ट कर,उन्हें गौरवान्वित करती है। दुर्गावती प्रतीक हैं, नारी के सशक्त रूप की और सच्चे देश भक्त की, जिनके लिए क्रांति का तात्पर्य केवल सत्ता का तख्ता पलट करना मात्र नहीं था।उनके लिए वास्तविक क्रांति का तात्पर्य था,स्वाधीनता के बाद एक सशक्त देश की नींव डालना, एक शिक्षित समाज का निर्माण करना और यही कारण था कि दुर्गावती ने शुरु से ही गरीब बच्चों को पढ़ाने का नेक काम शुरु किया, जिसे उन्होंने जीवन पर्यन्त स्थिर रखा। दुर्गा भाभी की यही कार्य-प्रणाली और दूरदृष्टि उनके व्यक्तित्व को महान और अविस्मरणीय बनाती है।

Topics: भगत सिंहस्वाधीनता संग्रामराजगुरुसुखदेवपाञ्चजन्य विशेषदुर्गा भाभीभगवती चरण वोहराभारत का स्वतंत्रता संग्राम
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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