शरद पूर्णिमा: चंद्रमा की अमृत वर्षा, स्वास्थ्य रहस्य और पौराणिक महत्व
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शरद पूर्णिमा: चंद्रमा की अमृत वर्षा, स्वास्थ्य रहस्य और पौराणिक महत्व

शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की 16 कलाओं से अमृत वर्षा का रहस्य जानें। श्रीकृष्ण की महारास लीला, खीर का आरोग्य लाभ और लक्ष्मी पूजन की मान्यताएं। वैदिक मनीषा से जुड़े स्वास्थ्य व आध्यात्मिक महत्व को समझें।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by कुलदीप सिंह
Oct 6, 2025, 09:59 am IST
inविश्लेषण, धर्म-संस्कृति
Sharad Purnima

प्रतीकात्मक तस्वीर

शरद पूर्णिमा: ‘’शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’’ अर्थात मनुष्य का शरीर ही उसके समस्त धर्मों की पूर्ति हेतु साधन स्वरूप है। हमारी वैदिक मनीषा द्वारा उद्घोषित इस सूत्र वाक्य  में स्वास्थ्य संबंधी जीवन मूल्यों को विशेष मान्यता दी गयी है; और हमारी इस सनातन मान्यता का पोषक पर्व है शरद पूर्णिमा। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाये जाने वाले इस शरद उत्सव का आध्यात्मिक पक्ष जितना विशेष है, लौकिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

 पर्व से जुड़े पौराणिक आख्यान

‘श्रीमद्भागवत’ के अनुसार, योगेश्वर श्रीकृष्ण ने शरद पूर्णिमा की रात ही गोपियों के साथ ‘महारास’ की लीला रचायी थी। शास्त्रीय कथानक के अनुसार जब श्रीकृष्ण महारास में निमग्न थे, उसी समय चंद्रदेव आकाश से मंत्रमुग्ध, लालायित हो भगवान की लीला निहार रहे थे। लीला देखते हुए वे इतने भावविह्वल हो उठे कि उनको सुध ही नहीं रही कि कब वे अपनी शीतल ज्योत्सना के साथ पृथ्वी के अत्यंत निकट आ गये और अमृत वर्षा करने लगे। तब से लेकर आज तक हर शरद पूर्णिमा को चंद्रमा की किरणें अमृत वर्षा कर सांसारिक प्राणियों को विविध प्रकार के वरदान-अनुदान से परिपूर्ण करती हैं। पर्व से जुड़े एक अन्य कथानक के अनुसार  महाभारत के भीषण संग्राम के पश्चात मानसिक रूप से व्यथित पांडवों ने श्रीकृष्ण के परामर्श पर द्रौपदी के साथ शरद पूर्णिमा की रात्रि को गंगा स्नान कर मानसिक संताप से मुक्ति पायी थी।

मन को शीतल करतीं 16 चन्द्र कलाएं

चंद्रमा को वेद, पुराण, ग्रंथों में मन के तुल्य स्वीकार किया जाता है- ‘चंद्रमा मनसो जात:’। भारतीय मनीषा इस बात पर भी विश्वास करती है कि संपूर्ण वर्ष में सिर्फ इसी पूर्णिमा को चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से युक्त हो जाता है।

अमृत, मनदा, पुष्प, पुष्टि, तुष्टि, धृति, शाशनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्सना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्ण और पूर्णामृत; इन 16 कलाओं से संयुक्त शरद पूर्णिमा इसलिए सबसे महत्त्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इस रात्रि में चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होने के कारण उसका ओज सबसे तेजवान और ऊर्जावान होता है।

वैदिक मनीषा में यह स्पष्ट उल्लिखित है कि षोडश कलाओं से युक्त अमृत वर्षण करने वाले शरद चंद्र की पवित्र शीतलता मनुष्य के शरीर एवं मन दोनों को ही शीतल कर देती हैं। यही कारण है कि इस रात्रि को सकारात्मकता प्रदान करने वाली तथा आरोग्यवर्धनकारी कहा गया है। उपनिषदकार जब कहते हैं कि चंद्रमा मन का कारक है तो स्वाभाविक रूप से विचार आता है कि मनुष्य के मन की अवस्थाएं भी तो घटती बढ़ती रहती हैं। चंद्रमा की षोडश कलाएं वस्तुत: मन की ही तो विविध दशाओं की प्रतीक हैं।

चंद्रमा की अमृत वर्षा का रहस्य

विभिन्न प्राचीन भारतीय ग्रंथों और साहित्य में चंद्रमा को औषधीश या औषधियों का स्वामी कहा गया है। कालिदास चंद्रमा को ‘पतिरोषधीनाम्’ कहते हैं अर्थात जो औषधियों का पति यानी स्वामी है। पुराणों में स्पष्ट रूप से वर्णन आता है कि चंद्रमा से जो अमृतयुक्त तेज पृथ्वी पर ज्योत्सना के माध्यम से गिरता है, उसी से औषधियां जन्म लेती हैं। यही कारण है कि आयुर्वेदाचार्य पूरे वर्ष शरद पूर्णिमा की प्रतीक्षा करते हैं और इस विशेष रात्रि में अपनी समस्त जड़ी-बूटियों को उस अमृत चांदनी में पहले से अधिक शक्ति संपन्न और प्रभावशाली बनाने हेतु छोड़ देते हैं। इसका तत्वदर्शन आधार यह है कि शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा पृथ्वी के सर्वाधिक निकट होता है। अंतरिक्ष में विद्यमान समस्त ग्रहों से निकलने वाली सकारात्मक ऊर्जा चंद्र किरणों के माध्यम से पृथ्वी पर पड़ती हैं जो मानव शरीर और मस्तिष्क हेतु सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने वाली और मानव शरीर के ऊर्जा चक्रों को अपार ऊर्जस्वित बनाने वाली होती हैं।

चंद्र ज्योत्सना इस रात्रि धरती पर अन्न, जल और वनस्पतियों को औषधीय गुणों से सर्वाधिक सघनता से संतृप्त करती है। इसी आधार पर शरद पूर्णिमा को अमृत वर्षा करने वाला कहा जाता है। योगेश्वर श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं-‘पुष्णामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक:’ अर्थात मैं ही रसस्वरूप अमृतमय चंद्रमा होकर संपूर्ण औषधियों व वनस्पतियों को पुष्ट करता हूं। वस्तुत: यह कथन भी शरद पूर्णिमा की उपादेयता को ही सिद्ध करता है।

आरोग्य का अनुपम वरदान

मान्यता है कि शरद पूर्णिमा को चंद्रमा अपनी इन्हीं संपूर्ण कलाओं की अमृत वर्षा से पृथ्वीवासियों को उत्तम स्वास्थ्य हेतु वरदान देते हैं। इसीलिए शरद पूर्णिमा के अवसर पर बनाई जाने वाली खीर चंद्रमा की धवल चांदनी में रखी जाती है। यह जनसामान्य को आरोग्य प्रदान करती है, इसे त्रिदोष शामक माना जाता है। ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण तथा भाद्रपद में शरीर में जो पित्त संचित हो जाता है उसका शरद में शमन निश्चित है। संपूर्ण रात्रि चन्द्र अमृत को स्वयं में धारण करने वाली यह खीर जब सुबह खाली पेट प्रसाद रूप में ग्रहण की जाती है तो आरोग्यवर्धक और रोग प्रतिरोधक सिद्ध होती है। खुले आकाश के नीचे शरद पूर्णिमा की रात्रि को रखी जाने वाली खीर का औषधीय साथ ही साथ वैज्ञानिक महत्व भी अब सिद्ध किया जा चुका है। खीर के संगठक तत्वों के अंतर्गत दुग्ध में विद्यमान लैक्टिक अम्ल तथा चावल का स्टार्च इन दोनों में चंद्रकिरणों की शक्ति को आधिकारिक रूप से अवशोषित करने की क्षमता होती है जिससे वह अधिक गुणवत्ता युक्त हो जाते हैं। यह भी स्वीकार किया जाता है कि शरद पूर्णिमा को ब्रह्म मुहूर्त में चंद्रकिरणों के बीच यदि गंगा में स्नान किया जाए तो मनुष्य के शरीर में अद्भुत रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है।

शरद उत्सव से जुड़ी हिन्दू धर्म की विविध मान्यताएं

शरद पूर्णिमा को कोजागरी व्रत भी कहा जाता है। इसका तात्पर्य है ‘कौन जाग रहा है?’ कहते हैं माता लक्ष्मी को परम प्रिय ब्रह्मकमल पूरे वर्ष में सिर्फ इसी दिन पुष्पित होता है। माता लक्ष्मी ने द्वापर युग में श्री राधा के रूप में जन्म लिया था, इसी कारण एक वर्ग इस दिन श्री राधा जयंती मनाता है। गुजरात में जहां इस रात्रि लोग गरबा खेलते हैं वहीं मणिपुर में भी भक्तगण रास रचाते हैं। ओडिशा और पश्चिम बंगाल में श्रद्धालु रात्रि जागरण कर सर्वार्थ कामना सिद्धि के भाव से लक्ष्मी पूजन करते हैं। ओडिशावासी इस पर्व को माँ पार्वती और आदिदेव महादेव के जयेष्ठ पुत्र कार्तिकेय के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। यहां इसे ‘कुमार पूर्णिमा’ के नाम से पुकारा जाता है। कुंवारी कन्याएं कार्तिकेय तुल्य आकर्षक और पराक्रमी पति पाने हेतु उनकी पूजा करती हैं। यही नहीं, रामकथा के आदि सर्जक महर्षि वाल्मीकि की जयंती से भी यह पर्व जुड़ा हुआ है।

 शरद उत्सव का दिव्य तत्वदर्शन 

शरद पूर्णिमा वर्षभर में सबसे चमकदार और दोषरहित होती है। इस पर्व पर लक्ष्मी पूजन और चंद्र दर्शन के महिमा शास्त्रों में विस्तार से वर्णित है। पर्व के तत्वदर्शन की व्याख्या करते हुए श्री श्री रविशंकर कहते हैं, ‘शरद पूर्णिमा नृत्य और उत्सव के लिए जानी जाती है। यह वह समय होता है जब भक्त अपने जीवन में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव निकटता से करते हैं। हमारा मन और चंद्रमा जुड़े हुए हैं। जब चंद्रमा पूर्ण होता है, तो मन भी पूर्ण होता है। इस दिन ऊर्जा बहुत अधिक होती है और उत्सव इसे बनाए रखता है। लेकिन इस ऊर्जा को सही दिशा देने की आवश्यकता है। हम इस सुंदर पर्व पर यह संकल्प लें कि हमारे जीवन में प्रकाश, उत्साह और ज्ञान सदैव बना रहे और हम जीवन के प्रकाश को अपने भीतर ग्रहण करते रहें।”

 

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