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जो हमारा है, उसे हम वापस लेंगे, क्योंकि वह हमारा ही है : मोहन भागवत जी

आरएसएस के सरसंघचालक जी ने दिया एकता का संदेश, बोले- आज जरूरत है हम अच्छा दर्पण देखें, वह जो हमें एक दिखाए। भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। भारत की एकता को भाषा, धर्म या क्षेत्रीय पहचान से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से देखना होगा।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Oct 5, 2025, 07:23 pm IST
inभारत, संघ @100, मध्य प्रदेश

सतना । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने रविवार को कहा कि भारत की एकता को भाषा, धर्म या क्षेत्रीय पहचान से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से देखना होगा। आज जरूरत है कि हम अच्छा दर्पण देखें, वह जो हमें एक दिखाए। उन्होंने कहा कि जो हम घर का कमरा छोड़कर आए हैं, एक दिन उसे वापस लेकर फिर से डेरा डालना है। जो हमारा हक है, उसे हम वापस लेंगे, क्योंकि वह हमारा ही है।

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी आज यहां बाबा सिंधी कैंप स्थित मेहर शाह दरबार के नए भवन का लोकार्पण अवसर पर कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। हम सब सनातनी हैं, हम सब हिंदू हैं। पर एक चालाक अंग्रेज आया, जिसने हमें टूटा हुआ दर्पण दिखाया और अलग-अलग कर गया। उसने हमारी आध्यात्मिक चेतना छीन ली, हमें भौतिक वस्तुएं दे दीं और उसी दिन से हम एक-दूसरे को अलग समझने लगे। भारत की एकता को भाषा, धर्म या क्षेत्रीय पहचान से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से देखना होगा। आज जरूरत है कि हम अच्छा दर्पण देखें, वह जो हमें एक दिखाए। जब हम आध्यात्मिक परंपरा वाले दर्पण में देखेंगे, तो पाएंगे कि सब एक हैं। यही दर्पण हमारे गुरु दिखाते हैं, और हमें उसी मार्ग पर चलना चाहिए।

ये अवसर भले धार्मिक था, परंतु इसका भाव सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गया। डॉ. भागवत के ओजस्वी शब्दों ने उपस्थित जनसमूह में वह ऊर्जा भर दी, जिसने सबको अपने सनातन स्वरूप की याद दिलाई।

“हम सब सनातनी हैं, अंग्रेजों ने हमें तोड़ा”

अपने संबोधन में सरसंघचालक जी ने सबसे पहले इस बात पर बल दिया कि हम सभी अपने भीतर झांके, अपने अहंकार को त्यागे और अपने स्व को पहचाने। “जब हम स्वयं को पहचानेंगे, तभी समाज में परिवर्तन आएगा,” उन्‍होंने कहा, भारत में अनेक भाषाएं हैं, लेकिन भाव एक ही है, मातृभूमि के प्रति प्रेम और एकता की भावना।

अपने भाषण के भावनात्मक हिस्से में सरसंघचालक जी ने बंटवारे की ऐतिहासिक पीड़ा का उल्लेख करते हुए कहा कि 1947 के विभाजन में जो सिंधी भाई पाकिस्तान नहीं गए, वे वास्तव में अविभाजित भारत के प्रतीक हैं, जो हम घर का कमरा छोड़कर आए हैं, एक दिन उसे वापस लेकर फिर से डेरा डालना है। जो हमारा हक है, उसे हम वापस लेंगे, क्योंकि वह हमारा ही है।

उन्‍होंने कहा कि भाषा, भूषा, भजन, भवन, भ्रमण, भोजन ये हमारा चाहिए, जैसा हमारी परंपराओं में है, वैसा चाहिए।

“दुनिया हमें हिंदू ही कहती है”, पहचान छिपाने से नहीं मिटती जड़ें

सरसंघचालक जी ने कहा कि कुछ लोग स्वयं को हिंदू नहीं मानते, लेकिन पूरी दुनिया उन्हें उसी रूप में देखती है।

उन्होंने कहा- “जो लोग खुद को हिंदू नहीं कहते, वे विदेश चले जाते हैं, पर वहां भी लोग उन्हें हिंदू ही कहते हैं। यह उनकी कोशिशों के बावजूद होता है, क्योंकि हमारी पहचान हमारी जन्मभूमि, संस्कृति और जीवन दृष्टि से जुड़ी है, किसी लेबल से नहीं,”

उन्होंने कहा- यह कथन भारत की सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है, यह संदेश देता है कि भारत की आत्मा को न तो सीमाओं से बाँधा जा सकता है, न ही उसे किसी नाम से सीमित किया जा सकता है।

“इच्छा पूर्ति के लिए धर्म न छोड़ो”

इस दौरान सरसंघचालक जी ने समाज को एक गहरी आध्यात्मिक सीख भी दी, उन्होंने कहा- “अपना अहंकार छोड़ो और स्व को देखो। काम की इच्छा की पूर्ति के लिए अपने धर्म को मत छोड़ो। जब देश के स्व को लेकर चलेंगे, तो सारे स्वार्थ स्वयं ही सध जाएंगे।”

उन्होंने कहा कि धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं है, बल्कि जीवन जीने की एक संपूर्ण दृष्टि है।जब हम धर्म को अपने जीवन में व्यवहारिक रूप से अपनाते हैं, तभी समाज में सामंजस्य और प्रगति दोनों आते हैं।

अंग्रेजों की चालाकी, भारत की भूल

सरसंघचालक जी ने अंग्रेजी हुकूमत की नीति पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा- “अंग्रेज बहुत चालाक थे। उन्होंने युद्ध से ज्यादा हमें मानसिक रूप से पराजित किया। उन्होंने हमें टूटा हुआ दर्पण दिखाया, जिसमें हम अपने ही भाई को पराया देखने लगे। उन्होंने हमें यह विश्वास दिलाया कि हमारी संस्कृति पिछड़ी है, हमारी परंपराएं अनुपयोगी हैं और इसी छलावे में हमने अपनी आध्यात्मिक चेतना खो दी। अब समय है कि हम इस टूटी हुई छवि को छोड़कर सच्चे भारत का चेहरा देखें, वह चेहरा जो आत्मनिर्भर, आत्मजागरूक और आत्मगौरव से परिपूर्ण है।

नागपुर से सतना तक एक ही स्वर, एक ही संकल्प

उल्‍लेखनीय है कि सरसंघचालक जी का यह संदेश नया नहीं है, बल्कि निरंतरता का प्रतीक है। उन्होंने हाल ही में नागपुर में विजयादशमी के अवसर पर भी यही विचार व्यक्त किए थे। वहां उन्होंने कहा था कि “भारत को फिर से अपने आत्मस्वरूप में खड़ा करने का समय आ गया है। विदेशी आक्रमणों और गुलामी की लंबी रात के कारण हमारी देशी प्रणालियां नष्ट हो गई थीं, जिन्हें अब पुनः स्थापित करना आवश्यक है।”

इसके साथ ही उन्होंने कहा था कि केवल मानसिक सहमति से बदलाव नहीं आता, इसके लिए मन, वाणी और कर्म, तीनों में एकता चाहिए। संघ की शाखाएं यही कार्य कर रही हैं। यह केवल संगठन नहीं, आत्मजागरण की एक सशक्त प्रक्रिया है।

सतना में राष्ट्र चेतना का उत्सव

बता दें कि बाबा मेहर शाह दरबार परिसर में रविवार को श्रद्धा और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। जैसे ही सरसंघचालक जी मंच पर पहुंचे, पूरा मैदान “भारत माता की जय” और “जय श्रीराम” के नारों से गूंज उठा। लोगों की आंखों में गर्व और एकता की चमक थी।

इस अवसर पर दरबार प्रमुख पुरुषोत्तम दास जी महाराज, मध्यप्रदेश के उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल, राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी, सांसद गणेश सिंह, इंदौर सांसद शंकर लालवानी, प्रदेश महामंत्री भारतीय जनता पार्टी, विधायक भोपाल दक्षिण-पश्चिम विधानसभा, पूर्व राष्ट्रीय महासचिव भारतीय सिंधु सभा भगवानदास साबनानी, जबलपुर कैंट विधायक अशोक रोहानी, साधु-संत और गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

Topics: डॉ. मोहन भागवतहिन्दू पहचान‘भारत माता की जय’सतना संबोधनसांस्कृतिक एकताभारत की संस्कृतिभारत की विविधताRSS 100 Years100 years of RSSडॉ. मोहन भागवत सतनाराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघभारत की आध्यात्मिक एकताहिन्दू संस्कृतिसंघ प्रमुख भाषण‘आत्मनिर्भर भारत’बाबा मेहर शाह दरबार
Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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