डॉ. मयंक चतुर्वेदी
अश्विन कुमार निर्देशित एनिमेटेड फिल्म ‘महावतार नरसिंह’ ने भारतीय फिल्म उद्योग पर अभूतपूर्व छाप छोड़ी है। कम बजट में बनी इस फिल्म ने प्रदर्शित होने के बाद 12 दिनों में ही 100 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर लिया था। यह एक रिकॉर्ड है, खासकर जब सिनेमाघरों में ‘सैयारा’, ‘सन ऑफ सरदार 2’ और ‘धड़क 2’ जैसी बड़ी फिल्में माैजूद हों। इन फिल्मों को पीछे छोड़ते हुए ‘महावतार नरसिंह’ 2025 की शीर्ष 5 फिल्मों में शामिल हो गई है। यह आमिर खान की ‘सितारे जमीन पर’ (लाइफटाइम कलेक्शन 166.58 करोड़ रु.) ही नहीं, हॉलीवुड की ‘स्पाइडर मैन’ जैसी कई बड़ी एनिमेटेड फिल्मों को भी पीछे छोड़ दिया।
‘महावतार नरसिंह’ का देश-विदेश में कुल बॉक्स ऑफिस कलेक्शन लगभग 326 करोड़ रुपये है। मात्र 15 करोड़ में बनी इस फिल्म ने भारत में 250.75 करोड़ से अधिक व विदेशी बाजार में करीब 28 करोड़ रुपये कमाए हैं। यह फिल्म 2025 की सबसे सफल एनिमेशन फिल्मों में से एक मानी जा रही है, जिसने निर्माता को लगभग 1550 प्रतिशत का मुनाफा दिया है। इस साल की यह सबसे ज्यादा लाभदायक भारतीय फिल्मों में शुमार थी, लेकिन कन्नड़ हॉरर कॉमेडी फिल्म ‘सू फ्राॅम सो’ ने 1900 प्रतिशत से अधिक का मुनाफा देकर बाजी मार ली।
एनिमेशन की दुनिया में क्रांति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी 115वीं ‘मन की बात’ कार्यक्रम में भारत के एनिमेशन उद्योग की प्रगति और भारतीय एनिमेटेड सीरियल्स जैसे ‘मोटू-पतलू’, ‘छोटा भीम’, ‘हनुमान’ और ‘कृष्णा’ का उल्लेख कर चुके हैं।
उन्होंने कहा कि इन कार्टूनों का क्रिएटिव कंटेंट और भारतीय संस्कृति की झलक दुनियाभर में पसंद की जा रही है। भारत एनिमेशन की दुनिया में नई क्रांति कर रहा है और इसका विस्तार स्मार्टफोन, सिनेमा स्क्रीन्स, गेमिंग कंसोल और वर्चुअल रियलिटी जैसे क्षेत्रों तक हो रहा है।
उन्होंने भारत को एक वैश्विक एनिमेशन पावरहाउस बनाने का आह्वान किया और बताया कि भारत की युवा प्रतिभा अब स्पाइडर मैन और ट्रांसफॉर्मर्स जैसी विदेशी फिल्मों में भी योगदान दे रहा है। मोटू-पतलू की मासूमियत और चुटकले बच्चों के लिए स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करते हैं और यह सिर्फ टीवी तक सीमित नहीं, बल्कि मोबाइल और अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म्स पर भी लोकप्रिय हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनिमेशन सेक्टर को एक उद्योग के रूप में भी माना जो देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा रहा है और वर्चुअल रियलिटी टूरिज्म जैसे नए क्षेत्रों को जन्म दे रहा है। उन्होंने लोगों से देश को आत्मनिर्भर और एनिमेशन क्षेत्र में अग्रणी बनाने को प्रेरित किया है।।
नए युग की शुरुआत
फिल्म की सफलता का मुख्य कारण है, इसकी उच्च गुणवत्ता वाला एनिमेशन, पार्श्व संगीत व संवाद संरचना, जो इतनी सशक्त है कि दर्शकों को एक समग्र कलात्मक अनुभव प्रदान करती है। यह केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि लंबे समय तक दर्शकों के मन में गहन विचार, आध्यात्मिक ऊर्जा और शांति का भाव भी उत्पन्न करती है। इस फिल्म ने दर्शकों के बीच भारतीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कथाओं को पुनर्जीवित करने में भी नया आदर्श स्थापित किया है। इसकी एक और विशेषता यह है कि यह पहली बार कई भाषाओं में प्रदर्शित होकर व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंची। आधुनिक तकनीक के उत्कृष्ट प्रयोग व पौराणिक कथानक की नई व्याख्या ने इसे ऐसा अनोखा रूप दिया, जिसने इसे सफलता की नई ऊंचाई तक पहुंचा दिया है। ‘महावतार नरसिंह’ की सफलता सिर्फ आंकड़ों और बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है, यह भारतीय सिनेमा में नए युग की शुरुआत की प्रतीक है, जहां कंटेंट और संस्कृति, ग्लैमर व प्रचार से कहीं ज्यादा प्रभावी बनकर उभर रहे हैं।
परंपरा का आधुनिक रूपांतरण
भारतीय सभ्यता मूलतः कथा–प्रधान संस्कृति रही है। महाकाव्य, पुराण व उपाख्यान सिर्फ धार्मिक या सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि पीढ़ियों से नैतिकता, सत्य-दर्शन की धारा को प्रवाहमान रखने वाले जीवंत स्रोत हैं। ‘महावतार नरसिंह’ इसी अद्वितीय परंपरा का आधुनिक रूपांतरण है। ऐसी रचना, जिसमें भगवान विष्णु के तीसरे व चौथे अवतार की विलक्षण कथाओं को उच्च-स्तरीय एनिमेशन तकनीक व सशक्त सिनेमाई भाषा में ढालकर प्रस्तुत किया गया है। फिल्म में सिर्फ तकनीकी कौशल की चमक नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक स्मृति, आध्यात्मिक ऊर्जा व गहरी भावनात्मक आस्था का संगम दिखाई देता है। नरसिंह अवतार की कथा यहां केवल धार्मिक आख्यान नहीं रह जाती, बल्कि वर्तमान समाज के मूल्य–संकट, अन्याय और अहंकार जैसी चुनौतियों से सीधे संवाद करती है। यह अत्याचार पर धर्म, असत्य पर सत्य और अन्याय पर न्याय की विजयी हुंकार बनकर उभरती है।
यह पुनर्परिभाषा इसलिए भी ऐतिहासिक है, क्योंकि पौराणिक विषयों पर बनी अधिकांश फिल्मों को लंबे समय तक ‘सीमित दर्शक वर्ग’ का सिनेमा समझा जाता रहा है। ‘महावतार नरसिंह’ ने इस मिथक को तोड़ते हुए यह प्रमाणित किया है कि यदि पटकथा मजबूत हो, प्रस्तुति उत्कृष्ट हो और सांस्कृतिक जुड़ाव गहरा हो, तो वह हर उम्र, हर वर्ग और हर संस्कृति के दर्शकों के हृदय तक न केवल सीधी पहुंच बना सकती है, बल्कि भारी-भरकम स्टार पावर और करोड़ों के मार्केटिंग बजट को भी पीछे छोड़ सकती है।
‘वर्ड ऑफ माउथ’ की यह शक्ति बड़े-बजट वाले शोरगुल मचाने वाले मीडिया कैंपेन से भी कहीं अधिक असरदार साबित हुई। यह रुझान भारतीय सिनेमा में एक गहरे बदलाव का संकेत देता है, यानी दर्शक अब सतही ग्लैमर और मार्केटिंग दिखावे से प्रभावित होने के बजाय, ऐसी कहानियों की तलाश में हैं जो उन्हें उनकी जड़ों से जोड़ें, उनके दिल को छुएं और उनके अंदर सोई सांस्कृतिक चेतना को जगाएं। ‘महावतार नरसिंह’ ने न केवल इस उम्मीद को पूरा किया, बल्कि भारतीय आत्मा की उस गहरी प्यास को भी उजागर किया, जिसकी अनदेखी लंबे समय से की जा रही थी।
इस फिल्म की कथा का संदेश सचमुच कालातीत है। यह सिखाता है कि जब अधर्म चरम सीमा पर पहुंच जाता है, तो धर्म स्वयं अवतार लेकर संतुलन स्थापित करता है। हिरण्यकश्यप का अहंकार, प्रह्लाद की अटूट आस्था व भगवान नरसिंह का अवतरण, यह सब इस सच्चाई की उद्घोषणा करते हैं कि ‘सत्यमेव जयते’ केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि सृष्टि का शाश्वत नियम है। आज के संदर्भ में यह संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब समाज में नैतिक मूल्यों का क्षरण, सत्ता में अहंकार और निर्दोषों की आस्था पर प्रहार साफ दिखाई देता है। इस फिल्म ने यह भी उजागर किया कि अवतार किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं होता, वह जागृत चेतना का प्रतीक है, जो समय और परिस्थिति के अनुसार किसी भी रूप में प्रकट होकर अन्याय का अंत कर सकती है।
पौराणिकता और भविष्य का अद्भुत संगम

सनातन पौराणिक मान्यताओं पर आधारित दक्षिण भारतीय फिल्म ‘कल्कि 2898 एडी’ ने बॉक्स ऑफिस पर नए रिकॉर्ड बनाए। प्रदर्शन के सिर्फ 12 दिन में देश में 500 करोड़ और 900 करोड़ रुपये वैश्विक कमाई करते हुए यह पांच भाषाओं में दर्शकों का दिल जीत चुकी है। इसकी सफलता कोई संयोग नहीं है। पिछले दशक में दक्षिण सिनेमा ने मौलिक पटकथाओं और संस्कृति से गहरे जुड़ाव के बल पर लंबी छलांग लगाई है। निर्देशक नाग अश्विन, जो पहले ‘महानती’ जैसी ब्लॉकबस्टर बायोपिक दे चुके हैं, ने ‘कल्कि’ में भारतीय पौराणिक कथाओं और भविष्योन्मुख साइंस-फिक्शन को अद्भुत कल्पनाशक्ति और भव्यता के साथ पिरोया है।
संस्कृति, संघर्ष और परंपरा की गूंज
वामपंथी नैरेटिव को ध्वस्त करती ऋषभ शेट्टी की बहुचर्चित फिल्म ‘कांतारा’ वनवासी धार्मिक मान्यताओं को रोचक और प्रभावशाली अंदाज में पेश करती है। अपनी सांस्कृतिक गहराई, स्थानीय कथानक और मानवीय संघर्षों के संगम से इसने दर्शकों के दिलों में जगह बनाई। पौराणिक और लोककथाओं की खूबसूरत बुनावट में ग्रामीणों के वन अधिकार और विरासत बचाने के संघर्ष को संवेदनशीलता से दिखाया गया है। ‘भूत कोला’ और ‘कंबाला’ जैसे दक्षिण भारतीय लोक-त्योहार, देवी ‘दैव पंजुरली’ की पूजा, तथा जंगल-भूमि के प्रति गहरी आस्था—ये सब फिल्म को विशिष्ट पहचान देते हैं।
भारतीय मूल्यों का उत्सव

तेलुगु फिल्म ‘श्रीनिवास कल्याणम्’ ने भारतीय संस्कृति, परंपरा व मूल्यों को सम्मानपूर्वक चित्रित किया है। इसमें विवाह को मात्र सामाजिक रस्म नहीं, बल्कि संस्कार, जीवन दर्शन व दो परिवारों के पवित्र मिलन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। आधुनिक जीवनशैली के बीच यह फिल्म संयुक्त परिवार, परंपरा व भावनात्मक रिश्तों के महत्व को खूबसूरती से उजागर करती है। पिता-पुत्री का स्नेह व जिम्मेदारी की भावना इसके भावनात्मक केंद्र में है, जिससे इसे पारिवारिक दर्शकों का भरपूर स्नेह मिला।
परंपरा की प्रतिष्ठा

‘बाहुबली 2’ को उत्तर से दक्षिण तक अपार सराहना मिली। इसमें संस्कृत, तमिल, तेलुगु की परंपरा, लोकगीत, वास्तुकला, पहनावे और रीति-रिवाज का अद्भुत संगम है, जो भारत की विविध संस्कृति को एक मंच पर लाती है। नैतिक मूल्य, परंपरा, महाकाव्यात्मक कथा, परिवार, नारी सम्मान व सामाजिक रीति-नीति का जीवंत चित्रण इसे समृद्ध सांस्कृतिक संदेश का वाहक बनाता है। राज्याभिषेक, धार्मिक अनुष्ठान, मांगलिक संस्कार, युद्ध की विधि और सामाजिक नियमों के साथ यह सत्य, धर्म और न्याय के लिए बलिदान की प्रेरणा देती है, जो भारतीय समाज की नींव हैं।
वीरता, दोस्ती और इतिहास का संगम
एस.एस. राजामौली निर्देशित ‘आरआरआर’ में स्वतंत्रता संघर्ष की अदम्य जीवटता को भव्यता से प्रस्तुत किया गया है। दो वीर सेनानियों की काल्पनिक मित्रता, ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उनके संघर्ष, जल-जंगल-जमीन व जनजातीय अधिकारों की रक्षा के लिए उनका नायकत्व फिल्म का मूल है। उत्कृष्ट कहानी, दमदार संगीत, शानदार छायांकन, भव्य सेट्स और स्पेशल इफेक्ट्स के साथ इसमें एक्शन, इमोशन, दोस्ती और देशभक्ति का अद्वितीय संगम है। यह भारतीय सिनेमा की सर्वाधिक कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल है।
भविष्य की दिशा
होम्बले फिल्म्स ने ‘महावतार नरसिंह’ की ऐतिहासिक सफलता के बाद ‘महावतार’ शृंखला की घोषणा की है। यह केवल व्यावसायिक फिल्म फ्रेंचाइजी की योजना नहीं, बल्कि भारतीय पौराणिक साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक सशक्त और सुनियोजित सांस्कृतिक अभियान है। दूसरे शब्दों में, यह हिंदू धर्म के शाश्वत आख्यानों के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना के विस्तार की दिशा में एक निर्णायक कदम है। पौराणिक कथाएं अब ग्रंथों और मंदिरों की सीमाओं से निकलकर सिनेमा की ताकत के सहारे वैश्विक मंच पर भारतीय सांस्कृतिक धरोहर की प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराएंगी, जहां ये न केवल मनोरंजन का साधन होंगी, बल्कि पहचान, आस्था व विरासत का सशक्त स्वर भी बनेंगी। हॉलीवुड ने ग्रीक, रोमन और नॉर्स मिथकीय गाथाओं पर आधारित कई भव्य फिल्में बनाईं, जिन्होंने दुनियाभर में दर्शकों को मोहित किया। ‘महावतार नरसिंह’ की सफलता संकेत है कि भारतीय पौराणिक कथाओं में भी उतनी ही अंतरराष्ट्रीय अपील, गहराई व सांस्कृतिक शक्ति माैजूद है। यदि इन्हें तकनीकी उत्कृष्टता व संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत किया जाए, तो ये वैश्विक सिनेमा को एक नया आयाम दे सकती हैं।

एक सच्ची महान फिल्म वही होती है जो दर्शक के हृदय को गहराई से छू जाए, न केवल संवादों और दृश्यों से, बल्कि अपने मूल विचार से भी। ‘महावतार नरसिंह’ का केंद्रीय संदेश यही है कि ईश्वर कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर है। अन्याय से लड़ने की शक्ति बाहर से नहीं आती, वह प्रत्येक व्यक्ति के अंतर्मन में विद्यमान है; केवल उसे पहचानना और जागृत करना होता है। यह केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण का संकेतक है। यह बदलाव न केवल भारतीय सिनेमा के लिए शुभ संकेत है, बल्कि वैश्विक सांस्कृतिक परिदृश्य में भारत की भूमिका को भी और सशक्त करेगा। इस सफलता ने सिद्ध किया है कि अच्छी कथा, प्रामाणिक प्रस्तुति व भावनात्मक जुड़ाव किसी भी मार्केटिंग रणनीति से अधिक शक्तिशाली हो सकते हैं। ‘महावतार नरसिंह’ ने यह भी प्रमाणित किया है कि भारतीय पौराणिक कथाएं केवल अतीत की स्मृतियां नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य, दोनों के लिए प्रेरणास्रोत हैं।
(लेखक केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड एडवाइजरी
कमेटी के पूर्व सदस्य हैं)

















