देहरादून पेपर लीक पर आंदोलन कर रहे उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा के बीच अब वामपंथी टूलकिट्स की एंट्री हो गई है। कांग्रेस के द्वारा बैक सपोर्ट दिए जाने वाले इन आंदोलनकारी परजीवियों द्वारा ऐसे भड़काऊ नारे लगाए जा रहे हैं जो जेएनयू दिल्ली में लगाए जाते थे।
जेएनयू जैसे नारे और आंदोलनकारी परजीवी
“हम छीन के लेंगे आज़ादी” के नारे लगाने वाले आंदोलनकारी परजीवी अचानक देहरादून के परेड ग्राउंड में शिक्षित बेरोजगारों के आंदोलन में दिखाई देने लगे हैं। दिल्ली में जेएनयू, जामिया और शाहीन बाग में आज़ादी के नारे लगाकर युवाओं को सरकार के खिलाफ भड़काने वाले टूलकिट्स क्या कांग्रेस के कहने पर राजधानी देहरादून में डेरा डाले हुए हैं? या कोई और इन्हें अन्य राज्यों से यहां लाकर आंदोलन करवा रहा है?
बॉबी पंवार और स्वाभिमान मोर्चा का गठन
कल तक बेरोजगार संघ का आंदोलन बॉबी पंवार अपने साथियों के साथ मिलकर शुरू किए। उसने अब उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा का रूप ले लिया है। अब इसमें अचानक वामपंथी टूलकिट्स की एंट्री हो गई है। राज्य भर के जितने भी लेफ्टिस्ट पत्रकार और संगठनों से जुड़े युवा थे, वे भी इसी मोर्चा की छतरी के नीचे एकत्र हो गए हैं।
बीजेपी सरकार के खिलाफ टूलकिट्स की रणनीति
उल्लेखनीय है कि इस टूलकिट्स के कार्यकर्ताओं के पास एक ही एजेंडा होता है कि वे जिन-जिन राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं, उनके खिलाफ आंदोलन खड़ा करके उन्हें कमजोर करना है।
2027 चुनाव से पहले कांग्रेस की संभावित रणनीति
उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में 2027 में चुनाव होने हैं। उससे पहले बीजेपी राज्यों में सरकारों के खिलाफ युवाओं के आंदोलन खड़े करके कांग्रेस के लिए माहौल बनाने का खेल देहरादून में ये टूलकिट्स खेलने आए हैं।
बेरोजगार संघ का पुराना आंदोलन
देहरादून में पिछले सालों में शिक्षित बेरोजगारों द्वारा बेरोजगार संघ द्वारा आंदोलन किए गए। उस वक्त आंदोलन का नेतृत्व बॉबी पंवार, राम कंडवाल आदि युवाओं ने किया। बॉबी पंवार ने उत्तरकाशी लोकसभा का चुनाव भी लड़ा और अपनी राजनीतिक हैसियत बनाने के लिए जुगाड़-जंतर भी किया।
वामपंथी एंट्री पर सवाल
लेकिन तब तक इनके साथ बाहरी नगरों के वामपंथी एंट्री नहीं हुई थी और अचानक इस बार ये कैसे हो गई? स्वाभाविक चर्चा शुरू हो गई है कि जब से बॉबी पंवार टीम ने उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा बनाया और उसके बाद इसमें वामपंथी विचारधारा के युवाओं की भी एंट्री होनी शुरू हो गई। सवाल ये भी उठा है कि आखिर इस मोर्चा को फंडिंग कहां-कहां से हो रही है? क्या कोई बाहरी एजेंसियां यहां सक्रिय हैं?
सोशल मीडिया के जरिए भीड़ जुटाने का खेल
सोशल मीडिया के जरिए युवाओं की भीड़ जुटाना और उन्हें सरकार विरोधी, देश विरोधी नारे लगवा कर उकसाना इन टूलकिट्स की विशेषता होती है।
बीजेपी और हिंदुत्व संगठनों पर निशाना
टूलकिट्स के परजीवी बीजेपी सरकार के अलावा आरएसएस, हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों को भी निशाने पर रखते हैं। इन्हें भगवे ध्वज से नफरत है और इस्लामिक हरे रंग से प्रेम है। देहरादून में आंदोलन के दौरान भगवा झंडों को कोसा गया और ऐसे झंडे लेकर आने वाले लोगों को गांव में घुसने न देने का आह्वान भी किया गया है।
पेपर लीक प्रकरण की रणनीति
पेपर लीक प्रकरण भी एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा प्रतीत हो रहा है कि कैसे आरोपियों ने आंदोलनकारियों से संपर्क किया और यह मामला सोशल मीडिया के जरिए तूल पकड़ता गया।
खालिद मलिक और साबिया का नाम
परीक्षा प्रश्नपत्र के तीन पन्नों के बाहर आने के बाद से मचे बवाल में दो आरोपी खालिद मलिक और उसकी बहन साबिया का नाम जब सामने आया तो उत्तराखंड बीजेपी ने इसे नकल जिहाद बताया। जिसके बाद से टूलकिट्स को खासी बेचैनी हुई क्योंकि ऐसी जानकारी भी सामने आ रही है कि आंदोलनकारी परजीवियों में बड़ी संख्या में मुस्लिम युवक-युवतियां भी शामिल हैं।
देवभूमि उत्तराखंड में षड्यंत्र की आशंका
उत्तराखंड देवभूमि मानी जाती है जहां एक विशेष समुदाय ने सनातन संस्कृति के खिलाफ पहले से ही षड्यंत्र रचा हुआ है। धामी सरकार लैंड जिहाद, थूक जिहाद, लव जिहाद, मजार जिहाद जैसे मामलों में सख्ती बरत रही है।
आरएसएस के शताब्दी वर्ष पर विरोध
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के सौ साल मना रहा है। पूरे देश के साथ-साथ उत्तराखंड में भी कार्यक्रम हो रहे हैं, जिनके खिलाफत करने सभी वामपंथी टूलकिट्स सक्रिय हो गए हैं।
देवभूमि में विचारधारा का युद्ध
समझने वाले भलीभांति समझते हैं कि देवभूमि में विचारधारा का युद्ध हो रहा है। कांग्रेस और वामपंथी एक हो रखे हैं जिन्हें पीछे से जमीयत उलेमा-ए-हिंद भी मदद करती रही है।
खालिद मलिक और साबिया के पीछे कौन?
बड़ा सवाल ये भी है कि क्या खालिद मलिक और साबिया के पीछे भी कोई और एजेंसियां या शक्तियां काम कर रही हैं?
नकल विरोधी कानून और धामी सरकार की उपलब्धि
उत्तराखंड में सशक्त नकल विरोधी कानून है, जिसमें कठोर सजा-दंड का प्रावधान है। बावजूद इसके खालिद मलिक ने भर्ती परीक्षा में नकल करने का दुस्साहस किया। ऐसा प्रतीत होता है कि अभी इसके पीछे और भी कहानियों का पर्दाफाश होना बाकी है।
धामी सरकार की पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया
धामी सरकार की यह उपलब्धि भी विपक्ष को रास नहीं आ रही है कि पिछले चार साल में 25 हजार से अधिक बेरोजगारों को सरकारी नौकरियों में पारदर्शी रूप से नौकरियां हासिल हुई हैं। धामी सरकार की इस साख पर चोट पहुंचाने के लिए भी टूलकिट्स सक्रिय हुए हैं।
दून पुलिस की सतर्कता जरूरी
बरहाल देहरादून के परेड ग्राउंड के आसपास वामपंथी नारे गूंज रहे हैं और इन्हें लगाने वालों के चेहरे भी अंजान हैं। ये कहां से आए हैं? कौन लोग हैं? इस पर दून पुलिस को सतर्कता बरतनी जरूरी है।

















