उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने राज्य की विकास यात्रा को नई दिशा दी है। यह दौर केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और ठोस परिणामों का रहा है। “विकसित भारत @2047” के विजन को आगे बढ़ाते हुए उत्तराखंड ने खुद को अग्रणी राज्यों में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, लेकिन कई ऐसे विषय हैं जिन पर काम किए जाना अभी भी जरूरी है, उदाहरण के तौर पर वनभूमि पर अवैध कब्जे, अवैध मुस्लिम प्रवासियों द्वारा जनसांख्यिकी संतुलन बदलने के प्रयासों पर लगाम लगाए जाने की जरूरत है। पहाड़ी क्षेत्रों से बढ़ता पलायन कैसे रोका जाए इसके लिए योजना बनाए जाने की भी जरूरत है।
ऐतिहासिक फैसले और मजबूत शासन व्यवस्था
धामी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में समान नागरिक संहिता (UCC) का लागू होना शामिल है, जिससे उत्तराखंड इस दिशा में पहल करने वाला पहला राज्य बना। इसके साथ ही सशक्त भू-कानून, सख्त कन्वर्जन विरोधी कानून और नकल विरोधी कानून जैसे फैसलों ने शासन को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाया है। नकल विरोधी कानून के बाद भर्ती प्रक्रियाओं में विश्वास बढ़ा है। इसका परिणाम यह रहा कि चार वर्षों में 32 हजार से अधिक युवाओं को सरकारी नौकरियां मिलीं। यह आंकड़ा सरकार की प्रतिबद्धता और प्रशासनिक सुधारों का प्रमाण माना जा रहा है।
आर्थिक मोर्चे पर भी उत्तराखंड ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। वर्ष 2024-25 में राज्य का सकल राज्य घरेलू उत्पाद 3.81 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, यह 2021-22 की तुलना में लगभग डेढ़ गुना वृद्धि है। प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 2.73 लाख रुपए हो गई है, जबकि बहुआयामी गरीबी सूचकांक घटकर 6.92 प्रतिशत रह गया है। राज्य की विकास दर 7.23 प्रतिशत तक पहुंचना मजबूत आर्थिक आधार को दर्शाता है। यह संकेत देता है कि राज्य ने संतुलित और समावेशी विकास की दिशा में निरंतर प्रयास किए हैं। औद्योगिक क्षेत्र में ‘ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट’ के दौरान 3.56 लाख करोड़ रुपए के (समझौता ज्ञापन) पर हस्ताक्षर हुए। इसके तहत 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक का निवेश अभी तक हो चुका है। इससे राज्य में रोजगार के नए अवसर सृजित हुए हैं। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम उद्योगों की संख्या बढ़कर लगभग 80 हजार हो गई है, जिससे स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों को गति मिली है।
स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा में विस्तार
स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में अटल आयुष्मान योजना के तहत 61 लाख से अधिक कार्ड बनाए गए हैं और 17 लाख से ज्यादा मरीजों को 3400 करोड़ से अधिक का मुफ्त इलाज उपलब्ध कराया गया है। महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण, सहकारी समितियों में 33 प्रतिशत भागीदारी और “लखपति दीदी” योजना के माध्यम से 2.5 लाख से अधिक महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कार्य किया गया है। पर्यटन क्षेत्र में उत्तराखंड ने नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं।
वर्ष 2025 में 6 करोड़ से अधिक पर्यटक राज्य में पहुंचे। चारधाम यात्रा और कांवड़ यात्रा में रिकॉर्ड संख्या में श्रद्धालुओं की भागीदारी रही। केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम में मास्टर प्लान के तहत विकास कार्य जारी हैं। मानसखंड मंदिर माला मिशन और शीतकालीन यात्रा की शुरुआत से पर्यटन को वर्षभर सक्रिय रखने का प्रयास किया गया है। हेलीपोर्ट और हेलीपैड की संख्या में वृद्धि से दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंच आसान हुई है, जिससे पर्यटन और आपदा प्रबंधन दोनों में लाभ मिला है।
कहीं खो न जाए रामा गांव
उत्तराखंड में ‘जनसांख्यिकी परिवर्तन‘ सामाजिक और राजनीतिक समस्या बन गया है। प्रदेश में एक ओर शहरों में मलीन बस्तियों में मुसलमानों की बसावट तेजी से हुई है, वहीं दूसरी ओर गांव भी इससे अछूते नहीं हैं। गांव में भी बिहार और बंगाल से आकर मुसलमान बस गए हैं। इस कारण गांव में जनसांख्यिकी परिवर्तन के साथ अवैध मजार और मस्जिदें समस्या बन गई हैं। इससे सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता का भी संकट उत्पन्न हो गया है। यह स्थानीय लोगों के लिए चिंता का विषय है।
पिछले दिनों पौड़ी जिले का रामा गांव मुसलमानों की बढ़ती आबादी के कारण सोशल मीडिया पर वायरल था। रामा गांव दुग्गड़ा ब्लाॅक, कोटद्वार तहसील में देवल खाल पंचायत मंे है। इस गांव में पहले से हिंदू और मुसलमान परिवार रहते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की कुल जनसंख्या 211, जिसमें 49 परिवार रहते हैं।
ग्रामवासियों के अनुसार कभी यहां मंदिर की घंटियों के मुधर स्वरों से लोगों की नींद खुलती थी लेकिन अब अजान से खुल रही है क्योंकि गांव में मुसलमानों की आबादी बढ़ गई है। मुसलमानों ने यहां एक बड़ी मस्जिद बनाई है। इस मस्जिद का मौलाना इरशाद है, जो बिहार से आकर यहां बसा है। वह अपने बीवी-बच्चों के साथ रहता है।
रामा गांव के लोगों का कहना है कि पहले यहां कोई बड़ी मस्जिद नहीं थी। हाल ही में, इस गांव में एक बहुत बड़ी मस्जिद का निर्माण हुआ है। यह मस्जिद इतनी बड़ी है कि हिमालय की वादियों के बीच दूर से ही दिख जाती है। मस्जिद से लाउड स्पीकर के जरिए पांच वक्त की नमाज और अजान दी जा रही है। लाउड स्पीकर की आवाज से आस-पास के गांव का वातावरण अशांत हो रहा है और लोग परेशान हैं।
अब स्थानीय लोगों ने इसके विरोध में आवाज उठानी शुरू कर दी है। कई लोगों ने अपने घर की छतों से इस मस्जिद के वीडियो डाले हैं और यहां से आने वाली आवाजों को सुनाते हुए आरोप लगाया है कि अगर सही समय पर कदम नहीं उठाया गया तो यह गांव जल्द ही मौला या अल्लाह गांव कहलाने लगेगा। सोशल मीडिया पर लोग अनुरोध कर रहे हैं कि पहाड़ियों आगे आओ और आवाज उठाओ। साथ ही, लोग इस के लिए प्रशासन से भी इस मामले में दखल देने की मांग कर रहे हैं।
कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नवाचार
कृषि क्षेत्र में भारत सरकार की मिलेट्स नीति(श्री अन्न), कीवी नीति और ड्रैगन फ्रूट योजनाएं किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू की गई हैं। “हाउस ऑफ हिमालयाज” ब्रांड के माध्यम से स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे न केवल किसानों को लाभ हुआ है बल्कि स्थानीय उत्पादों की पहचान भी मजबूत हुई है।
केंद्र और राज्य सरकार के समन्वय से कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं। नैनीताल जिले की जमरानी बांध परियोजना, लखवाड़ पावर प्रोजेक्ट और ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन इसका उदाहरण हैं। दिल्ली-देहरादून एलिवेटेड रोड, हरिद्वार बाईपास और हरिद्वार-नजीबाबाद हाईवे जैसी परियोजनाएं भी अंतिम चरण में हैं। किच्छा में एम्स सैटलाइट सेंटर का निर्माण कार्य प्रगति पर है, जबकि उड़ान योजना के तहत हेली सेवाओं से पर्वतीय क्षेत्रों की कनेक्टिविटी में सुधार हुआ है।
उत्तराखंड राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लागू करने वाला पहला राज्य बना है। दून विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर हिन्दू स्टडीज की स्थापना और स्कूलों में श्रीमद्भगवद्गीता को पाठ्यक्रम में शामिल करना सांस्कृतिक शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में कदम है। ऊर्जा क्षेत्र में राज्य की सौर क्षमता 1 गीगावाट से अधिक पहुंच चुकी है और 42,000 से अधिक सोलर रूफटॉप संयंत्र स्थापित किए गए हैं। खेलों में पहली बार राष्ट्रीय खेलों का आयोजन और 103 पदक जीतना राज्य के लिए गौरव का विषय रहा है।
राष्ट्रीय सूचकांकों में बेहतर प्रदर्शन
नीति आयोग के निर्यात तैयारी सूचकांक 2024 में उत्तराखंड ने छोटे राज्यों में पहला स्थान प्राप्त किया। एसडीजी (सतत विकास लक्ष्य) इंडिया इंडेक्स 2023-24 में भी राज्य शीर्ष पर रहा। ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में “उपलब्धि हासिल करने वाले राज्य” स्टार्टअप रैंकिंग में “अग्रणी” श्रेणी मिलना राज्य की निवेश-अनुकूल नीतियों को दर्शाता है। विंग्स इंडिया 2026 में “बेस्ट स्टेट फॉर प्रमोशन ऑफ एविएशन इकोसिस्टम” का पुरस्कार और खनन सुधारों में दूसरा स्थान भी राज्य की उपलब्धियों में शामिल है।
सांस्कृतिक पहचान और सख्त नीतियां
धामी सरकार ने “विकास भी, विरासत भी” के मंत्र के साथ सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने पर जोर दिया है। सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने के अभियान में 12 हजार एकड़ भूमि कब्जामुक्त कराई गई और सैकड़ों अवैध संरचनाओं पर कार्रवाई की गई। सरकार ने कन्वर्जन, दंगा नियंत्रण और अन्य संवेदनशील मुद्दों पर सख्त कानून लागू किए हैं। साथ ही बद्री-केदार, हेमकुंड साहिब और अन्य धार्मिक स्थलों के पुनर्निर्माण कार्यों को गति दी गई है। राज्य आंदोलनकारियों को सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण दिया गया है और उनकी पेंशन में वृद्धि की गई है।
शहीद सैनिकों के परिजनों को मिलने वाली अनुग्रह राशि 10 लाख रुपए से बढ़ाकर 50 लाख रुपए कर दी गई है, जबकि परमवीर चक्र विजेताओं के लिए यह राशि 1.5 करोड़ रुपए तक बढ़ाई गई है। अग्निवीर योजना के अंतर्गत सेवा देने वाले युवाओं को भी सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया गया है। धामी उत्तराखंड के पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो लगातार दूसरी बार सत्ता में आए हैं। उनका वर्तमान कार्यकाल मिलाकर ‘चार साल एवं नौ माह’ से अधिक का हो चुका है। एक युवा नेता के रूप में उन्होंने प्रशासनिक सुधार, आर्थिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण के संतुलन में साथ अपनी अलग पहचान बनाई है। उनके नेतृत्व में उत्तराखंड ने विकास और विरासत के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया है।
इन मुद्दों पर भी हो काम
उत्तराखंड सरकार के सामने कई चुनौतियां भी हैं। इनमें सबसे प्रमुख समस्या पलायन की है। दुर्गम क्षेत्रों में रोजगार,और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण गांव छोड़ चुके हैं। इससे सैकड़ों गांव खाली हो गए हैं और पहाड़ी क्षेत्रों का सामाजिक ढांचा कमजोर पड़ा है। दूसरी बड़ी चुनौती अवैध कब्जे और भूमि अतिक्रमण की है। धामी सरकार लगातार कार्रवाई कर रही है लेकिन फिर भी अभी तक सारे अवैध कब्जे नहीं हटाए गए हैं। इस साल जनवरी में सर्वोच्च न्यायालय ने चिंता जताते हुए कहा था कि वर्षों से जंगल और सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे होते रहे हैं। इस मामले में न्यायालय ने विस्तृत रिपोर्ट भी मांगी है। जनसांख्यिकी बदलाव और अवैध प्रवासियों को लेकर काम किए जाने की जरूरत है।
















