विमुक्त जनजातियों की देवी उपासना: भारत की सांस्कृतिक विरासत में अनदेखा स्वर्ण अध्याय
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विमुक्त जनजातियों की देवी उपासना: भारत की सांस्कृतिक विरासत में अनदेखा स्वर्ण अध्याय

भारत में विमुक्त, खानाबदोश और अर्ध-खानाबदोश जनजातियों के बीच देवी पूजा और नवरात्रि की परंपराएं और मान्यताएं हिंदू धर्म की विरासत हैं।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा — edited by Mahak Singh
Sep 23, 2025, 10:00 am IST
inछत्तीसगढ़
बंजारी माता मंदिर रायपुर छत्तीसगढ़

बंजारी माता मंदिर रायपुर छत्तीसगढ़

भारत में विमुक्त, खानाबदोश और अर्ध-खानाबदोश जनजातियों के बीच देवी पूजा और नवरात्रि की परंपराएं और मान्यताएं हिंदू धर्म की विरासत हैं। ये जनजातियाँ आदिशक्ति के विभिन्न रूपों का आदर करती हैं और इसलिए हिंदू धर्म का अभिन्न अंग हैं। जहां महादेवी मां काली और महाविद्या मां बगलामुखी की पूजा प्रमुख है, वहीं परिवारों में कुलदेवियों का भी महत्व है।

छत्तीसगढ़ और राजस्थान सहित मध्य भारत के विभिन्न राज्यों में उनके द्वारा स्थापित मूर्तियों और मंदिरों में नवरात्रि का भव्य उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी माँ तुलजा भवानी थीं। सम्पूर्ण भारत में छत्तीसगढ़ के रायपुर में बंजारी माता का मंदिर बंजारों की कुल देवी का मंदिर है, जो मां बगलामुखी देवी के रूप में पूजनीय हैं। इस प्रकार, देवी की पूजा और नवरात्रि का भव्य त्योहार पूरे भारत में हर जगह मनाया जाता है।

लेकिन यह कितना दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि सनातन धर्म के ध्वजवाहक, सिल्क रोड के उत्कृष्ट व्यापारी, देश के स्वतंत्रता संग्राम में सर्वोच्च बलिदान देने वाले विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातीय परिवार, अपने ही देश भारत में, बिना उचित नागरिकता, आधार कार्ड, मताधिकार, आवास और अन्य सुविधाओं के, अजनबी बन गए। मुस्लिम और ईसाई घुसपैठिये विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यक बन गए हैं, और यहां तक ​​कि भगोड़े रोहिंग्या मुसलमान भी देश के नागरिक बन गए हैं। वर्ष 2014 से भारत सरकार ने औपचारिक रूप से उनकी समस्या का समाधान किया है तथा उनका उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित करने के लिए अथक प्रयास शुरू कर दिए हैं। देश में उनकी जनसंख्या 2011 में 150 मिलियन थी और अब यह 200 मिलियन तक पहुंच गई होगी। अंग्रेजों ने 53 देशों पर शासन किया, लेकिन केवल भारत की खानाबदोश जनजातियों के लिए उन्होंने “आपराधिक जनजाति अधिनियम 1871” पारित किया, जिसके तहत उन्हें अपराधी घोषित किया गया क्योंकि इन खानाबदोश जनजातियों ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम छेड़ा था।

घूमंतू जातियों का गौरवशाली इतिहास है , जो समय-समय पर सामने आ रहा है । धार्मिक दृष्टि से पूरे भारत में घूमंतू जातियों ने हिंदू धर्म की न केवल रक्षा की है वरन मूर्तियां और मंदिरों की स्थापना भी की है। विमुक्त ,घुमंतू और अर्धघुमंतू जनजातियों में देवी उपासना और नवरात्र पर्व का विशेष महत्व है।

इतिहास गवाह है कि महाराष्ट्र के धाराशिव जिले में स्थित तुलजापुर, वह स्थान है जहाँ छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी माँ तुलजा भवानी विराजमान हैं। वे आज भी महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के कई निवासियों की कुलदेवी के रूप में पूजनीय हैं। मध्य प्रदेश में भी खंडवा के पास तुलजा भवानी का मंदिर है। छत्रपति शिवाजी महाराज के निर्देशन में पिंडारियों ने मुगलों की खटिया खड़ी कर दी थी और तुलजा भवानी को अपनी कुलदेवी ही मानते थे। पिंडारियों ने बरतानिया सरकार के खिलाफ भी भारत की स्वाधीनता के लिए मरते दम तक संघर्ष किया था, जिसका इतिहास अतीत के गर्भ में है जो शीघ्र ही सामने आएगा।

छत्तीसगढ़ के रायपुर और मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के बंजारी माता का मंदिर पूरे भारत में प्रसिद्ध हैं। छत्तीसगढ़ के रायपुर का बंजारी माता का मंदिर पूरे भारत के बंजारों की कुलदेवी के मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है , जो मां बगलामुखी की प्रतिमूर्ति है। मंदिर परिसर में भगवान विष्णु, भगवान शिव (बंजारेश्वर महादेव), श्री राम, गणेश, हनुमान आदि के उप-मंदिर हैं। बंजारी माता का प्राकट्य बंजर भूमि से माना जाता है। बंजारी माता के मंदिर विभिन्न स्थानों पर पाए जाते हैं जहां वर्ष भर देवी की उपासना और नवरात्र का महापर्व बड़े उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है।

व्यापारिक दृष्टि से रेशम महापथ पर जब बंजारे व्यापार करने जाते थे , तब विदेश में भी बंजारी माता की स्थापना करते थे। 10वीं सदी के पहले से इनके पूजन एवं स्थापना होती चली आ रही थी, परंतु बाद में इस्लामी आक्रांताओं ने इन्हें विनष्ट कर दिया। बंजारी माता एक देश से दूसरे देश तक व्यापार करने वाले बंजारा समाज के ठीये और दिशा दिग्दर्शिका के रूप में स्थापित की जाती थीं। अधिकतर बंजारी माता की प्रतिमाओं और उनके मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर ही मिलेगा। वे सूर्य उपासक हुआ करते थे। जंगलों व रास्तों में भटकने वालों को दिशाओं का ज्ञान भी इन मंदिरों के माध्यम से उपलब्ध हो जाता था। मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले की चारों दिशाओं में माता बंजारी के दरबार हैं। गोसलपुर, मंडला रोड की घाटी, तेंदूखेड़ा की पहाड़ी, सिवनी के गणेशगंज की दुर्गम पहाड़ी पर इनके दरबार आज भी आस्था का केंद्र हैं।

महाकौशल क्षेत्र में दिवालों में मरही, बंजारी और भूलन माता कुल देवी, के रूप में पूजी जाती हैं।जय हो मरही माता, जय-जय बंजारी माई की…जय बोलो भूले की शक्ति, भूलन माई की जय हो, …कुछ ऐसे ही जयकारे नवरात्र के दिनों लोगों के घर में बने देवी दिवालों में प्रतिदिन सुबह शाम सुनाई दे जाते हैं। नवरात्रि में भले ही माता के नौ रूपों की व्याख्या व पूजन का विधान है, लेकिन श्रद्धालु अपने कुल देवी देवताओं का पूजन पहले करते हैं। ये परम्परा सदियों पुरानी है। इनका निर्वहन आज भी पूरी आस्था के साथ किया जा रहा है।

महाकौशल और बुंदेलखंड में पथिकों को राह दिखाने वाली देवी भूलन माता के नाम से प्रसिद्ध हैं। प्रमाण के लिए जबलपुर में भूलन देवी माता के दो स्थान हैं। पहला कठौंदा गांव के पीछे बना भूलन देवी दरबार, दूसरा संजीवनी नगर से लगे भूलन गांव की मढिय़ा में माता विराजमान हैं। यह प्रतिमाएं आठवीं और नवी शताब्दी से विद्यमान है ।भूलन गांव का दरबार दक्षिण दिशा की ओर जाने वालों का मार्ग तय करता था। कठौंदा वाला दरबार उत्तर दिशा को प्रदर्शित करता था। जंगलों में जानवरों का भय आदि होता था, ऐसे में यहां से गुजरने वालों के रात्रि विश्राम स्थल व साधना केंद्र भी होते थे। हर समाज में गोंडी परम्परा की पूजा विधि सम्मिलित हो गई है। कालांतर से जो लोग यहां निवास कर रहे हैं, उन सभी समाजों में भले ही पूजन विधि कितनी अलग हो, लेकिन थोड़ी बहुत गोंडी परंपरा की पूजा विधि सभी में शामिल है। बाना छेदन, खप्पर आरती, नींबू रस की धार, आटा की खीर ये सब जनजाति परम्पराओं में आते हैं।

मरही माता, खेरदाई और खप्पर वाली के उपासक सर्वाधिक

महाकौशल और बुंदेलखंड क्षेत्र में हैं। सदियों से इन क्षेत्रों में स्थानीय व लोक परंपरा में पूजे जाने वाले देवी- देवता जनसाधारण के कुल देवी -देवता हैं। यही कारण है कि यहां शास्त्रों में बताए गए देवी देवताओं की अपेक्षा इनके मंदिर व दरबार सबसे अधिक हैं। घरों के देवी दरबारों में मरही माता, खेरदाई, खप्पर वाली, वनदेवी के दरबार बने हैं। यहां मंत्रों के बजाय तंत्र पूजन होता है। इनकी पूजन विधि पूर्वजों द्वारा तय परम्परानुसार किया जाता है। कहीं जवारे बोने के साथ बाना भी पूजा जाता है। कहीं खप्पर आरती की परम्परा पीढिय़ों से चल रही है। यही तो एक भारत , समरस भारत और श्रेष्ठ भारत की पहचान है।

Topics: Navratri celebrationsMother Tulja BhavaniMahakali worshipBanjari Mata TempleNavratrichhattisgarh newsGoddess Worshipपाञ्चजन्य विशेषnomadic tribesNavratri 2025Denotified castes
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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