OTT छोड़िए, दिल्ली की 3,400 रामलीलाओं में देखिए रामायण लाइव, जानिए जेन-जी को कैसे कर रही हैं मंत्रमुग्ध
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OTT छोड़िए, दिल्ली की 3,400 रामलीलाओं में देखिए रामायण लाइव, जानिए जेन-जी को कैसे कर रही हैं मंत्रमुग्ध

दिल्ली, भारत की राजधानी, न केवल अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए जानी जाती है, बल्कि रामलीला जैसे सांस्कृतिक आयोजनों के लिए भी प्रसिद्ध है।

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु' — edited by Mahak Singh
Sep 22, 2025, 10:32 am IST
inभारत, दिल्ली
प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

दिल्ली, भारत की राजधानी, न केवल अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए जानी जाती है, बल्कि रामलीला जैसे सांस्कृतिक आयोजनों के लिए भी प्रसिद्ध है। सैकड़ों साल पुरानी इस परंपरा का आकर्षण आज भी बरकरार है। सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और आधुनिक मनोरंजन के तमाम विकल्पों के बावजूद, दिल्ली की रामलीलाएं जनरेशन-जी (जेन-जी) के बीच अपनी चमक बिखेर रही हैं। इस बार दिल्ली में छोटी-बड़ी कुल 3,400 रामलीलाओं का आयोजन हो रहा है, जो इस परंपरा की जीवंतता का प्रमाण है। नॉर्थ और वेस्ट दिल्ली के इलाकों में सबसे ज्यादा रामलीलाएं हो रही हैं, और शालीमार बाग, पीतमपुरा जैसी कॉलोनियों में बड़े पैमाने पर आयोजित होने वाली 6-8 लीलाएं हजारों लोगों को रोज आकर्षित कर रही हैं। दिल्ली की सबसे पुरानी रामलीला, जो आसफ अली रोड स्थित रामलीला मैदान में होती है, और दूसरी सबसे पुरानी रामलीला, जो अब चांदनी चौक के दंगल मैदान से लाल किले के माधव दास पार्क में स्थानांतरित हो चुकी है, इस परंपरा की नींव हैं।

रामलीलाः दिल्ली की सांस्कृतिक धड़कन

रामलीला, रामायण के कथानक पर आधारित एक नाटकीय प्रदर्शन है, जो भगवान राम के जीवन, उनके संघर्षों और धर्म की जीत को दर्शाता है। दिल्ली में रामलीला की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है, जो मुगलकाल से लेकर आज तक चली आ रही है। दिल्ली की रामलीलाएं केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकजुटता का प्रतीक हैं। यहाँ की रामलीलाएं स्थानीय समुदायों, कलाकारों और दर्शकों को एक मंच पर लाती हैं, जहाँ परंपरा और आधुनिकता का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

जानकारों के अनुसार, इस बार दिल्ली में 3,400 रामलीलाओं का आयोजन हो रहा है। इनमें से कुछ बड़े पैमाने पर होती हैं, तो कुछ मोहल्लों और कॉलोनियों में छोटे स्तर पर। दिल्ली की सबसे पुरानी रामलीला, जो आसफ अली रोड के रामलीला मैदान में आयोजित होती है, 100 साल से भी अधिक पुरानी है। यह रामलीला न केवल दिल्लीवासियों के लिए, बल्कि देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। दूसरी सबसे पुरानी रामलीला, जो पहले चांदनी चौक के दंगल मैदान में होती थी, अब कुछ दशकों से लाल किले के पास माधव दास पार्क में आयोजित की जाती है। इन दोनों रामलीलाओं का ऐतिहासिक महत्व है, और ये दिल्ली की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है।

नॉर्थ और वेस्ट दिल्लीः रामलीला का गढ़

दिल्ली में रामलीलाओं का वितरण भौगोलिक रूप से भी दिलचस्प है। नॉर्च और वेस्ट दिल्ली के इलाके रामलीलाओं के लिए सबसे ज्यादा मशहूर हैं। शालीमार बाग, पीतमपुरा, रोहिणी और आजादपुर जैसे इलाकों में बड़े स्तर पर 6-8 रामजीलाएं आयोजित होती हैं। इन जावोजनों में हजारों लोग रोज शामिल होते हैं। शालीमार बाग की रामलीला, उदाहरण के लिए, अपनी नष्यता और आधुनिक तकनीक के उपयोग के लिए जानी जाती है। यहाँ मंच सजा, साइटिंग और साउंड सिस्टम का इस्तेमाल हॉलीवुड स्टाइल के ड्रामे की तरह होता है, जो जेम-जी को खासतौर पर आकर्षित करता है।

वेस्ट दिल्ली के पीतमपुरा में जायोजित होने वाली रामलीला में ड्रोन कैमरों में भूटिंग और बड़े स्क्रीन पर लाइव प्रसारण जैसे आधुनिक ताव शामिल किए गए है। इसके बावजूद रामलीला की मूल भावना-रामायण की कहानी को जीवंत करना बिल्कुल वैसी ही है, जैसी सैकड़ों साल पहले भी। रामजीला आयोजकों के अनुसार उनकी कोशिश है कि दिल्ली की रामजीला को आधुनिक बनाया जाए ताकि युवा पीडी इसने जुह सके। लेकिन इसके साथ साथ यह सुनिधित करना भी उनके लिए बड़ी जिम्मेवारी है कि कहानी का मार और उसका नैतिक गदेन वही रहे।

बेन-बी और रामलीलाः एक नया जुड़ाव

आज के दौर में, जब जेन-जी के पास नेटफ्लिक्स, यूट्यूब और टिकटॉक जैसे अनगिनत मनोरंजन के साधन हैं. फिर भी रामलीलाओं का क्रेज कम नहीं हुआ है। इसका कारण है रामलीला का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व, जो इसे केवल एक धार्मिक आयोजन से कहीं ज्यादा बनाता है।

सोशल मीडिया ने भी रामलीलाओं को एक नया आयाम दिया है। कई आयोजक अब इंस्टाग्राम और फेसबुक पर लाइव स्ट्रीमिंग करते हैं, जिससे जेन-जी तक रामलीला की पहुंच और बड़ी है। शालीमार बाग की एक रामलीला समिति ने इंस्टाग्राम पेज पर लाइव प्रदर्शन शुरू किया, जिसे हर रात औसतन 5,000 लोग ऑनलाइन देखते हैं। युवा ऑनलाइन ज्यादा समय बिताते हैं। इसलिए रामलीला को उनके पास ले जाने की इस पहल को स्वागत योग्य कहा जाएगा। शालीमार बाग रामलीला समिति के पास अब ऐसे दर्शक भी हैं जो दिल्ली से बाहर रहते हैं. लेकिन उनकी रामलीला को ऑनलाइन देखते हैं।

परंपरा और आधुनिकता का संगम

दिल्ली की रामलीलाएं परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सेतु की तरह हैं। जहाँ एक तरफ पारंपरिक रामलीलाएं अपने मूल स्वरूप में आयोजित होती हैं, वहीं कई आयोजनों में आधुनिक तकनीक का उपयोग हो रहा है। लेजर शो, उही इफेक्ट्स और डिजिटल साउंड सिस्टम ने रामलीलाओं को और आकर्षक बनाया है। इसके बावजूद, रामलीला की आत्मा रामायण की कहानी और उसका नैतिक मंदेल-अछूती रही है।

50 साल से अधिक पुरानी रामलीलाओं की संख्गा भी दिल्ली में कम नहीं है। ये आयोजन स्थानीय समुदायों के लिए गर्व का विषय हैं। उदाहरण के लिए, नॉर्थ दिल्ली की एक रामलीला पिछले 60 साल से हर साल बिना रके जायोजित हो रही है। इससे वहां बच्चे-बच्चे को रामायण की कहानी पता है। रामलीला देखकर वे न केवल मनोरंजन पाते हैं. बरिक अपने संस्कारों में भी जुड़ते हैं।

रामलीला और सामाजिक एकजुटता

रामलीला केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं है। यह दिल्ली के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने का एक माध्यम भी है। रामातीला के आयोजन में स्थानीय व्यापारी, कलाकार, और स्वयंसेवक एकजुट होकर काम करते हैं। मेले, खाने-पीने के स्टॉल्स, और बच्चों के लिए मूले रामलीला को एक उत्सव का रूप देते हैं। यहाँ विभिन्न धमों और समुदायों के लोग एक साथ आते हैं. जिसने सामाजिक एकता को बढ़ावा मिलता है।

दिल्ली की रामलीलाएं सांस्कृतिक धरोहर का एक जीवंत उदाहरण है। 3,400 रामलीलाओं का आयोजन, नॉर्थ जौर वेस्ट दिल्ली में इनका खासा जोर, और सबसे पुरानी रामनीलाओं का ऐतिहासिक महत्व इस बात का सबूत है कि यह परंपरा कितनी गहरी जड़ों वाली है। जेन-जी का इस के प्रति उत्साह और सोशल मीडिया के जरिए इसका विस्तार दिखाता है कि रामलीला गमय के साथ बदल रही है, लेकिन इसका मूल स्वरूप और महत्व आज भी वही है। दिल्ली की रामलीलाएं न केवल रामायण की कहानी को जीवंत करती है. बल्कि समाज को जोड़ने बऔर संस्कृति को संरक्षित करने का एक अनूठा मंच भी प्रदान करती हैं।

Topics: Ramlila and Cultural HeritageरामलीलाRamlilaपाञ्चजन्य विशेषRamlila DelhiDelhi Ramlila 2025Delhi Ramlila CelebrationsRamlila and Gen-G
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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