पाञ्चजन्य ‘आधार इंफ्रा कॉन्फ्लुएंस 2025’ में ‘जल और कल’ सत्र में केंद्रीय जलशक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल से वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पुनेठा ने बात की, प्रस्तुत हैं उसके मुख्य अंश –

देश में जल के उचित वितरण, संचयन और नदियों के प्रबंधन की क्या स्थिति है?
हमारे देश में पानी की व्यवस्था और जल संचय की स्थिति पर विचार करना अत्यंत आवश्यक है। भारत में लगभग 4000 बीसीएम (बिलियन क्यूबिक मीटर) वर्षा होती है, जबकि हमारी वर्तमान आवश्यकता केवल 1120 बीसीएम की है। भविष्य में, जब 2047 तक विकसित भारत का सपना साकार होगा, तब भी हमारी अनुमानित आवश्यकता केवल 1180 बीसीएम ही रहेगी। देश में वर्तमान समय तक छोटे और बड़े मिलाकर करीब 6500 बांध बने हुए हैं। इन बांधों की क्षमता और नदियों-नालों में दिसंबर तक उपलब्ध पानी को मिलाकर कुल जल संचय क्षमता लगभग 750 बीसीएम ही है। यानी जल आवश्यकता और संचय क्षमता के बीच तकरीबन 450-500 बीसीएम का अंतर है।
इस बार बहुत बारिश हुई है। बहुत ज्यादा नुकसान भी हुआ है। इस दिशा में किस तरह का काम करने की योजना है ताकि नदी और बारिश के पानी का और बेहतर इस्तेमाल हो सके?
हमारे देश की अधिकांश नदियों पर पहले से ही बांध बने हुए हैं या निर्माणाधीन हैं, इसलिए नए बांध बनाने की संभावना सीमित है। एक बड़े बांध के निर्माण में कम से कम 25 वर्ष का समय लगता है और इसमें 25,000 करोड़ रुपये से अधिक का खर्च आता है। किसानों की जमीन लेनी पड़ती है, जिसका विरोध होता है। पर्यावरणविद भी ऐसी परियोजनाओं के खिलाफ आवाज उठाते हैं। इन कारणों से परियोजनाओं में विलंब होता है और लागत बढ़ जाती है। इन सभी कठिनाइयों को देखते हुए प्रश्न उठता है कि क्या हम जल संकट के समाधान के लिए 25 वर्ष तक प्रतीक्षा कर सकते हैं?
देश में पर्याप्त वर्षा के बावजूद जल संचय व्यवस्था की कमी के कारण पानी की किल्लत बनी रहती है। इसी संदर्भ में 6 सितंबर 2024 को माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने सूरत के कार्यक्रम में कहा था कि जल संचय को जन भागीदारी से जन आंदोलन में परिवर्तित करना होगा।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि कर्मभूमि से मातृभूमि के लिए जल संचय में सहयोग करना चाहिए। जब प्रधानमंत्री कुछ कहते हैं, तो लोग उसे हृदय से स्वीकार करते हैं और उसी भावना से कार्य भी करते हैं। मुझे प्रसन्नता है कि पूरे देश के 33 राज्यों और 611 जिलों में केवल 8 महीने के भीतर छोटी-बड़ी मिलाकर लगभग 32 लाख जल संरचनाएं तैयार की गईं। विशेष बात यह है कि इस कार्य में मंत्रालय का एक भी रुपया व्यय नहीं हुआ, यह सब पूरी तरह से जनसहयोग से संभव हुआ।
देशभर में जल संरचना निर्माण में पहला स्थान-तेलंगाना, दूसरा स्थान-छत्तीसगढ़, तीसरा स्थान राजस्थान, चाैथा स्थान-मध्य प्रदेश और पांचवां स्थान-गुजरात।
गुजरात का मॉडल इतना लोकप्रिय हुआ कि अन्य राज्य आगे निकल गए और गुजरात पीछे रह गया। लेकिन 31 मई के बाद से शुरू हुई JSJB. 2 योजना में अब गुजरात फिर से आगे बढ़ रहा है। आज पूरे देश में लोग सहयोग कर अपने घर, गांव और खेतों का पानी जमीन में रोकने और एकत्रित करने के लिए संरचनाएं बना रहे हैं।
अब तक 11 अलग-अलग डिजाइन स्वीकृत हो चुके हैं। इसमें न तो किसी से पैसा लिया जाता है और न ही किसी ठेकेदार का नाम सुझाया जाता है। न ही किसी विशेष संस्था की सिफारिश की जाती है। लोग स्वयं डिजाइन चुनते हैं। ठेकेदार तय करते हैं और मूल्य भी वही निश्चित करते हैं। सत्यापन की अनोखी प्रणाली, बनाई गई जिसके माध्यम से सभी संरचनाएं पूरी तरह सत्यापित हैं। किसी भी संरचना या बोरिंग कार्य से स्थान की काम से पहले और बाद की तस्वीर ली जाती है। कार्य की प्रगति की वीडियो अपलोड होता है। संरचना बनाने वाले व्यक्ति का नाम और विस्तृत जानकारी पोर्टल पर दर्ज होती है। लोकेशन डेटा के साथ सारी जानकारी कलेक्टर ऑफिस द्वारा सत्यापित की जाती है। केवल कलेक्टर को पोर्टल पर अंतिम अपलोड का एक्सेस दिया गया है, जिससे पारदर्शिता पूरी तरह बनी रहती है। पिछले आठ महीनों में हमने एक बहुत बड़ा काम पूरा किया है।
एक और विषय है नदियों की सफाई, जल शुद्धिकरण। देश में तकरीबन 30 से 40 प्रतिशत पानी संशोधित होता है। बाकी का सब नदियों में जाता है। क्या आपको लगता है कि इस दिशा में और कुछ लक्ष्य आधारित बेहतर प्रयास किया जा सकता है?
जल संरक्षण अभियान अब तक पूरे देश के 33 राज्यों में सफलतापूर्वक चलाया गया है। गांव का पानी अक्सर बहकर पहले खड्डों में जाता है, खड्डे से नालों में, वहां से नदियों में और फिर दरियाओं में चला जाता है। हमारी सोच सरल है- पानी को बेकार बहने से रोकना और गांव व खेत में ही संरक्षित करना है।
इसके लिए हम तकनीकी रूप से आसान उपाय अपना रहे हैं-
- जहां पानी खड्डे में जमा होता है, वहीं 100 फीट गहराई तक बोर कर पाइप डाल दिया जाता है।
- उसके पास एक छोटी कुंडी बनाई जाती है।
परिणामस्वरूप पानी बाहर जाने के बजाय वहीं जमीन में उतर जाता है, जिससे गांव के कुंओं और बोरवेल में जलस्तर बढ़ता है और पानी की गुणवत्ता सुधरती है।
खेती के लिए भी हम छोटी-छोटी संरचनाएं बना रहे हैं। जैसे 4 गुणा 4 या 4 गुणा 6 फीट के गड्ढे, जिनमें ग्रेवल डालकर पानी को जमीन में संचित किया जाता है। केवल एक बारिश में, एक माैसम में, एक बीघे जमीन से लगभग 3 से 4 लाख लीटर पानी जमीन में रिसता है। अगर किसी किसान के पास 5 या 10 बीघा जमीन है और वह ऐसा उपाय करता है, तो उसके खेत में लगभग 30 से 40 लाख लीटर पानी जमीन में इकट्ठा हो सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी जी का मानना है कि गांव का पानी गांव में और खेत का पानी खेत में ही रहे। यह तरीका न केवल सस्ता और प्रभावी है, बल्कि इससे पानी की गुणवत्ता भी बेहतर होती है। इसके विपरीत, बांध और नहर में पानी को दूर तक ले जाने में ही 30-40 प्रतिशत तक का नुकसान हो जाता है। इसलिए गांव और खेत स्तर पर ही पानी को रोकना अधिक लाभकारी है।

जल संचयन के लिए आपकी की क्या नई योजनाएं हैं?
हम सबको यह समझना होगा कि पानी का उपयोग केवल हमारा अधिकार नहीं है, बल्कि यह एक जिम्मेदारी भी है।
आज गांव में प्रतिदिन लगभग प्रति व्यक्ति 55 लीटर और प्रति घर करीब 300 लीटर पानी खर्च होता है। इस प्रकार एक घर साल भर में लगभग 1-1.5 लाख लीटर पानी उपयोग करता है। लोग इसे स्वाभाविक रूप से अपना अधिकार मानते हैं। लेकिन यदि हमने केवल उपयोग को ही अधिकार समझ लिया और संचय की जिम्मेदारी पूरी नहीं की, तो हम आने वाली पीढ़ियों का अधिकार छीन लेंगे। इसीलिए हम सबको यह संकल्प लेना होगा कि जितना पानी हम उपयोग करते हैं, उतना ही हमें भूमिगत जल संचय से धरती को लौटाना भी है।
यदि हम आज इसे जमीन में संचित करेंगें, तो कल जब चाहे तब हमें अच्छी गुणवत्ता का जल मिलेगा और भविष्य की पीढ़ियां भी पानी की कमी से जूझेंगी नहीं। यही कारण है कि जल संचय को हमें केवल सरकारी योजना नहीं मानना चाहिए, बल्कि इसे जनभागीदारी से एक जन आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाना चाहिए। यह अपने आप में एक बहुत बड़ा कार्यक्रम है, जिसे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की प्रेरणा और मार्गदर्शन से पूरे देश में गति मिल रही।
यमुना की स्वच्छता के लिए चलने वाले अभियान के संदर्भ में आप क्या प्रयास कर रहे हैं?
यमुना नदी पहले तो दिखाई ही नहीं देती थी, केवल हरे रंग की जलकुंभियां ही नजर आती थीं। इस समस्या के समाधान के लिए एआई-बेस्ड बोट लगाई और सफाई अभियान शुरू किया। केवल 45 दिनों के भीतर यमुना से वे जलकुंभी पूरी तरह हटा दी गई है। अब यह नदी अपने वास्तविक स्वरूप में दिखने लगी है, तो स्वाभाविक है कि अगला कदम इसकी गहराई बढ़ाना और डिसिल्टिंग (गाद निकालना) करना होगा। इस दिशा में राज्य सरकार की ओर से भी काम हो रहा है और हमारा मंत्रालय भी पूरी सहायता प्रदान कर रहा है।
इस विषय में प्रधानमंत्री श्री मोदी ने स्वयं उच्च-स्तरीय बैठक की है। साथ ही श्री अमित शाह जी भी समय-समय पर हमारी बैठकों में मार्गदर्शन देते रहते हैं। लगभग हर महीने-दो महीने पर समीक्षा की जाती है और यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जाती है कि यमुना की सफाई का कार्य शीघ्र पूरा हो। हमारा उद्देश्य एक ही है-यमुना को जल्दी से जल्दी प्रदूषण से मुक्त किया जाए। इसके लिए सरकार और समाज दोनों की संयुक्त भागीदारी अनिवार्य है।
बांध और नहर व्यवस्था में पानी को दूर तक ले जाने में काफी नुकसान होता है। ऐसे में गांव और खेत के स्तर पर भूमिगत जल संरक्षण के जन भागीदारी के द्वारा क्या उपाय किया जा रहा है?
जल संचय के संदर्भ में उल्लेखनीय पहल यह है कि गांधीनगर स्थित बायोसेक कंपनी (सरकारी संस्था) ने पूरे देश में डार्क जोन और डार्क ब्लॉक्स की पहचान की गई है। देश के लगभग 750 जिलों में से करीब 150 जिले ऐसे हैं, जो डार्क जोन में आते हैं। इन स्थानों पर पानी 1000-1200 फुट गहराई पर मिलता है और वह भी पीने लायक नहीं होता। ऐसे क्षेत्रों में नई तकनीकों का उपयोग कर समाधान खोजे गए। इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण गुजरात के बनासकांठा जिले में देखने को मिला, जो देश का सबसे बड़ा जिला है और जहां पानी बहुत गहराई पर मिलता था।
प्रधानमंत्री द्वारा 2019 में शुरू किए गए “कैच द रेन” (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) अभियान का लाभ यहां किसानों ने उठाया। एक जल संरचना बनाने की लागत लगभग 5000 रुपये आई, जिसमें 2500 रुपये किसानों ने और 2500 रुपये साबर डेयरी ने दिए। इस तरह 30000 संरचनाएं बनीं, जिससे वहां के कुओं और बोरवेल में जल स्तर तेजी से ऊपर आया। पानी की गुणवत्ता भी सुधरी और वह पीने योग्य हो गया। अब गांव के लोग अगले मानसून से पहले 70,000 अतिरिक्त संरचना बनाने की तैयारी कर रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि जन जागरूकता और तकनीक के सही उपयोग से कम लागत में बड़े परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।
सरकार का मुख्य जोर इस बात पर है कि पानी खराब न हो, व्यर्थ न जाए और उसका अधिकतम उपयोग सुनिश्चित किया जाए। सूरत में जो राजस्थान के व्यापारी रहते है उन्होंने अपने पैसे से राजस्थान में 1600 संरचनाएं खड़ी कर दी हैं। वहीं मध्य प्रदेश में सूरत के व्यापारियों ने जल संरक्षण के लिए 35,000 संरचनाएं बनाई हैं।

















