पिछले दिनों इस्राएल ने कतर की राजधानी दोहा में दबे—छुपे इस्लामी जिहादी संगठन हमास के ‘वार्ताकारों’ को निशाना बनाकर मिसाइलें बरसाई थीं। इसे लेकर अरब देशों और दूसरे इस्लामी देशों ने दोहा में इस्राएल विरोधी आपात बैठक करके गठजोड़ बनाने की बात की। इसे लेकर पाकिस्तान के नेता अगर झाड़ पर चढ़े बैठे हैं और परमाणु बम जैसी धमकियां उछालने लगे हैं। लेकिन इस्राएल को इससे रत्ती भर फर्क नहीं पड़ा और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कुछ ही घंटे बाद बयान दिया कि हमास के हत्यारे जिहादियों को वे छोड़ेंगे नहीं, और जब जहां जरूरत होगी, हमले करेंगे। इधर उस घटना की तपिश भी हल्की नहीं पड़ी थी कि ताजा खबरें बता रही हैं कि इस्राएल ने तुर्किए के दुश्मन देश साइप्रस में अपना आधुनिकतम एयर डिफेंस सिस्टम ‘बराक एमएक्स’ तैनात कर दिया है। इस नए मोड़ से पश्चिम एशिया में एक नई राजनीतिक और सैन्य सरगर्मी पैदा हुई है। इस्राएल के इस कदम को तुर्किए के लिए भी एक सीधा रणनीतिक संकेत माना जा रहा है। ध्यान रहे, तुर्किए और इस्राएल के बीच रिश्ते भी खटास भरे ही चल रहे हैं। ऐसे में साइप्रस जैसे संवेदनशील भू-राजनीतिक क्षेत्र में इस्राएल की सैन्य सक्रियता बढ़ने से कई सवाल खड़े हुए हैं।
उल्लेखनीय है कि साइप्रस एक द्वीपीय देश है। पूर्वी भूमध्य सागर में स्थित इस देश के लंबे समय से तुर्किए के साथ संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं। 1974 में तुर्किए द्वारा उत्तरी साइप्रस पर कब्ज़ा करने के बाद से यह द्वीप दो भागों में बंट गया था–एक ग्रीक साइप्रस और दूसरा तुर्किए समर्थित उत्तरी साइप्रस। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी ग्रीक साइप्रस को ही मान्यता देती है, जबकि तुर्किए एकमात्र देश है जो उत्तरी साइप्रस को ‘स्वतंत्र राष्ट्र’ मानता है।

इन परिस्थितियों में इस्राएल द्वारा ग्रीक साइप्रस की भूमि पर ‘बराक एमएक्स’ जैसे अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम की तैनाती करना केवल रक्षात्मक कदम तो नहीं ही कहा जा सकता। बेशक, यह एक साफ इशारा है कि इस्राएल अब अपनी सुरक्षा रणनीति को तुर्किए की बढ़ती आक्रामकता और इस्लामी जगत में बढ़ती अपनी भूमिका के संदर्भ में नए सिरे से सोच रहा है।
बराक एमएक्स इस्राएल का ऐसा अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम है, जो शॉर्ट, मीडियम और लॉन्ग रेंज में दुश्मन के हवाई हमलों को रोक सकता है। इसकी तैनाती किसी भी देश के लिए अभेद्य सुरक्षा कवच जैसी मानी जा सकती है, लेकिन अगर इसे किसी ऐसी जगह पर लगाया जाए जो किसी दुश्मन देश के नजदीक हो, तो यह एक रणनीतिक दबाव का संकेत कहा जा सकता है।
इस्राएल का यह कदम न केवल तुर्किए के खिलाफ उसकी संभावित युद्धक तैयारी को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि वह क्षेत्रीय साझेदारों जैसे ग्रीस, साइप्रस, मिस्र और यूएई के साथ मिलकर तुर्किए की भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की हवा निकालना चाहता है। एर्दोगन खुद को इस्लामी जगत के खलीफा के तौर पर स्थापित करने को हमेशा आतुर रहे हैं।
2000 के दशक की शुरुआत में इस्राएल और तुर्किए के बीच मजबूत सैन्य और व्यापारिक संबंध थे। लेकिन 2010 में गाजा के लिए तुर्किए के सहायता मिशन ‘मावी मर्मारा’ पर इस्राएली हमले के बाद दोनों देशों के रिश्ते पटरी से उतर गए थे। इसके बाद से रिश्तों में कभी-कभार कूटनीतिक सुधार तो दिखा, लेकिन वह लंबे समय तक टिक नहीं पाया।
हाल ही में गाजा युद्ध के दौरान तुर्किए के राष्ट्रपति रेसिप तैयप एर्दोगन ने इस्राएल पर ‘युद्ध अपराध’ के गंभीर आरोप लगाए और फिलिस्तीन के पक्ष में खुलकर बयानबाजी की। वहीं इस्राएल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने तुर्किए को ‘दोहरा मापदंड अपनाने वाला देश’ बताया। इन बयानों से बीते कुछ समय से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध और अधिक बिगड़ते दिखे हैं।
आज तुर्किए की सबसे बड़ी चिंता यही है कि साइप्रस की ज़मीन अब इस्राएल और उसके पश्चिमी साझेदारों के लिए तुर्किए के खिलाफ एक सैन्य अड्डा बन सकती है। यदि बराक एमएक्स जैसे सिस्टम की तैनाती को नाटो या अमेरिका के सहयोग से हुई माना जाए, तो यह साफ संकेत है कि तुर्किए को घेरने की एक रणनीति पर काम चल रहा है।
इसके अलावा, भूमध्य सागर में गैस के भंडार और समुद्री सीमा विवादों को लेकर तुर्किए पहले ही ग्रीस, साइप्रस और इस्राएल से नाराज़ है। ऐसे में इस्राएल की सैन्य उपस्थिति तुर्किए की ऊर्जा रणनीति और समुद्री दावों को सीधी चुनौती जैसी बन जाएगी।
इस्राएल और तुर्किए के बीच इन नए घटनाक्रमों से यह तो साफ है कि दोनों देश एक बार फिर टकराव के रास्ते पर बढ़ रहे हैं। साइप्रस में बराक एमएक्स की तैनाती केवल सैन्य कदम नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा लगती है, जो तुर्किए के प्रभाव को सीमित करने के उद्देश्य से बनाई गई है।
हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि आने वाले वक्त में इस्राएल तुर्किए पर सीधा हमला बोलेगा, लेकिन यह तो तय है कि दोनों देशों के बीच विश्वास की दीवार लगभग टूट चुकी है। पश्चिम एशिया और भूमध्यसागर में बदलती दोस्तियों और बढ़ते सैन्य गठबंधनों के बीच यह टकराव आने वाले समय में और भी गंभीर रूप ले सकता है।
और अगर यह टकराव खुली जंग में बदलता है, तो इसका असर सिर्फ इस्राएल और तुर्किए तक सीमित न रहकर पूरे मध्य-पूर्व और यूरोप तक को चपेट में ले सकता है।

















