ईरान-अमेरिका युद्ध को रोकने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से ‘शांतिदूत का तमगाा’ पाने को ललक रहे जिन्ना के देश के प्रधानमंत्री शाहनवाज और ‘फील्ड मार्शल’ असीम मुनीर अपने देश में लोगों के मौलिक अधिकारों को किस बेरहमी से कुचल रहे हैं, यह पूरी दुनिया जानती है। अधिक्रांत जम्मू—कश्मीर तो आज उबाल पर है ही, बलूचिस्तान दशकों से इस्लामाबाद की हुकूमत के जुल्म सहता आ रहा है। वह तड़प रहा है आजादी के लिए। वह नहीं चाहता उस पर बेरहम हुकूमत अपना राज चलाए, वहां के संसाधनों को बेच अपने खजाने भरे लेकिन वहां के लोगों को उनकी बुनियादी जरूरतों तक के लिए तड़पा दे। जिन्ना के देश के भ्रष्ट नेताओं ने बलूचिस्तान की हर उस आवाज को कुचला है जिसने इस्लामाबाद के अत्याचारों के खिलाफ कुछ बताने की कोशिश की है। फौज ने उन लोगों को ‘अगवा’ किया है जो साहस के साथ खड़े होने को तैयार थे। डॉ. महरंग बलोच को तो हाल ही में उम्रकैद की सजा दी गई है, लेकिन ऐसे हजारों लोगों का अता—पता नहीं है जिन्हें पाकिस्तानी हुकूमत ने ‘गिरफ्तार’ करके लापता कर दिया है।
सम्मी बलोच का दर्द भी यही है। 2009 में उसके अब्बा डॉ. दीन मोहम्मद बलोच को जिन्ना के देश की पुलिस ‘गिरफ्तार’ करके ले गई थी, लेकिन आज तक उनका कोई अ

ता—पता सम्मी को नहीं चला है। उसकी इस दर्दभरी कहानी को न्यूयार्क टाइम्स ने छापा है और कोशिश की है कि छल—छद्म में माहिर जिन्ना का देश और उसके नेता कोई ‘शांति’ के रखवाले नहीं हैं बल्कि वे तो सिर से पैर तक अत्याचारी हैं, जो अपने नागरिकों तक को नहीं बख्शते।
बलूचिस्तानी सम्मी दीन बलोच पिता डॉ. दीन मोहम्मद बलोच को जबरन अगवा किए जाने की घटना याद करते हुए बताती हैं कि 28 जून 2009 की सुबह उनके अब्बा को खुज्दार के एक अस्पताल से उठा ले जाया गया था जहां वे रात की ड्यूटी कर रहे थे। सम्मी के परिवार को उनके ‘गिरफ्तार’ होने की खबर लगी। पता चला कि इंटेलिजेंस एजेंसियों ने उन्हें पकड़ा है। उस समय सम्मी की उम्र सिर्फ 10 साल थी। तब से उनके अब्बू का कोई अता—पता नहीं है। अब्बा के न होने से सम्मी और परिवार को जो दिक्कतें झेलनी पड़ीं, उन सबको विस्तार से सम्मी ने लिखा है। रोजमर्रा जिन्दगी हिल गई थी तब, स्कूल में दाखिले, पहचान पत्र, पासपोर्ट से लेकर बैंक खाते, मोबाइल और घरेलू कागजात तक बनवाना मुश्किल हो गया था।
अब्बा का ‘गायब’ हो जाना
डॉ. मोहम्मद के ‘गायब’ होने के बाद परिवार, विशेषकर सम्मी की अम्मी पर सामाजिक और मजहबी दृष्टि से तमाम तरह के दबाव पड़े। अम्मी तो सार्वजनिक जीवन से लगभग दूर ही हो गईं। परिवार का कानूनी और सामाजिक दर्जा डगमगा गया। सम्मी, उनकी बहन और अम्मी, तीनों अनजान कल से भयभीत रहने लगीं। इससे दैनिक जीवन चलना भारी पड़ गया, आत्मसम्मान तो खैर जाता ही रहा।
शुरू हुआ संघर्ष
सम्मी ने अपने पिता की वापसी की मांग के लिए लगातार शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठाई है। रैलियां, धरने, प्रेस क्लब के बाहर प्रदर्शन और 2013–14 में क्वेटा से इस्लामाबाद तक लगभग 3,000 किलोमीटर की पैदल रैली में वह शामिल रही थी। एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के नाते सम्मी अगवा किए बलूचों की ओर से इस्लामाबाद की बेरहम सरकार के दमन के खिलाफ संघर्ष करती रही हैं। इस संघर्ष के कारण उन्हें भी कई बार प्रताड़ित, गिरफ्तार और आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत पकड़ा जा चुका है। मार्च 2025 में कराची में एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के दौरान उन्हें हिरासत में लिया गया था। उनका नाम काली सूची में डाला गया था।
हजारों हो चुके हैं अगवा
सम्मी का कहना है कि बलूचिस्तान में साल 2000 के बाद से हजारों लोग अगवा किए जा चुके हैं, जिनमें छात्र, राजनीतिक कार्यकर्ता और आम नागरिक शामिल हैं। कुछ के तो क्षत—विक्षत शव मिले थे, उन पर यातना के साफ निशान थे। बीते दशकों से आज तक अनेक लोग ‘लापता’ हैं। जिन्ना के देश में साल 2011 में ‘जबरन अगवा’ किए लोगों के लिए एक आयोग बनाया गया था—लेकिन ओछी राजनीति के चलते उस पर आगे कुछ नहीं हुआ। कई बार कहा गया कि ‘कोई गायब नहीं हुआ है’, जबकि परिवारों की पीड़ा और साक्ष्य तो सबके सामने हैं!
अंतरराष्ट्रीय छवि बनाम घरेलू वास्तविकता
सम्मी लिखती हैं कि पाकिस्तान अब वैश्विक स्तर पर खुद को ‘शांतिदूत’ दिखाने की कोशिश कर रहा है। वह खासकर अमेरिका और ईरान के बीच वार्ताओं में अपनी भूमिका को लेकर अपनी पींठ खुद थपक रहा है। लेकिन असल में तो यही नेता अपने देश के लोगों के साथ क्या बर्ताव कर रहे हैं, दुनिया को वह देखना चाहिए।
बलूची नागरिक सम्मी का कहना है कि वैश्विक स्तर पर अगर जिन्ना के बेरहम देश की छवि ‘शांतिदूत’ की बनी तो उसके पीछे वह मानवाधिकारों के उल्लंघन को ढक लेगा। वह कहती हैं कि पाकिस्तान के नेता विदेशों में ‘अपनी मध्यस्थता’ की ‘प्रशंसा’ के बीच अपने देश में चल रहे मानवाधिकार आंदोलन दबा रहे हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को जेल में डाला जा रहा है, और परिवारों की पीड़ा को नजरअंदाज किया जा रहा है।

कानूनी और प्रशासनिक बाधाएं
सम्मी और उसके जैसे कई अन्य परिवारों के नाम ‘चौथी अनुसूची’ जैसी घरेलू सुरक्षा सूचियों में डाल दिए गए हैं, जिससे उनकी यात्राओं पर प्रतिबंध, बैंकिंग और मोबाइल सेवाओं तक पहुंच में कठिनाई का सामना करने को बाध्य हैं। साल 2025 में आतंक-विरोधी कानून में संशोधन जैसे कदमों ने सरकार के ही अधिकारों को और मजबूती दे दी थी, जिसके तहत बिना शिकायत के किसी को भी लंबी हिरासत में रखा जा सकता है।
याद रखने की भी मनाही
सम्मी आहत होकर लिखती हैं कि आज 17 साल बाद भी उन्हें अपने अब्बा की फोटो लेकर सार्वजनिक रूप से खड़े होने तक की स्वतंत्रता नहीं दी गई है। पुलिस नहीं चाहती कि उस घटना को सबके सामने रखा जाए। वे उस याद को भी मिटा देना चाहते हैं। यह दोहरी क्रूरता नहीं तो क्या है? पहले किसी के जीवन को छीन लेना और फिर उसकी याद में दो आंसू तक बहाने से रोकना, क्या यह इंसानियत है?
न्याय की अपील
आज सम्मी बस इतना चाहती हैं कि उन्हें अपने पिता का पता दिया जाए, न्याय दिया जाए, उनके और उनके जैस अन्य पीड़ित परिवारों को मान्यता व सम्मान दिया जाए जो वर्षों से अपने प्रियजन की तलाश में हैं। वह चेतावनी देती हैं कि दुनिया में जिन्ना के देश की तारीफें हुईं तो उसके घरेलू उत्पीड़न पर्दे के पीछे छिपे रहेंगे, ऐसा न होने पाए। एक राष्ट्र को इस बात से भी परखा जाना चाहिए कि वह अपने नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है!
सम्मी का संघर्ष जारी है। उसके लिए मुश्किल सिर्फ यह साबित करना ही नहीं है कि उनके साथ अन्याय हुआ है, बल्कि मुश्किल अपनों की याद और दर्द को जिलाए रखना भी है। वह दुनिया से अपील करती हैं कि पाकिस्तान की बाहरी तौर पर ‘शान्तिदूत’ दिखने की कोशिश को पहचानें और उसके पीछे छुपे बर्बर चेहरे को पहचानें। जिन्ना के देश के मानवाधिकार उल्लंघनों को नजरअंदाज न किया जाए। दुनिया को बताया जाए कि कैसे वे अपने ही नागरिकों के साथ अत्याचार और अमानवीय व्यवहार कर रहा है।
















