श्रीनगर की ऐतिहासिक दरगाह हजरतबल में गत दिनों जिहादी मानसिकता का जिस प्रकार का घिनौना प्रदर्शन किया गया। वह हर भारतीय के लिए गहन चिंता और पीड़ा का विषय है। कट्टरपंथियों ने अशोक स्तम्भ के लिए गए, राष्ट्रीय प्रतीक को तोड़ दिया। यह केवल पत्थर या धातु पर बने प्रतीक का अपमान नहीं था, बल्कि संविधान, राष्ट्र की एकता और हमारे साझा गौरव पर सीधा प्रहार था। ऐसे कृत्य को उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह मानसिकता न तो संविधान में विश्वास रखती है, न कानून में और न ही भारत की बहुलतावादी परंपरा में। यह वही सोच है, जिसने अफगानिस्तान के बामियान में बुद्ध की प्रतिमाओं को तोपों से उड़ा दिया था।
जान-बूझकर किया गया विवाद

वरिष्ठ अधिवक्ता
वह घटना यहीं तक सीमित नहीं रही। अगले ही दिन अनंतनाग जिले की खिरम दरगाह में एक फुटब्रिज का उद्घाटन किया गया। वहां स्थापित शिलापट्ट पर केवल जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड का ‘लोगो’ था, अशोक का चिन्ह नहीं। उसे देख पीडीपी नेता इल्तिजा मुफ्ती ने आरोप लगाया कि मुसलमानों को उकसाने की नीयत से ही हजरतबल दरगाह के शिलापट्ट पर राष्ट्रीय प्रतीक को अंकित किया गया था। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह उकसावा उस समय हुआ जब शिलापट्ट लगाया गया या तब जब अशोक का प्रतीक तोड़ दिया गया?
शिलापट्ट पर राष्ट्रीय प्रतीक को अंकित करना कोई असामान्य कार्य नहीं है, यह देशभर में स्थापित प्रशासनिक परंपरा का हिस्सा है। यह प्रतीक हर सरकारी भवन, स्मारक और सार्वजनिक स्थल पर दिखाई देता है। यदि यह हजरतबल दरगाह में अंकित था तो उसमें विवाद की कोई वजह नहीं थी। विवाद अपराध तोड़फोड़ करने वालों ने पैदा किया।
अशोक चिन्ह महज सरकारी लोगो नहीं, बल्कि यह उस महान सम्राट अशोक की धरोहर है जिसने हिंसा का त्याग कर धर्म, न्याय और शांति का मार्ग अपनाया। इस चिन्ह पर अंकित “सत्यमेव जयते” हमारे गणराज्य का मूल मंत्र है। जो लोग इस प्रतीक को मिटाना चाहते हैं, वे दरअसल सत्य और न्याय की भावना को मिटाना चाहते हैं, लेकिन यह असंभव है।
समस्या है कट्टरपंथी मानसिकता
हजरतबल घटना के बाद यह तर्क भी सामने आया कि मुसलमानों को जान-बूझकर उकसाया गया। लेकिन यह तर्क खोखला है। जब कोई भारतीय मुसलमान हज यात्रा पर जाता है तो उसे पासपोर्ट की आवश्यकता होती है और पासपोर्ट के प्रथम पृष्ठ पर अशोक का चिन्ह अंकित होता है। क्या इसका अर्थ यह है कि हज यात्रा को बहिष्कृत कर दिया जाए? क्या मुसलमान पासपोर्ट का उपयोग न करें? वस्तुतः प्रतीक से समस्या नहीं है, समस्या उस मानसिकता से है जो हर जगह टकराव खोजती है और अपने स्वार्थ के लिए समुदाय को भ्रमित
करती है।
भारत का संविधान हमें अधिकार देता है, लेकिन वही संविधान प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य भी निर्धारित करता है कि वह राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करे। अनुच्छेद 51(ए) स्पष्ट रूप से कहता है कि नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य है कि वह संविधान, उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे। हजरतबल की घटना केवल एक शिलापट्ट की तोड़फोड़ नहीं, बल्कि संविधान के इस मूल कर्तव्य की अवहेलना थी।
राष्ट्र है तो मजहब सुरक्षित
मुस्लिम समाज पर इसकी विशेष जिम्मेदारी है कि वह इस घटना की भर्त्सना करे और साफ संदेश दे कि दरगाहें और मस्जिदें राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का अड्डा नहीं बनने दी जा सकतीं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अशफाक उल्ला खान से लेकर मौलाना आजाद तक अनगिनत नेताओं और शहीदों ने तिरंगे और राष्ट्र प्रतीकों की रक्षा के लिए अपना जीवन न्योछावर किया है। आज देशभक्त मुस्लिम यदि अशोक के चिन्ह के अपमान पर चुप रहेंगे तो यह उनकी विरासत के साथ अन्याय होगा। राष्ट्रवाद और मजहब को विरोधी ध्रुवों पर रखने की कोशिश करने वाले दरअसल दोनों के साथ विश्वासघात कर रहे हैं। मजहब तभी सुरक्षित है जब राष्ट्र सुरक्षित है।
राष्ट्र की एकता और अखंडता उसके प्रतीकों के सम्मान से ही कायम रहती है। जब पासपोर्ट पर अंकित प्रतीक से किसी को समस्या नहीं है, तब दरगाह के शिलापट्ट पर अंकित प्रतीक से समस्या क्यों हुई? इसका सीधा उत्तर है-समस्या उन लोगों की वजह से है जो समुदाय को भड़काकर अपनी राजनीतिक जमीन तलाशना चाहते हैं।
राष्ट्र के प्रतीकों पर गर्व करना और उनका सम्मान करना केवल सरकार या किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि हर भारतीय का कर्तव्य है। जो लोग इन्हें अपमानित करते हैं, वे न केवल कानून के अपराधी हैं बल्कि राष्ट्र की आत्मा को आहत करने वाले भी हैं। ऐसे लोगों के लिए कानून को कठोर से कठोर दंड सुनिश्चित करना चाहिए।
हजरतबल की घटना ने हमें यह सोचने पर मजबूर किया है कि कहीं हम अपनी साझा राष्ट्रीय चेतना को राजनीति और नफरत की आग में तो नहीं झोंक रहे। भारत की आत्मा कभी टूटी नहीं और कभी टूटेगी भी नहीं, इसे बार-बार प्रमाणित करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
















