क्या है POSH एक्ट? क्यों सुप्रीम कोर्ट ने दिया 'भानुमति के पिटारे' का उदाहरण
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क्या है POSH एक्ट? क्यों सुप्रीम कोर्ट ने दिया ‘भानुमति के पिटारे’ का उदाहरण

सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों को POSH एक्ट के तहत लाने की याचिका खारिज की। CJI बीआर गवई ने कहा, यह 'भानुमति का पिटारा' खोल देगा और दल ब्लैकमेल का हथियार बन सकते हैं।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह — edited by कुलदीप सिंह
Sep 16, 2025, 07:27 am IST
inभारत
supreme court

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में राजनीतिक दलों को कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न रोकथाम कानून, यानी POSH एक्ट के तहत लाने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। यह मामला सोमवार को सुना गया, जहां चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) जस्टिस बीआर गवई की अगुवाई वाली बेंच ने साफ कहा कि ऐसा करना ‘भानुमति का पिटारा’ खोलने जैसा होगा।

बेंच में जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस अतुल एस चंदूरकर भी शामिल थे। याचिका में कहा गया था कि राजनीतिक दल भी एक संगठित इकाई हैं, जहां महिलाएं काम करती हैं, इसलिए उन्हें POSH एक्ट के दायरे में लाना चाहिए। लेकिन कोर्ट ने इसे नामंजूर करते हुए चिंता जताई कि इससे राजनीतिक दल ब्लैकमेल का हथियार बन सकते हैं।

याचिका का आधार

यह याचिका केरल हाईकोर्ट के एक फैसले को चुनौती देती थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि राजनीतिक दलों के लिए POSH एक्ट के तहत आंतरिक शिकायत समिति (ICC) बनाना जरूरी नहीं है। याचिकाकर्ता योगमाया जी ने वकील शोभा गुप्ता के जरिए सुप्रीम कोर्ट में यह मामला उठाया। उनका कहना था कि राजनीतिक दलों में कई महिलाएं सक्रिय सदस्य हैं, लेकिन ज्यादातर दलों में यौन उत्पीड़न की शिकायतों के लिए कोई सही तंत्र नहीं है। उन्होंने दावा किया कि बताया कि सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम ने ही बाहरी सदस्यों के साथ ICC बनाई है। बाकी दलों में महिलाओं को न्याय मिलना मुश्किल है। गुप्ता ने जोर देकर कहा कि रजिस्टर्ड राजनीतिक दल संविधान के प्रति निष्ठा रखते हैं और महिलाओं की गरिमा की रक्षा करना उनका कर्तव्य है। इसलिए, POSH एक्ट को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए, ताकि महिलाओं को सुरक्षित माहौल मिले।

इसे भी पढ़ें: ‘पाञ्चजन्य आधार इंफ्रा कॉन्फ्लुएंस 2025’ में बोले नितिन गडकरी- एक दिन रोड ही फैक्ट्री में बनाएंगे 

CJI गवई की अहम टिप्पणी

सुनवाई के दौरान CJI बीआर गवई ने सवाल उठाया कि राजनीतिक दलों को आखिर ‘कार्यस्थल’ कैसे माना जा सकता है। उन्होंने कहा, “आप राजनीतिक दलों को कार्यस्थल के दायरे में नहीं रख सकते। क्योंकि राजनीतिक दल नौकरी नहीं देते।” जब शोभा गुप्ता ने दलीलें दीं, तो CJI ने साफ लहजे में कहा, “अगर राजनीतिक दलों को POSH एक्ट के तहत लाया गया, तो यह भानुमति का पिटारा खोल देगा और दल ब्लैकमेल का साधन बन जाएंगे।” बेंच ने यह भी पूछा कि जब कोई व्यक्ति राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो यह नौकरी की तरह तो नहीं होता। याचिकाकर्ता ने आम आदमी पार्टी (AAP) पर पारदर्शिता न बरतने का आरोप लगाया, जबकि भाजपा और कांग्रेस ने माना कि उनकी ICC संरचनाएं अपर्याप्त हैं। लेकिन कोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया। आखिर में, जब गुप्ता ने फिर से मांग की, तो CJI ने कहा, “सॉरी! खारिज!” और याचिका को खारिज कर दिया।

राजनीतिक दलों में ICC की स्थिति

शोभा गुप्ता ने अपनी दलील में दावा किया कि राजनीतिक दलों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन यौन उत्पीड़न के मामलों में कोई मजबूत व्यवस्था नहीं है। याचिकाकर्ता का मानना था कि POSH एक्ट 2013 के तहत सभी संगठित इकाइयों को ICC बनानी चाहिए, जिसमें राजनीतिक दल भी शामिल हों। कोर्ट ने हालांकि इसे लागू करने से इनकार करते हुए दुरुपयोग की आशंका जताई।

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कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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