दिल्ली के द अशोक होटल में आयोजित पाञ्चजन्य के ‘आधार इंफ्रा कॉन्फ्लुएंस 2025’ में हरियाणा के फरीदाबाद में अमृता अस्पताल के प्रशासनिक निदेशक स्वामी निजामृतानंद पुरी जी ने अपने विचार रखे। स्वामी निजामृतानंद पुरी जी, श्री माताजी अमृतानंदमयी देवी अम्मा के शिष्य हैं। स्वामी निजामृतानंद पिछले 32 वर्षों से करुणा, निस्वार्थ सेवा और मानवता के उत्थान के लिए अम्मा के मिशन में सक्रिय हैं। इन्होंने गरीबों की सेवा, शिक्षा, आपदा राहत और स्वास्थ्य सेवाओं में महत्वपूर्ण कार्य किया है। वर्तमान में उत्तर भारत में अम्मा आश्रम की गतिविधियों का संचालन कर रहे हैं।
चुनौतियों पर स्वामी निजामृतानंद का दृष्टिकोण
स्वामी निजामृतानंद ने कहा- “चुनौतियाँ वास्तव में कोई असाधारण स्थिति नहीं हैं। जीवन में कुछ न करने वाला व्यक्ति भी एक प्रकार की चुनौती का सामना करता है—अस्तित्व की चुनौती। लेकिन जब कोई व्यक्ति कुछ सार्थक करने का प्रयास करता है, कुछ ऊँचा पाने की कोशिश करता है, तब अवश्य ही अधिक बाधाएँ सामने आती हैं। परंतु जीवन में बाधाएँ तो सभी के लिए हैं। उन्हें केवल ‘बाधा’ के रूप में देखने की आवश्यकता नहीं है, जो कार्य करना चाहता है, वह उन्हें पार करके आगे बढ़ता है।”
आश्रम और स्वास्थ्य सेवाओं की अनूठी यात्रा
उन्होंने कहा- “जहाँ तक आश्रम और स्वास्थ्य सेवाओं की बात है, यह यात्रा कोई एक दिन की नहीं है। अम्मा (माताजी अमृतानंदमयी) के मार्गदर्शन में यह सेवा बहुत पहले आरंभ हो चुकी थी। केरल में स्थित हमारे आयुर्वेदिक अस्पताल, चिकित्सालय और अनुसंधान केंद्र इस सेवा भावना का प्रमाण हैं। यह बहुत लोग नहीं जानते कि भारत की पहली पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजी यूनिट हमारे अस्पताल में ही शुरू हुई थी, जिसका उद्घाटन लगभग 70 वर्ष पूर्व श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने किया था।”
उल्लेखनीय चिकित्सा उपलब्धियाँ
स्वामी निजामृतानंद ने बताया कि “हमारे अस्पताल में 21 सप्ताह के एक नवजात शिशु की सफल सर्जरी कर के उसे पुनः जीवन देना—यह भारत में अपनी तरह का पहला प्रयास था। आज हमारे संस्थान में सबसे अधिक रोबोटिक लिवर ट्रांसप्लांट्स हुए हैं। एशिया पैसिफिक क्षेत्र का पहला हाथ का प्रत्यारोपण भी यहीं हुआ था, और हम विश्व में ऐसे ट्रांसप्लांट्स में सबसे आगे हैं।
उन्होंने कहा- लोग जब ‘आश्रम’ शब्द सुनते हैं, तो अक्सर यह मान लेते हैं कि वहां केवल आध्यात्मिक शिक्षा या बुनियादी सेवा कार्य होते होंगे। परंतु हमारी दृष्टि में समाज की जो आवश्यकताएँ हैं, उन्हीं को देखकर कार्य होता है। जो आवश्यकता देख रहा है, वही सेवा भी कर रहा है। हमारी यह यात्रा केवल एक मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण व्यवस्था है जो समाज को समर्पित है। इसका मूल कारण है – प्रेम और त्याग। भारतीय संस्कृति की यही शिक्षा रही है, और अम्मा की प्रेरणा यही रही है—प्रेम करना, बिना अपेक्षा के सेवा करना।”
शोध और शिक्षा में अग्रणी योगदान
उन्होंने कहा- “आज हमारी यूनिवर्सिटी में विश्व भर से लौटे हुए लगभग 500 पीएचडी शोधार्थी हैं, जिन्होंने विदेश छोड़कर भारत आकर सेवा को चुना। ये सभी लोग किसी स्वार्थवश नहीं, बल्कि प्रेम और सेवा के भाव से जुड़े हैं। सच्ची प्रगति और मात्र वृद्धि में अंतर होता है। कैंसर का सेल भी बढ़ता है, पर वह विनाश का कारण बनता है। इसलिए हर वृद्धि प्रगति नहीं होती। प्रगति के लिए सही सोच और दिशा आवश्यक होती है। हमारी यूनिवर्सिटी को यूएन के ‘इम्पैक्ट रैंकिंग्स’ में भारत में पहला स्थान और विश्व में 44वाँ स्थान प्राप्त हुआ है। यह रैंकिंग उन संस्थाओं को दी जाती है जो संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDGs) के अनुरूप कार्य करती हैं। लेकिन हम ये सब यूएन की प्रेरणा से नहीं कर रहे हैं — हम कर रहे हैं क्योंकि यह हमारे स्वभाव में है, हमारी संस्कृति का अंग है।”
भारतीय संस्कृति का मूल संदेश
उन्होंने कहा- “भारतीय संस्कृति कहती है—यदि दायाँ हाथ घायल हो जाए तो बाएँ हाथ को बुलाना नहीं पड़ता, वह स्वयं सहायता के लिए आगे आता है। यही हमारी सोच है, यही हमारा स्वभाव है—सभी अपने हैं, सभी में वही तत्व समाहित है। यह सेवा हमारी संस्कृति की अभिव्यक्ति है, न कि कोई बाहरी विचारधारा।”

















