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मेक इन इंडिया : आत्मनिर्भरता भी, रणनीतिक धार भी

भारत ने 'विक्रम' माइक्रोप्रोसेसर के साथ सेमीकंडक्टर क्रांति की दिशा में ऐतिहासिक छलांग लगाई है। यह उपलब्धि सिर्फ आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि विश्व तकनीकी परिदृश्य में भारत की रणनीतिक धार का प्रमाण

Written byबालेन्दु शर्मा दाधीचबालेन्दु शर्मा दाधीच
Sep 14, 2025, 12:30 pm IST
inभारत, विश्लेषण, विज्ञान और तकनीक
भारत ने 'विक्रम' माइक्रोप्रोसेसर के साथ सेमीकंडक्टर क्रांति की दिशा में ऐतिहासिक छलांग लगाई है। यह उपलब्धि सिर्फ आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि विश्व तकनीकी परिदृश्य में भारत की रणनीतिक धार का प्रमाण

भारत ने 'विक्रम' माइक्रोप्रोसेसर के साथ सेमीकंडक्टर क्रांति की दिशा में ऐतिहासिक छलांग लगाई है। यह उपलब्धि सिर्फ आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि विश्व तकनीकी परिदृश्य में भारत की रणनीतिक धार का प्रमाण

गत 2 सितम्बर को जब ‘सेमिकॉन इंडिया 2025’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश का पहला पूर्णत: स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर ‘विक्रम’ लॉन्च किया तो भारत के सेमीकंडक्टर उद्योग ने आत्मविश्वास के साथ सफलता की बड़ी छलांग लगाई। ‘विक्रम’ देखने में तो दूसरे माइक्रोप्रोसेसरों की ही तरह एक छोटा-सा चिप है, लेकिन इस छोटे से तकनीकी उत्पाद के भीतर कई संभावनाएं, संदेश और निहितार्थ छिपे हैं। यह न सिर्फ एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि है, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की महत्वाकांक्षाओं की दिशा में एक और मजबूत कदम है जो एक-एक कर विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विश्व की शीर्ष शक्तियों के बीच अपना स्थान सुरक्षित करता जा रहा है। सेमीकंडक्टर उद्योग जितना जटिल है, उतना ही रणनीतिपूर्ण भी है। यह दूसरे डिजिटल उपकरणों के विनिर्माण की तुलना में बहुत अधिक महत्व रखता है और बेहद चुनौतीपूर्ण भी है।

बालेन्दु शर्मा दाधीच
वरिष्ठ अधिकारी, बहुराष्ट्रीय तकनीकी कंपनी

सिर्फ साढ़े तीन साल पहले भारत का सेमीकंडक्टर मिशन शुरू हुआ था। इतनी सी अवधि में विक्रम और कुछ दूसरे स्वदेशी सेमीकंडक्टरों का हमारे हाथ में होना इस क्षेत्र में भारत की क्षमताओं और संभावनाओं की निशानदेही करता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में देश की ठोस प्रगति को देखने के बाद यह उपलब्धि एक अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हमारे क्रमिक विकास का प्रमाण है जो न सिर्फ हम भारतीयों के आत्मविश्वास को बढ़ाएगा बल्कि दुनिया के देशों को भी हमारी तरफ विश्वास के साथ देखने के लिए प्रेरित करेगा। यह आत्मविश्वास तब और भी बढ़ जाता है जब मर्क इलेक्ट्रॉनिक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी काई बेकमैन जैसे प्रौद्योगिकी के वैश्विक दिग्गज यह टिप्पणी करते हैं कि भारत सेमीकंडक्टर विनिर्माण के क्षेत्र में दुनिया के शीर्ष पांच देशों में आने के लिए तैयार है।

विक्रम नामक माइक्रोप्रोसेसर (चिप) भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की मोहाली स्थित सेमीकंडक्टर लैब (एस.सी.एल.) में विकसित किया गया है। यह 32-बिट का माइक्रोप्रोसेसर RISC-V आर्किटेक्चर पर आधारित है और 180 नैनोमीटर प्रोसेस तकनीक पर चलता है। विशेष रूप से अंतरिक्ष प्रक्षेपण यानों की कठिन परिस्थितियों को झेलने योग्य विक्रम चिप रक्षा प्रणालियों, एयरोस्पेस प्रौद्योगिकी, आधुनिक ऑटोमोबाइल और ऊर्जा प्रणालियों में भी उपयोगी होने वाला है। प्रधानमंत्री ने इसे देश के सामने प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारत सेमीकंडक्टर जैसे अत्याधुनिक तकनीकी क्षेत्रों में अब केवल उपभोक्ता मात्र की भूमिका में नहीं रह गया है। वह निर्माता के रूप में भी दुनिया का ध्यान खींच रहा है।

आज की दुनिया में सेमीकंडक्टरों का महत्व वैसा ही है जैसा औद्योगिक क्रांति के दौर में कोयले और इस्पात का था। मोबाइल फोन, कंप्यूटर, गेमिंग उपकरण, लैपटॉप, इलेक्ट्रिक कार, उपग्रह, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रक्षा तकनीक जैसी अनगिनत चीजें और प्रक्रियाएं सेमीकंडक्टरों पर निर्भर हैं। प्रधानमंत्री ने सेमिकॉन के दौरान ठीक ही कहा कि जहां तेल काला सोना था वहीं माइक्रोप्रोसेसर आज के डिजिटल डायमंड हैं।

प्रधानमंत्री मोदी के कथन की पुष्टि सेमीकंडक्टर उद्योग में निहित व्यापारिक, प्रौद्योगिकीय, वैज्ञानिक और रणनीतिक संभावनाओं से हो जाती है। 2023 में वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग का आकार 500 अरब डॉलर से अधिक था जबकि मैकिन्सी की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक यह एक हजार अरब डॉलर से ऊपर पहुंच जाएगा।

‘सेमिकॉन इंडिया 2025’ को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

निर्भरता से आत्मनिर्भरता तक

लेकिन बात सिर्फ व्यावसायिक ही नहीं है। आपको याद होगा कि कोविड-19 महामारी के दौरान हमने सेमीकंडक्टरों की किल्लत का असर अपने चारों तरफ, खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर, वाहन उद्योग, दूरसंचार आदि में देखा था। जब चिप की आपूर्ति बाधित हुई, तब पूरी दुनिया ने महसूस किया कि सेमीकंडक्टर महज तकनीकी चीज नहीं हैं, बल्कि अपने आप में एक रणनीतिक संपदा भी हैं। उस समय चीन, ताइवान आदि देशों से सेमीकंडक्टर की आमद में बाधा आ जाने के कारण अनेक देशों में ऑटोमोबाइल कारखानों से लेकर मोबाइल कंपनियों तक को अपनी उत्पादन लाइनों को बंद करना पड़ा था और उन्हें अरबों डॉलर का नुकसान हुआ था। उपभोक्ताओं को महीनों तक अपने उत्पादों के लिए इंतजार करना पड़ा था। इन वस्तुओं के दाम बढ़ गए थे, वह अलग। इसके साथ ही वैश्विक राजनीति ने भी सेमीकंडक्टरों को नई रणनीतिक अहमियत दी है। अमेरिका और चीन के बीच जारी तनाव, ताइवान की कंपनी TSMC का 60 प्रतिशत से अधिक बाजार हिस्सेदारी पर नियंत्रण और अमेरिकी चिप्स अधिनियम 2022 जैसे कदम यह दिखाते हैं कि सेमीकंडक्टर अब ऊर्जा या तेल की ही तरह राजनीतिक और आर्थिक महत्व रखते हैं।

भारत के लिए यह चुनौती और भी गंभीर है जो हर साल लगभग 20 अरब डॉलर के सेमीकंडक्टरों का आयात करता है। हमारे देश के इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग का आकार 100 अरब डॉलर से अधिक है, लेकिन सेमीकंडक्टरों की घरेलू उत्पादन क्षमता फिलहाल नगण्य है। एक ऐसा देश जहां हर महीने 10 अरब से अधिक वित्तीय लेन-देन युनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) के जरिए होते हैं और जहां 80 करोड़ से अधिक लोग स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं, वहां सेमीकंडक्टरों के आयात पर लगभग शत-प्रतिशत निर्भरता कितनी उचित है? अगर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में जरा-सी रुकावट आती है, तो भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था पर इसका भारी असर हो सकता है, और हुआ है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने सेमीकंडक्टरों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे पहलुओं को राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता दोनों से जोड़कर देखा है।

हालांकि इस क्षेत्र में हमारी यात्रा आसान नहीं है। यह कोई सरल, सामान्य क्षेत्र नहीं है। इस संदर्भ में हमारी सबसे बड़ी चुनौती है बहुत अधिक निवेश की आवश्यकता। एक अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर फैब (निर्माण इकाई) लगाने में 10 अरब डॉलर (80,000 करोड़ रुपए) से अधिक का खर्च आ सकता है। भारत के लिए दूसरी बड़ी चुनौती है इस उद्योग के लिए विशेषज्ञता-प्राप्त लोगों की उपलब्धता। हालांकि हमारे देश के महाविद्यालयों से हर साल 25 लाख इंजीनियर निकलते हैं, लेकिन चिप डिजाइन और फैब्रिकेशन जैसे अत्यधिक विशेष क्षेत्रों में प्रशिक्षित लोगों की संख्या बहुत कम है। जो युवा इन विषयों में अध्ययन करते भी हैं वे अक्सर विदेश में मिलने वाले अवसरों के लालच में आ जाते हैं। इनके साथ-साथ पर्यावरणीय पहलू भी इस उद्योग को प्रभावित करते हैं। सेमीकंडक्टरों के उत्पादन में अत्यधिक शुद्ध पानी और बिजली की ज़रूरत होती है। अक्सर जल-संकट से परेशान रहने वाले हमारे देश के लिए उलझन का सवाल आ जाता है सेमीकंडक्टर विनिर्माण को स्थायित्व कैसे दिया जाए और पर्यावरण-अनुकूल कैसे बनाया जाए।

इन चुनौतियों के बावजूद भारत ने इस क्षेत्र में स्पष्ट रणनीति बनाई है जो अपना प्रभाव दिखाने लगी है। 2021 में शुरू किया गया इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन सरकार के भविष्योन्मुखी दृष्टिकोण और योजना की बुनियाद है। इसके तहत सेमीकंडक्टरों के उत्पादन और डिज़ाइन से जुड़ी कंपनियों को 50 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता दी जाती है। उत्पाद-आधारित प्रोत्साहन (पी.एल.आई.) और डिजाइन आधारित प्रोत्साहन (डी.एल.आई.) जैसी योजनाओं से इस उद्योग को संबल मिला है, जिसकी दर्जनों परियोजनाओं को सरकारी प्रोत्साहन के दायरे में ले आया गया है। गुजरात से लेकर आंध्र प्रदेश तक कई जगह बड़े निवेश हो रहे हैं। माइक्रोन की गुजरात इकाई और टाटा का धोलेरा प्रोजेक्ट इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

आर्थिक और तकनीकी लाभ

इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग ने भी गति पकड़ी है। अमेरिका के आई.सी.ई.टी. के साथ मिलकर तकनीकी हस्तांतरण पर काम किया जा रहा है। जापान, कोरिया और ताइवान की कंपनियां भी भारत के साथ भागीदारी कर रही हैं। सेमिकॉन इंडिया 2025 सम्मेलन में दुनिया की दिग्गज कंपनी ए.एस.एम.एल. (नीदरलैंड्स) ने भारत को उन्नत लिथोग्राफी तकनीक उपलब्ध कराने की पेशकश की है। ऐसा होने पर भारतीय विनिर्माता को श्रेष्ठतम तकनीकी पैमानों पर खरे उतर सकेंगे। यदि भारत अपने सेमीकंडक्टर उद्योग को विकसित करने में सफल होता है, तो इसका लाभ बहुआयामी होगा। परामर्शी फर्म डेलॉइट का अनुमान है कि इस उद्योग में भारत का हर एक डॉलर का निवेश पांच डॉलर का परिणाम (मूल्य) उत्पन्न करेगा। 2026 तक इस क्षेत्र में 85,000 से अधिक नौकरियों का सृजन होने और 100 अरब डॉलर से अधिक निवेश की संभावना है। यह सब हमारी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत देता है क्योंकि तब हम अपने सकल घरेलू उत्पाद में एक से 2 प्रतिशत तक के योगदान की उम्मीद कर सकते हैं।

तकनीकी दृष्टि से भी ये उपलब्धियां बहुत महत्वपूर्ण हैं। विक्रम जैसे चिप्स केवल रक्षा या अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में ही प्रयुक्त नहीं होंगे बल्कि इंटरनेट ऑफ थिंग्स, स्मार्ट ग्रिड्स, इलेक्ट्रिक वाहनों और बायोटेक्नोलॉजी तक में उपयोगी होंगे। इससे भारत की नवाचार क्षमता बढ़ेगी और देश वैश्विक तकनीकी दौड़ में अग्रणी के रूप में उभरेगा।

दुनिया में आज सभी देश चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहते हैं। ताइवान हालांकि मित्र देश है किंतु निर्भरता उस पर भी रहे, यह उचित नहीं। ऐसे में भारत के पास मौका है कि वह दुनिया के लिए सेमीकंडक्टर क्षेत्र के एक विकल्प और विश्वसनीय साझेदार के रूप में उभरे। हमारे देश में तकनीकी उद्योगों पर आने वाली लागत पश्चिम की तुलना में कम है जो हमें एक ठोस प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित कर सकती है। भारत ने फिलहाल अत्याधुनिक 3 नैनोमीटर या 5 नैनोमीटर नोड्स की बजाय 28 नैनोमीटर से 180 नैनोमीटर नोड्स पर ध्यान केंद्रित किया है। यह रणनीतिक दृष्टि से सही है, क्योंकि ऑटोमोबाइल और औद्योगिक क्षेत्रों में इन्हीं चिप्स की सबसे अधिक मांग है।

यशोभूमि में ‘सेमीकॉन इंडिया’ के चौथे संस्करण के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी देशी विदेशी तकनीकविद्
  • विक्रम 32 बिट प्रोसेसर को मुश्किल परिस्थितियों, जैसे बहुत अधिक गर्मी, ठंड, कंपन और दबाव को ध्यान में रखकर बनाया गया है।
  •  पहले से तैयार स्वदेशी 16 बिट विक्रम 1601 का एडवांस रूप है।
  •  सेमीकंडक्टर चिप का इस्तेमाल मोबाइल फोन, कंप्यूटर, लैपटाप, कार, इलेक्ट्रिक वाहन, टीवी, वाशिंग मशीन से लेकर इंटरनेट, क्लाउड और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक में होता है।
  •  ओडिशा और असम सहित 6 राज्यों में 10 सेमीकंडक्टर परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इसके साथ ही कहा कि भारत में 2027 तक पूरे पैमाने पर परिचालन शुरू होने की उम्मीद

यात्रा की शुरुआत

‘विक्रम’ नामक माइक्रोप्रोसेसर का आगमन हमारी यात्रा की शुरुआत है। इससे पहले आईआईटी मद्रास का ‘शक्ति’ और आईआईटी बॉम्बे का ‘अजित’ जैसे प्रयास हुए थे, लेकिन ‘विक्रम’ की उपलब्धि अधिक परिपक्व और संभावनापूर्ण है। ओडिशा जैसे राज्यों से भी उल्लेखनीय प्रोजेक्ट सामने आए हैं-जैसे इंटरनेट ऑफ थिंग्स में प्रयोग करने के लिए एन्क्रिप्शन कोर और फेस रिकॉग्निशन (चेहरों की पहचान) के लिए मल्टिप्लायर आईसी का विकास। उधर रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन ने भी GaN चिप्स विकसित किए हैं, जो रक्षा क्षेत्र में सेमीकंडक्टरों के आयात को 30 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं। टाटा का 11 अरब डॉलर का धोलेरा फैब और माइक्रोन का गुजरात संयंत्र आने वाले वर्षों में इस उद्योग में भारत का दर्जा बदल सकते हैं। सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक भारत पूर्ण सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम खड़ा कर ले, जिसमें डिजाइन से लेकर उत्पादन और पैकेजिंग तक सब शामिल हो।

आज भारत उपभोक्ता से निर्माता बनने की ओर बढ़ रहा है। यह एक लंबी और कठिन दौड़ है, लेकिन विक्रम सेमीकंडक्टर का विकास सिद्ध करता है कि हमारी दिशा सही है। अगर हमारी यात्रा इसी रफ्तार से आगे बढ़ी, तो आने वाले दशक में देश न केवल तकनीकी दृष्टि से आत्मनिर्भर हो जाएगा बल्कि दुनिया को सेमीकंडक्टरों की सप्लाई करने वाला प्रमुख खिलाड़ी बनकर दिखा सकता है।

Topics: PM Narendra ModiGaN चिप्सMake in Indiaसेमीकंडक्टर क्रांतिSelf-relianceविक्रम माइक्रोप्रोसेसरबालेन्दु शर्मा दाधीचविश्व तकनीकीपाञ्चजन्य विशेषसेमिकॉन इंडिया 2025Semicon India 2025सेमीकॉन इंडियाGaN chipssemiconductor revolutionVikram Microprocessortechnology company‘मेक इन इंडिया’Semicon India
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