क्यों लगे ढाका यूनिवर्सिटी में हिजाब के समर्थन में नारे?
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क्यों लगे ढाका यूनिवर्सिटी में हिजाब के समर्थन में नारे?

ढाका यूनिवर्सिटी के चुनावों में इस्लामी छात्र शिबिर की जीत हुई है। यह जमात-ए-इस्लामी की छात्र शाखा है। इन परिणामों में सभी को सकते में डाल दिया है, क्योंकि ढाका यूनिवर्सिटी सेकुलर और उदार माहौल के लिए जानी जाती थी।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by Sudhir Kumar Pandey
Sep 13, 2025, 10:00 am IST
inविश्व
ढाका यूनिवर्सिटी में हिजाब के समर्थन में नारे लगाते छात्र।

ढाका यूनिवर्सिटी में हिजाब के समर्थन में नारे लगाते छात्र।

बांग्लादेश की ढाका यूनिवर्सिटी से एक चौंकाने वाला वीडियो सामने आया है। इसमें दिख रहा है कि कुछ छात्र सीनेट में हिजाब-हिजाब के नारे लगा रहे हैं। यह इसलिए खतरनाक प्रतीत होता है क्योंकि इससे उन लड़कियों पर हिजाब का दबाव बढ़ेगा, जो इसे नहीं पहनती हैं या फिर जो गैर-मुस्लिम हैं। हाल-फिलहाल में बांग्लादेश में महिलाओं को लेकर जो कुछ भी हुआ है, वह प्रत्यक्ष दिख रहा है। उन्हें निशाना बनाया जा रहा है और अब शैक्षणिक संस्थानों में भी हिजाब की अनिवार्यता को लेकर बातें हो रही हैं।

जो वीडियो वायरल हो रहा है, वह ढाका यूनिवर्सिटी के छात्र संघ के चुनावों के बाद का है। इसमें कथित रूप से छात्र हिजाब-हिजाब के नारे लगा रहे हैं। ये नारे सबीकुन नाहर तमन्ना के समर्थन में लग रहे हैं। सबीकुन एक हिजाबी छात्रा है, जो बांग्लादेश इस्लामी छत्री संगठन (Bangladesh Islami Chhatri Sangstha) की अध्यक्ष है। यह छात्राओं को समर्पित एकमात्र राजनीतिक संगठन है। इसकी स्थापना वर्ष 1978 में 15 जुलाई को एडेन महिला कॉलेज में 11 छात्राओं के साथ हुई थी और इस समय बांग्लादेश के विविध शैक्षणिक संस्थानों में इसकी शाखाएं हैं।

सबीकुन ढाका यूनिवर्सिटी में बड़े अंतर से विजयी घोषित हुईं। उसने अपना पूरा अभियान हिजाब में चलाया था और उस पर हिजाब पहनने के कारण निशाना साधा गया था। हि0जाब वाली तस्वीर को विकृत कर दिया गया था और उसने विकृत तस्वीर को ही सबसे बड़ा हथियार बनाया था। उसकी विजय के उपलक्ष्य में ढाका यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों ने हिजाब के नाम पर नारे लगाए थे।

इंटरनेट पर जो भी सूचनाएं हैं, उनसे यह प्रमाणित नहीं होता है कि ये नारे और लड़कियों को हिजाब पहनने के लिए बाध्य करने के लिए लगाए गए थे, परंतु यह भी बात सत्य है कि जब इस प्रकार कोई विशिष्ट पद पर बैठी हुई लड़की हिजाब और नकाब में होगी तो आम लड़कियों पर स्वाभाविक दबाव पड़ेगा और लोगों की यह अपेक्षा रहेगी कि और लड़कियां भी इसी राह पर चलें।

चूंकि ये छात्र संघ के चुनाव हैं, इससे कथित युवाओं की सोच का भी पता चलता है और यह भी पता चलता है कि वे कैसी लड़कियों की इज्जत करते हैं और कैसी लड़कियों के आगे बढ़ने पर खुश होते हैं, तो इस नारे का मानसिक प्रभाव अधिक पड़ेगा क्योंकि यह जाहिर तथ्य है कि युवा अपने आयुवर्ग में अपनी पहचान चाहते हैं। जिस पथ पर पहचान मिलता है, वह उसी पर चल पड़ते हैं। यही कारण है कि यह नारा बाध्यकारी न होते हुए भी उन लड़कियों के प्रति घातक प्रतीत हो रहा है, जो लड़कियां हिजाब का समर्थन नहीं करती हैं या फिर हिजाब नहीं पहनती हैं।

ढाका यूनिवर्सिटी के छात्र संघ के चुनावों में इस्लामिक संगठन की जीत

ढाका यूनिवर्सिटी के चुनावों में इस्लामी छात्र शिबिर की जीत हुई है। यह जमात-ए-इस्लामी की छात्र शाखा है। इन परिणामों में सभी को सकते में डाल दिया है, क्योंकि ढाका यूनिवर्सिटी सेकुलर और उदार माहौल के लिए जानी जाती थी। इन परिणामों ने सबसे बड़ा झटका बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को दिया है, क्योंकि उसकी छात्र शाखा बांग्लादेश जातीयोतबादी छात्रोदल (जेएसडी) को करारी हार का सामना करना पड़ा है। हालांकि जेसीडी ने इन परिणामों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। उसका कहना है कि ये परिणाम सुनियोजित छेड़छाड़ का परिणाम है।

इस तथ्य को दरकिनार नहीं किया जा सकता है कि छात्र संघ के चुनावों मे भी अवामी लीग और उसकी छात्र शाखा को प्रतिबंधित किया गया था, इसलिए उसके प्रति सहानुभूति रखने वाले छात्र भी बीएनपी के विरोध में कहीं इस्लामी छात्र शिबिर की ओर तो नहीं चले गए? ऐसी भी संभावना व्यक्त की जा रही है।

शशि थरूर ने भी चिंता व्यक्त की

इस जीत को लेकर कांग्रेस के नेता शशि थरूर भी चिंता व्यक्त कर चुके हैं। उन्होनें एनडीटीवी पर लिखे अपने लेख में लिखा है कि ढाका में यदि कट्टरपंथी तत्वों के सत्ता में आने से सीमा पर भारत विरोध तेज होगा और पाकिस्तान की आईएसआई के साथ अधिक सहयोग दिखाया जाएगा और साथ ही सुरक्षा चुनौतियों में वृद्धि होगी। जमात का उभार बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यकों के लिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि हिन्दू इस्लामी सत्ताओं के आने पर अत्याचार का शिकार होते हैं।

घातक है हिजाब का नारा

जमात लोकतान्त्रिक मूल्यों का अनादर करती है और इस्लाम की कट्टर व्याख्या करती है। इसके आने से भारत के लिए लिए भी चिंता बढ़ेगी। यह इसलिए भी चिंता का विषय है क्योंकि यह जीत बताती है कि बांग्लादेश की राजनीति किस ओर मुड़ रही है। इसलिए हिजाब-हिजाब का जो नारा एक विजयी उम्मीदवार की जीत का जश्न मनाने के लिए लग रहा है, वह मानसिक रूप से अधिक घातक है, क्योंकि वह बाध्यकारी न होते हुए भी कहीं न कहीं अत्यधिक बाध्यकारी है।

Topics: पाञ्चजन्य विशेषढाका यूनिवर्सिटीबांग्लादेश में महिलाएंसबीकुन नाहर तमन्नाहिजाबबांग्लादेशहिजाब का समर्थनशशि थरूर
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