इतिहास घटित होता है, निर्देशित नहीं। उसकी वास्तविक घटनाएं वर्तमान को दिशा देती हैं और भविष्य की नींव मजबूती से रखती हैं। दुर्भाग्य से हमारी पाठ्यपुस्तकों में इतिहास को पूर्वाग्रहों के आधार पर लिखा और पढ़ाया गया, न कि तथ्यों पर। प्रामाणिक प्रस्तुति के प्रयास हर बार विवादों की भेंट चढ़े। इसी संदर्भ में,राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अंतर्गत एनसीईआरटी ने 14 अगस्त, 2025 को कक्षा 6-8 और 9-12 के लिए दो पूरक मॉड्यूल जारी किए।

शिक्षाविद् एवं सामाजिक संस्था शिक्षा-सोपान के संस्थापक
ये मॉड्यूल अनिवार्य न होकर चर्चा, वाद-विवाद और परियोजनाओं के माध्यम से विद्यार्थियों को विभाजन की विभीषिका और मानवीय पीड़ा को समझने का अवसर देंगे। इसमें विभाजन के लिए तीन प्रमुख तत्वों- जिन्ना, कांग्रेस और लॉर्ड माउंटबेटन को जिम्मेदार बताया गया है। जिन्ना ने विभाजन की मांग उठाई, कांग्रेस ने उसे स्वीकार किया और माउंटबेटन ने उसे औपचारिक रूप देकर लागू किया। एनसीईआरटी की यह पहल इतिहास को यथार्थ रूप में समझने और भविष्य के लिए सबक लेने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
जिन्ना की महत्वाकांक्षा
जिन्ना की महत्वाकांक्षा और पृथक पहचान की राजनीति ने भारतीय मुसलमानों में सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया। हालांकि, इसके बीज पहले ही सर सैयद अहमद खान, मोहम्मद इकबाल और चौधरी रहमत अली जैसे नेताओं के विचारों से पड़ चुके थे। 14 मार्च, 1888 को मेरठ भाषण में सर सैयद ने स्पष्ट कहा था, ‘‘मान लीजिए अंग्रेज भारत छोड़ गए तो इस देश का शासक कौन होगा? क्या हिंदू और मुस्लिम एक ही सिंहासन पर बैठ सकते हैं? निश्चित ही नहीं।… मुसलमान भले कम हों, पर दुर्बल नहीं हैं। यदि आवश्यकता पड़ी तो हमारे पठान भाई पर्वतों से उतरकर सरहद से बंगाल तक खून की नदियां बहा देंगे।’’ यही नहीं, उन्होंने हिंदू-मुस्लिम को दो अलग राष्ट्र बताते हुए संघर्ष की संभावना जताई। बाद में इकबाल ने 1904 में ‘तराना-ए-हिंद’ में भारतीयता की बात की, लेकिन 1910 में ‘तराना-ए-मिल्ली’ में मुसलमानों को पृथक राष्ट्र का प्रतीक बताया।
1930 में मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन में इकबाल ने पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (अफगान प्रांत) को मिलाकर पृथक मुस्लिम राज्य की मांग रखी तथा द्विराष्ट्र सिद्धांत को वैचारिक आधार दिया। तर्क दिया कि मुसलमान मजहबी-सांस्कृतिक विशिष्टता के साथ हिंदुओं के साथ सह-अस्तित्व में नहीं रह सकते। 1933 में चौधरी रहमत अली ने ‘पाकिस्तान’ का विचार प्रस्तुत किया, जो राजनीतिक इस्लाम से प्रेरित था और गैर-मुसलमानों के साथ स्थायी सह-अस्तित्व को असंभव मानता था। उनका तर्क था कि सदियों तक जिस इस्लाम की भारत में हुकूमत व सल्तनत रही, वहां मुसलमान बहुसंख्यक हिंदू आबादी के बीच सुरक्षित नहीं रह सकते। प्रारंभ में मुस्लिम लीग की यह मांग व्यापक रूप से स्वीकार नहीं हुई, लेकिन कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार की रियायतों से जिन्ना का मनोबल बढ़ता गया।
1911 का मुस्लिम वक्फ एक्ट 1954 तक प्रभावी रहा, जिसे ‘जिन्ना लॉ’ कहा जाता था। 1916 के लखनऊ अधिवेशन में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच हुए समझौते में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचिका की स्वीकृति ने सांप्रदायिक राजनीति को स्थायी आधार दे दिया। भारत सरकार अधिनियम 1935 के अंतर्गत 1936-37 के प्रांतीय चुनावों में मुस्लिम लीग को असम, बंगाल, बंबई, संयुक्त प्रांत और मद्रास में उल्लेखनीय सफलता मिली। इससे स्पष्ट हुआ कि पाकिस्तान से बाहर भी मुसलमानों का भरोसा कांग्रेस की अपेक्षा जिन्ना पर अधिक था। मार्च 1940 के लाहौर प्रस्ताव के बाद विभाजन की मांग को व्यापक समर्थन मिलना शुरू हो गया।
16 अगस्त, 1946 को जिन्ना के ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ ने विभाजन की दिशा लगभग तय कर दी। केवल कोलकाता में ही करीब 6,000 लोग मारे गए। इसके बाद 10 अक्तूबर, 1946 को गुलाम सरवर हुसैनी के नेतृत्व में नोआखली में निहत्थे हिंदुओं का नरसंहार हुआ, जहां हजारों महिलाओं पर अत्याचार, मासूम बच्चों की हत्या और जबरन कनर्वजन हुआ। उस समय बंगाल में मुस्लिम लीग की अंतरिम सरकार थी और मुख्यमंत्री सुहरावर्दी थे। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने पुलिस कार्रवाई रोककर दंगाइयों को संरक्षण दिया। सीधी कार्रवाई से पहले ही कलकत्ता के 24 थानों में 22 मुस्लिम और 2 एंग्लो-इंडियन थाना प्रभारी नियुक्त किए गए तथा अधिकांश पुलिसकर्मियों को तीन दिन का अवकाश दे दिया गया। यह स्पष्ट संकेत था कि नोआखली नरसंहार एक सुनियोजित षड्यंत्र था। इन हालात में जिन्ना और मुस्लिम लीग की धमकी ‘बंटा भारत या बर्बाद भारत’ के सामने तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व ने घुटने टेक दिए।
कांग्रेस का मुस्लिम तुष्टीकरण
1919 के खिलाफत-असहयोग आंदोलन से कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण की राह पर चल पड़ी और हिंदू-मुस्लिम संबंधों की वास्तविकता को नजरअंदाज करती रही। वहीं, जिन्ना ने मुसलमानों को यह विश्वास दिलाया कि वे मजहब, संस्कृति, इतिहास और जीवन-दृष्टि में हिंदुओं से स्थायी रूप से भिन्न हैं। 22 मार्च, 1940 को जिन्ना ने कहा, ‘‘हिंदू और मुसलमान दो भिन्न पांथिक दर्शनों, रीति-रिवाजों और साहित्य से जुड़े रहे हैं। वे न तो आपस में विवाह संबंध करते हैं, न ही साथ खाते-पीते हैं। वस्तुतः दोनों दो भिन्न सभ्यताओं से जुड़े हैं, जिनके विचार और धारणाएं एक-दूसरे से विपरीत हैं। … उनकी प्रेरक कथाएं और प्रसंग बिलकुल अलग-अलग हैं। प्रायः एक के लिए जो नायक हैं, वह दूसरे के लिए खलनायक रहे हैं।’’ इस दृष्टिकोण को व्यापक समर्थन मिला और 1946 के संविधान सभा चुनाव में मुस्लिम लीग ने 78 में से 73 सीटें जीतीं। मुस्लिम लीग को व्यापक समर्थन ‘पाकिस्तान’ की बजाय शेष भारत के मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में मिला। मद्रास, बॉम्बे प्रेसीडेंसी और ओडिशा में उसे 100 प्रतिशत सीटें मिलीं, जबकि बंगाल में 95 प्रतिशत, मध्य भारत व बेरार में 93 प्रतिशत, असम में 91 प्रतिशत, पंजाब में 86 प्रतिशत, बिहार में 85 प्रतिशत और संयुक्त प्रांत में 82 प्रतिशत सीटें मिली।
जिन्ना ने चुनाव लाहौर या कराची से नहीं, बल्कि बॉम्बे के बायकुला से लड़ा और जीते। मुस्लिम लीग के कई शीर्ष नेता भी शेष भारत से निर्वाचित हुए। विडंबना यह रही कि अलग देश की मांग करने वाले लगभग 3.5 करोड़ मुसलमान और मुस्लिम लीग के कई प्रमुख नेता मोहम्मद इस्माइल, सैयद अहमद मेहदी, बेगम एजाज रसूल, अहमद इब्राहिम साहिब, पोकर साहिब, ताहिर मुहम्मद, तजम्मुल हुसैन आदि विभाजन के बाद भी भारत में रह गए और कांग्रेस में शामिल होकर सत्ता-साझीदार बने। वहीं, पाकिस्तान से आए लगभग डेढ़ करोड़ हिंदू, सिख और सिंधी अपने ही देश में शरणार्थी बनकर दर-दर भटकते रहे। विभाजन की हिंसा में 10-12 लाख से अधिक निर्दोष लोग मारे गए, ट्रेनें लाशों से भरकर भारत आती रहीं, लाखों परिवारों को पुश्तैनी जमीन-जायदाद से बेदखल कर दिया गया और असंख्य माताओं-बहनों पर अमानुषिक अत्याचार हुए। कांग्रेस नेतृत्व जिन्ना, मुस्लिम लीग और राजनीतिक इस्लाम की वास्तविकता समझने में गंभीर गलतियां करता रहा और आजादी के बाद भी उन्हें दोहराता रहा। राममनोहर लोहिया के शब्दों में, ‘जिन समस्याओं के कारण विभाजन स्वीकार किया गया, वह विभाजन के बाद भी वैसी की वैसी बनी रहीं।’ (गिल्टी मेन ऑफ इंडियाज पार्टीशन, पृष्ठ 50)

परिणामस्वरूप, भारत आज तक अंतः और बाह्य संकटों से जूझ रहा है। एक ओर नवभारत की सीमाएं शत्रु देशों से घिर गईं, तो दूसरी ओर भीतर सांप्रदायिक विभाजन की चुनौतियां सामने आईं। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं-सिखों की स्थिति लगातार बिगड़ती गई। आजादी के समय पाकिस्तान में हिंदू 15 प्रतिशत और बांग्लादेश में 30 प्रतिशत थे, जो आज घटकर क्रमशः 1.61 प्रतिशत और 7.95 रह गए हैं। यही नहीं, बहुत से देश पाकिस्तान का इस्तेमाल भारत पर दबाव बनाने के औजार की तरह करते हैं। भारत विरोध को अपनी राजनीति का स्थायी आधार बनाकर पाकिस्तान आतंकवाद का सबसे बड़ा आश्रयदाता बन चुका है। विभाजन का एक और स्थायी दंश कश्मीर है, जिसने भारत की राजनीति, कूटनीति, रक्षा और अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डाल दिया। सच यह है कि विभाजन का जख्म भारत को आज भी बार-बार लहूलुहान करता है।
भारत का विभाजन इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन था। यह न प्राकृतिक आपदा थी, न ही बाहरी आक्रमण, बल्कि कांग्रेस, मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सत्ता के बीच हुए समझौतों का परिणाम था, जिनमें आम जनता की राय का कोई स्थान नहीं था। आज भी यह प्रश्न कायम है कि कांग्रेस ने, जिसने बार-बार नहीं स्वीकार करने का संकल्प लिया, आखिर किन दबावों में उसे स्वीकार किया? तथ्य यह है कि 1942 का क्रिप्स मिशन और 1946 का कैबिनेट मिशन, दोनों ही विभाजन के पक्ष में नहीं थे। यहां तक कि तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो और लॉर्ड वावेल भी विभाजन के विरोधी थे।
बंटवारे के पक्ष में कौन था?
वावेल ने अक्तूबर 1943 से फरवरी 1947 तक लगातार चेताया था कि विभाजन समस्या का हल नहीं है। यह हिंसा, अराजकता और स्थायी शत्रुता को जन्म देगा। उन्होंने 4 फरवरी, 1946 को डायरी में लिखा, ‘‘विभाजन एक अत्यंत विनाशकारी प्रक्रिया होगी। यह सांप्रदायिक समस्या का समाधान नहीं करेगा, बल्कि उसे स्थायी बना देगा।’’ इसके बावजूद 3 जून, 1947 को माउंटबेटन की विभाजन योजना को कांग्रेस ने तत्काल स्वीकार किया।
4 जून, 1947 को नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में जब पत्रकारों ने जनसंख्या के स्थानांतरण से संबंधित प्रश्न पूछे, तो माउंटबेटन संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाए। यह दर्शाता है कि इतने बड़े फैसले पर जनसंख्या के स्थानांतरण को लेकर कोई ठोस विचार-विमर्श नहीं हुआ। हैरत की बात यह कि महात्मा गांधी, जो कहते थे ‘भारत का विभाजन मेरी लाश पर होगा’, कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य न होते हुए भी 14 जून, 1947 को कार्यसमिति बैठक में रहे और विभाजन स्वीकार करने के लिए नेताओं को राजी किया। उस बैठक में 400 में से केवल 200 सदस्य आए, जबकि 158 ने मतदान किया। उसमें भी 129 ने ही विभाजन के पक्ष में मत दिया।
सवाल यह है कि आंदोलनों और सत्याग्रहों के लिए प्रसिद्ध कांग्रेस ने विभाजन के विरोध में न कोई आंदोलन किया, न अनशन, न जनता को सड़कों पर बुलाया। ब्रिटिश सरकार पर दबाव डालने की क्षमता केवल कांग्रेस और मुस्लिम लीग के पास थी और जनता के विश्वास के कारण असली जिम्मेदारी कांग्रेस की ही थी। फिर भी, जब माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण की तिथि जून 1948 से घटाकर अगस्त 1947 कर दी, तब भी तब भी कांग्रेस ने विरोध नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि विभाजन जल्दबाज़ी, अव्यवस्था और अराजकता का शिकार बन गया।

1970 में लैरी कॉलिन्स और डॉमिनिक लैपीयर से बातचीत में लॉर्ड माउंटबेटन ने स्वीकार किया—‘‘मैंने भारत का विभाजन नहीं किया, विभाजन की योजना भारतीय नेताओं द्वारा पहले ही स्वीकार की जा चुकी थी। मेरा कार्य उसे यथासंभव शांतिपूर्ण ढंग से क्रियान्वित करना था। ….मैं जल्दबाजी के लिए दोष स्वीकार करता हूं, परंतु बाद में हुई हिंसा का दोष नहीं। उसका उत्तरदायित्व भारतीयों पर था।’’ इतना ही नहीं, सीमांकन के लिए मात्र पांच सप्ताह देना भी घोर लापरवाही थी। नतीजा, 15 अगस्त के बाद भी करोड़ों लोग अनिश्चित थे कि उनका गांव भारत में है या पाकिस्तान में।
सीरिल रेडक्लिफ, जिसे इस काम की जिम्मेदारी दी गई, न कभी भारत आया था, न भूगोल या संस्कृति से परिचित था। उसकी खींची लकीरों ने 111 गांवों को दो हिस्सों में बांट दिया। इतना कृत्रिम और अव्यावहारिक विभाजन हुआ, जिसकी जिम्मेदारी यदि कांग्रेस, मुस्लिम लीग और माउंटबेटन की नहीं थी, तो किसकी थी?
यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि क्या विभाजन सचमुच अपरिहार्य था? और यदि था, तो जनसंख्या का तर्कसंगत स्थानांतरण क्यों नहीं हुआ? सीमांत गांधी अब्दुल गफ्फार खान ने कांग्रेस पर आरोप लगाया, ‘‘आपने (कांग्रेस नेतृत्व) हमें भेड़ियों के हवाले कर दिया।’’ ऐसा कहने वाले वे अकेले नहीं थे। सिंध इत्तेहाद पार्टी के अल्लाह बख्श सूमरो, पंजाब के सर सिकंदर हयात खान व मलिक खिज़र हयात तिवाना जैसे कई नेता भी विभाजन के विरोधी थे।
इतिहासकारों और चिंतकों का मानना है कि विभाजन किसी भी रूप में अपरिहार्य नहीं था। नीरद सी. चौधरी ‘द कॉन्टिनेंट ऑफ सर्सी’ में पृष्ठ 243 पर लिखते हैं, ‘‘1946 के अंत तक किसी ने भी भारत विभाजन की संभावना पर विश्वास नहीं किया था।’’ स्वयं जिन्ना ने बाद में स्वीकार किया कि उन्हें विभाजन की आशा नहीं थी। ब्रिटिश पत्रकार लियोनार्ड मोसले के अनुसार, जिन्ना ने अपने एडीसी मियां अता रब्बानी से कहा था, ‘‘मैंने कभी नहीं सोचा था कि यह होगा। मुझे कभी उम्मीद नहीं थी कि मैं अपने जीवन में पाकिस्तान देख पाऊंगा।’’ (द लास्ट डेज ऑफ द ब्रिटिश राज, पृष्ठ 239)
जिन्ना के जीवनीकार स्टैनली वोल्पर्ट लिखते हैं, ‘‘दो या तीन शीर्ष नेताओं को छोड़कर मुस्लिम लीग के अधिकांश नेता विभाजन को अव्यावहारिक मानते थे। वे इसे केवल कांग्रेस के साथ सत्ता-साझेदारी में अधिक मुस्लिम प्रतिनिधित्व पाने के लिए दबाव बनाने के लिए औज़ार की तरह प्रयोग कर रहे थे।’’ परंतु कांग्रेस नेताओं ने जिन्ना और हालात का सही आकलन करने में गंभीर भूल की और साहस दिखाने के बजाय विभाजन स्वीकार कर लिया।
राष्ट्रभक्ति की शिक्षा

इस संदर्भ में 1960 में एक साक्षात्कार में जब लियोनार्ड मोसले ने नेहरू से पूछा- आपने विभाजन के लिए इतनी जल्दी क्यों दिखाई? आप चाहते तो इसे टाला जा सकता था। तब नेहरू ने उत्तर दिया—“हम थक चुके थे। हमारा नेतृत्व उम्रदराज हो रहा था और जेल जाने की हिम्मत हम में नहीं रह गई थी। यदि हम भारत विभाजन का विरोध करते तो जेल हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। पंजाब जल रहा था, रोज हत्याएं हो रही थीं। हमने सोचा विभाजन अस्थायी है और पाकिस्तान वापस हमारे पास आएगा, पर हम में से कोई यह अनुमान नहीं लगा पाया था कि यह कितना लंबा खिंच जाएगा।”
विदेशी आक्रमणों के लंबे दौर में भी भारत ने सदियों तक अपनी भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अस्मिता का अक्षुण्ण रखा और अवसर मिलते ही खोया हुआ भू-भाग पुन: पाया। लेकिन 1947 का विभाजन उस परंपरा पर स्थायी विराम था। पहली बार बिना युद्ध कुछ नेताओं ने बंद कमरों में वार्ता कर करोड़ों नागरिकों और विशाल भू-भाग को स्वयं से काट कर अलग कर दिया।
क्या विभाजन के बाद अलगाववाद, मजहबी राजनीति और तुष्टीकरण समाप्त हुआ? उलटे, हिंसक समूहों की मांगें समय के साथ और प्रबल होती गईं और सत्तालोलुप राजनीति वही गलतियां दोहराती रही। इतिहास को झुठलाया या सुविधानुसार तोड़ा-मरोड़ा नहीं जा सकता, उसे यथार्थ रूप में स्वीकारना और पढ़ाना समय की मांग है, ताकि भावी पीढ़ियां अतीत की गलतियों से सबक ले सकें। यदि एनसीईआरटी इस दिशा में पहल कर रही है, तो आपत्ति कैसी?

















