छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में जब माओवाद की बात होती है, तब ‘सलवा जुड़ूम’ नामक प्रेत बाहर निकल आता है। उपराष्ट्रपति चुनाव में यह फिर से चर्चा में है, क्योंकि विपक्षी दलों ने सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी को उम्मीदवार बनाया है।
गृह मंत्री अमित शाह ने 22 अगस्त को केरल में एक कार्यक्रम में कहा, ‘‘विपक्ष के प्रत्याशी सुदर्शन रेड्डी वही हैं, जिन्होंने वामपंथी उग्रवाद व नक्सलवाद को समर्थन देने वाला निर्णय दिया था।

साहित्यकार
सलवा जुड़ूम के विरुद्ध निर्णय न आता, तो नक्सली आतंकवाद 2020 तक खत्म हो जाता। ये वही व्यक्ति हैं, जिन्होंने उस विचारधारा से प्रेरित होकर सर्वोच्च न्यायालय जैसे पवित्र मंच का इस्तेमाल किया था।’’ इसके बाद 25 अगस्त को उन्होंने एक साक्षात्कार में दोहराया कि “रेड्डी ने सलवा जुड़ूम को खारिज कर दिया और वनवासियों के आत्मरक्षा के अधिकार को खत्म कर दिया। इसी वजह से देश में नक्सलवाद दो दशकों से ज्यादा समय तक चला। मेरा मानना है कि वामपंथी विचारधारा ही (विपक्ष द्वारा सुदर्शन रेड्डी को चुनने का) मानदंड रही होगी।’’
18 बनाम 56 जज
गृह मंत्री की सख्त टिप्पणी के बाद सेवानिवृत्त न्यायाधीश दो खेमों में बंट गए हैं। एक ओर 18 पूर्व जजों का समूह है, जिसने अमित शाह की बातों को दुर्भाग्यपूर्ण बताया, दूसरी ओर 56 पूर्व जजों का बड़ा समूह है, जिसने गृह मंत्री के बचाव में बयान जारी किया है। इनमें पूर्व चीफ जस्टिस भी हैं। पूर्व सीजेआई पी. सदाशिवम, रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति ए.के. सिकरी व एम.आर. शाह सहित 56 पूर्व जजों ने स्पष्ट किया कि वे अपने साथी जजों की राय से असहमत हैं। उनका कहना है कि हर राजनीतिक घटनाक्रम पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता के नाम पर बयान देना सही नहीं है। जब कोई सेवानिवृत्त जज राजनीति में आता है, तो उसे राजनीतिक बहस में जवाब देना होगा। न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को असली नुकसान राजनीतिक आलोचना से नहीं, बल्कि पूर्व जजों की लगातार राजनीतिक बयानबाजी से होता है, जिससे आम जनता की नजर में उसकी तटस्थ छवि धुंधली पड़ती है।
भारत में आतंकी अफजल गुरु की फांसी से लेकर सलवा जुड़ूम तक हस्ताक्षर अभियानों की एक परंपरा बन चुकी है, जिनसे दबाव बनाने की रणनीति तो दिखती है, पर सार्थक विमर्श नहीं। राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप सामान्य हैं, लेकिन जब गृह मंत्री सीधे किसी अदालती फैसले और न्यायाधीश की भूमिका पर सवाल उठाएं तो मामला गंभीर हो जाता है। इसी संदर्भ में यह महत्वपूर्ण है कि समझा जाए-सलवा जुड़ूम क्या था? तत्कालीन जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी का निर्णय क्या कहता है? उसका प्रभाव क्या रहा और क्या सचमुच बिना अदालती हस्तक्षेप के माओवाद पहले ही खत्म हो सकता था?

नक्सल विरोधी आक्रोश
मुख्यधारा के विमर्श में गोंडी भाषा में ‘सलवा जुड़ूम’ का अर्थ है – शांति के लिए सामूहिक मार्च। यह क्यों आवश्यक हुआ, यह समझने के लिए पृष्ठभूमि देखनी होगी। 1980 के दशक से बस्तर में फैले माओवाद ने जन-जीवन को नारकीय बना दिया था। सरकारी स्कूल, डिस्पेंसरी, बुनियादी ढांचे और ग्रामीण क्षेत्रों को जोड़ने वाली सड़कों को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। कई महत्वपूर्ण राजमार्गों पर यातायात रुक गया था। ग्रामीणों से उनके देवी-देवताओं की आस्था तक छीन ली गई। तेंदूपत्ता व्यापार और वनोपज पर माओवादियों का कब्जा हो गया। ग्रामीण हाट-बाजार तक जाना मुश्किल कर दिया गया और हर घर से एक सदस्य के संगठन से जोड़ने की मांग की जाने लगी। इन परिस्थितियों ने लोगों की स्वतंत्रता को खत्म कर दिया और स्वाभाविक रूप से माओवाद के खिलाफ आक्रोश पैदा हुआ। इसकी पहली झलक अप्रैल-मई 2005 में सलवा जुड़ूम के रूप में दिखी।
बीजापुर जिले में बेदरे थाने तक पुलिस बल के लिए ट्रैक्टर से राशन पहुंचाया जाना था। सुरक्षा कारणों से जवान पैदल चल रहे थे। चालक ने अचानक रास्ता बदला और ट्रैक्टर को गांव तरीकेली की ओर मोड़ दिया। उस पर सवार जवान कूद कर अपने साथियों के पास भागा। बाद में पुलिस ने करकेली गांव से ट्रैक्टर को बरामद किया और कुछ युवकों को पकड़ कर थाने ले लाई। पीछे-पीछे ग्रामीण भी पहुंचे और कहा कि ये निर्दोष हैं, दोषी तो माओवादी हैं। फिर ग्रामीणों ने असली आरोपियों को पकड़कर पुलिस को सौंपा और साथियों को छुड़ाकर ले गए। यह घटना बस्तर जैसे माओवादी दबदबे वाले क्षेत्र में अनोखी थी। लेकिन ग्रामीण जानते थे कि अब माओवादी उन्हें ‘जन-अदालत’ में कठोर दंड देंगे। इस भय और माओवादियों के खिलाफ खड़े होने की जरूरत ने ही सलवा जुड़ूम की पृष्ठभूमि बनाई।
माओवाद के खिलाफ ग्रामीणों का असंतोष तेजी से आंदोलन में बदला और कई गांव इससे जुड़ गए। करकेली गांव (कुटरू थाना, बीजापुर) इसका केंद्र बना, जहां 4 जून, 2005 को बड़ी जनसभा हुई। इससे ग्रामीणों का हाैसला बढ़ा। 6 जून को उन्होंने छह नक्सलियों को पकड़कर पुलिस को सौंप दिया। आंदोलन को विस्तार मिला तो मजबूत नेतृत्व की जरूरत पड़ी, जिसे कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा ने संभाला। उनकी पहल पर इस अभियान को ‘सलवा जुड़ूम’ नाम मिला। डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा ने भी इसका समर्थन किया, क्योंकि इससे बस्तर को माओवादी हिंसा से मुक्त होने की आशा दिखी।
उधर, सलवा जुड़ूम के उभार से बौखलाए माओवादियों ने दक्षिण बस्तर में बड़े नरसंहारों को अंजाम दिया, जैसे-28 फरवरी, 2006 को कोंटादोरनापाल में 30 ग्रामीणों की हत्या, 28 अप्रैल, 2006 को थाना एर्राबोर के गांव मनिकुंडा में 13 लोगों की हत्या व 17 जुलाई, 2006 की रात थाना एर्राबोर परिसर में राहत शिविर पर हमला कर 32 ग्रामीणों की हत्या। निहत्थे ग्रामीण माओवादियों के सामने कमजोर थे। सरकार ने टकराव से बचने के लिए राहत शिविर बनाए, जहां बड़ी संख्या में लोग शरण लेने लगे। देखते-देखते दंतेवाड़ा जिले के 1153 गांवों में से 644 सलवा जुड़ूम से जुड़ गए।
माओवाद और सलवा जुड़ूम का टकराव इतना भयावह हो गया था कि गीदम, कोंटा, उसूर, बीजापुर,भैरमगढ़ आदि शिविरों में 46,000 से अधिक लोगों का जमावड़ा हो गया और यह संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। इस तरह जाने-अनजाने राज्य सरकार भी सलवा जुड़ूम का हिस्सा हो गई थी।

क्या था जस्टिस रेड्डी का निर्णय?
माओवाद के खिलाफ संघर्ष को तेज करने के लिए पुलिस अधिनियम-1861 के तहत लगभग 4,000 स्थानीय युवाओं को विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनाया गया। उनकी स्थानीय जानकारी और भूगोल की समझ से सुरक्षा बलों को काफी मदद मिली। सलवा जुड़ूम जहां जमीनी स्तर पर नक्सलियों को कमजोर कर रहा था, वहीं एसपीओ सुरक्षा रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे।
इसी बीच, वामपंथी संगठनों ने सलवा जुड़ूम के खिलाफ देशव्यापी अभियान चलाया और पीआईएल दायर कीं। प्रो. नंदिनी सुंदर, इतिहाकार रामचंद्र गुहा और भारत सरकार के पूर्व सचिव ई.ए.एस. शर्मा आदि की याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने 5 जुलाई, 2011 को फैसला सुनाया कि हथियारबंद जनआंदोलन या एसपीओ की नियुक्तियां असंवैधानिक हैं। न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी और न्यायमूर्ति एस.एस. निज्जर की पीठ ने एसपीओ की नियुक्ति खत्म करने और सलवा जुड़ूम को तत्काल बंद करने का आदेश दिया। निर्णय में यह आपत्ति भी की गई कि छत्तीसगढ़ पुलिस एक्ट-2007 के अंतर्गत एसपीओ नियुक्त कर उन्हें सशस्त्र नहीं किया जा सकता।
शीर्ष अदालत के फैसले से सलवा जुड़ूम खत्म हुआ और एसपीओ निःशस्त्र कर दिए गए, जिसका सीधा लाभ माओवादियों को मिला। महेंद्र कर्मा ने कहा था कि सलवा जुड़ूम के माध्यम से हम माओवादियों के विरुद्ध लड़ाई जीत जाते, लेकिन हमें ‘दिल्ली की पॉवर पॉइंट प्रस्तुतियों’ ने हरा दिया। अदालत के आदेश के बाद सलवा जुड़ूम कार्यकर्ता और एसपीओ, दोनों माओवादियों की दया पर निर्भर हो गए, जबकि प्रशासन असहाय था। विडंबना यह रही कि जहां जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से अपनी रक्षा के लिए ग्रामीणों को हथियार दिए जाते थे, वहीं बस्तर के ‘लाल आतंक’ पीड़ितों को यह अधिकार नहीं मिला।
चुन-चुन का नेताओं की हत्या
अब सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद की कुछ घटनाओं पर दृष्टि डालें। अदालत के फैसले के बाद माओवादी हमले तेज हो गए। बीजापुर के फरसेगढ़ में नक्सलियों ने दिसंबर 2011 में सलवा जुड़ूम के बड़े नेता चिन्नारमगोट्टा व उनके भाई की हत्या कर दी। 17 अप्रैल, 2012 को नक्सलियों ने आरगट्टा गांव निवासी पुनेम पोदिया के साथ आधा दर्जन ग्रामीणों को अगवा किया। ‘कंगारू अदालत’ में प्रताड़ना और आर्थिक जुर्माने के बाद कुछ ग्रामीणों को छोड़ दिया गया, लेकिन सलवा जुड़ूम में सक्रिय होने का आरोप लगाकर पुनेम की हत्या कर दी गई।
नक्सलियों की ताकत और हिम्मत इतनी बढ़ गई कि उन्होंने सुकमा जिले के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का अपहरण कर लिया। उसी वर्ष गंगालूर में सलवा जुड़ूम नेता चीका माझी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसी तरह, मई 2013 में असीरगुड़ा के सरपंच और सलवा जुड़ूम के एक और बड़े नेता सोयम मुक्का भी मारे गए। क्या कोई भूल सकता है कि सलवा जुड़ूम के बंद होने के बाद निरंकुश हो चुके नक्सलियों ने 25 मई, 2013 को क्या किया? चुनावों का दौर था। झीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन रैली पर हमला कर माओवादियों ने दर्जनों नेताओं की हत्या की। उन्होंने सलवा जुड़ूम के प्रणेता महेंद्र कर्मा की भी नृशंस हत्या कर दी और उनके शव पर नाचते रहे।
सलवा जुड़ूम का नेतृत्व खत्म होने के बाद भी माओवादियों की हिंसा नहीं रुकी, बल्कि वे और क्रूर होते गए। उन्होंने चुन-चुन कर सलवा जुड़ूम के नेताओं और उनके रिश्तेदारों की हत्या की। 2014 में सुकमा के मिलियामपल्ली गांव में कवासी हडमा, चिन्नाराम गोटा के चचेरे भाई व बीजापुर के पंचायत सचिव हिंगाराम कोडियम तथा 2017 में कवासी हडमा को निशाना बनाया। हिंगाराम को छोड़कर शेष दो सलवा जुड़ूम से जुड़े हुए थे। इसी तरह, 2023 में बीजापुर में भाजपा नेता नीलकंठ काकेम की उनकी पत्नी और बच्चों के सामने धारदार हथियार से निर्मम हत्या कर दी गई। उनका ‘अपराध’ सिर्फ सलवा जुड़ूम से जुड़ना बताया गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पति को घिरा देख उनकी पत्नी ललिता निहत्थे ही नक्सलियों से भिड़ गई थी, लेकिन नक्सलियों ने चाकू मार कर उन्हें घायल कर दिया। ये तो कुछ उदाहरण हैं। नक्सलियों द्वारा मारे गए सलवा जुड़ूम कार्यकर्ताओं और एसपीओ युवाओं की संख्या बहुत बड़ी है। आश्चर्य यह कि ऐसी हत्या पर राष्ट्रीय स्तर पर सन्नाटा रहा और उलटे माओवादियों को ‘गांधी विद गन्स’ कहकर महिमामंडित किया गया।
एसपीओ बनाम डीआरजी
माओवाद के पक्ष में झुकाव के बावजूद सरकार लगातार समाधान खोज रही थी। अदालती निर्देशों के बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने छत्तीसगढ़ सहायक सशस्त्र पुलिस बल अधिनियम-2011 पारित करा कर लागू किया, ताकि स्थानीय लोगों की भर्ती को कानूनी मान्यता मिल सके। इसी क्रम में माओवाद से लड़ाई जारी रखने के लिए 2015 में डीआरजी (District Reserve Guard) का गठन ‘मति, गति और न्यूनतम क्षति’ के सिद्धांत पर किया गया। लेकिन इसे भी अदालत में चुनौती दी गई, तर्क दिया गया कि यह एसपीओ के विरुद्ध न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी की पीठ द्वारा दिए गए फैसले की अवमानना है। बहरहाल, लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मई 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने साफ किया कि विधानमंडल द्वारा पारित कानून अवमानना नहीं माने जा सकते। इस प्रकार, अदालत ने डीआरजी को वैध माना।
अब सलवा जुड़ूम और एसपीओ पर न्यायमूति रेड्डी के फैसले के आलोक में एसपीओ की तुलना डीआरजी से करते हैं। सलवा जुड़ूम के बाद जो एसपीओ बना, उसमें स्थानीय युवक थे। उनमें कुछ नक्सली जीवन छोड़ चुके थे, तो कुछ सलवा जुड़ूम में सक्रिय रहने के कारण माओवादियों के निशाने पर आ गए थे। कारण, सरकार द्वारा प्रशिक्षण के बाद स्थानीय युवाओं को एसपीओ में शामिल करने से नक्सल विरोधी अभियान को मजबूती मिली थी। उनकी जानकारी और साहस ने माओवादियों को हिला दिया था। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से उसे भंग कर दिया गया। आज उसकी जगह डीआरजी है, जिसमें अधिकतर आत्मसमर्पित माओवादी शामिल हैं। यह बल इतना प्रभावी साबित हुआ कि इनके अभियान में प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) का महासचिव बसवराजू भी मारा गया। खुद बसवराजू ने अपनी डायरी में अपने कैडर को चेताया था, “प्रिय काॅमरेड, जहां भी हो छुप जाओ, …डीआरजी ढूंढकर मार देगी।”
डीआरजी की सफलता बताती है कि यदि एसपीओ बने रहते तो उनकी सूचनाओं और नेटवर्क से सुरक्षा बलों को नक्सलियों की सूचना मिलती रहती। वे शक्तिशाली मुखबिर तंत्र थे, जो माओवाद पर दमदार प्रहार करने में सक्षम थे। इसी तथ्य की विवेचना के बाद यदि गृह मंत्री को लगता है कि नक्सलवाद को 2020 से पहले समाप्त किया जा सकता था, तो बात तथ्यपरक लगती है।
















