भारत का उत्थान ही संघ का उद्देश्य
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होम भारत

रा.स्व.संघ के 100 वर्ष : ‘भारत का उत्थान ही संघ का उद्देश्य’

RSS अपनी स्थापना का शताब्दी वर्ष मना रहा है। इस अवसर पर नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत की 26-28 अगस्त तक तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। इसका विषय था – ‘100 वर्ष की संघ यात्रा : नए क्षितिज’।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 30, 2025, 12:55 pm IST
in भारत, विश्लेषण, संघ @100, दिल्ली
भारत माता का पूजन करते हुए सरसंघचालक श्री मोहन भागवत और श्री दत्तात्रेय होसबाले

भारत माता का पूजन करते हुए सरसंघचालक श्री मोहन भागवत और श्री दत्तात्रेय होसबाले

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना का शताब्दी वर्ष मना रहा है। इस अवसर पर नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत की 26-28 अगस्त तक तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। इसका विषय था – ‘100 वर्ष की संघ यात्रा : नए क्षितिज’। इस अवसर पर मंच पर सरसंघचालक के साथ सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले, क्षेत्र संघचालक श्री पवन जिंदल और प्रांत संघचालक डाॅ. अनिल अग्रवाल उपस्थित थे। व्याख्यानमाला में पहले दिन एवं दूसरे दिन सरसंघचालक ने व्याख्यान दिया तथा तीसरे दिन ‘जिज्ञासा समाधान सत्र’ का आयोजन किया गया। यहां व्याख्यानमाला के संपादित अंश दिए जा रहे हैं-

संघ को लेकर अनेक चर्चाएं होती हैं, लेकिन उनमें तथ्यात्मक जानकारी का अभाव रहता है। संघ का उद्देश्य किसी को ‘कन्विंस’ करना नहीं, बल्कि सत्य को सामने रखना है। 2018 में भी इसी स्थान पर संवाद कार्यक्रम हुआ था, जिससे कई गलतफहमियां दूर हुईं। अब शताब्दी समारोहों के अंतर्गत चार स्थानों पर ऐसे संवाद आयोजित किए जा रहे हैं, ताकि अधिक लोग सीधा संवाद कर सकें। इस बार विशेष रूप से 70-75 प्रतिशत नए लोगों को आमंत्रित किया गया है।

संघ की 100 साल की यात्रा सिर्फ संगठन चलाने की कहानी नहीं, बल्कि एक उद्देश्य की परिणति है। अनेक बाधाओं के बावजूद स्वयंसेवकों ने इसे इसलिए आगे बढ़ाया, क्योंकि उनका ध्येय ‘भारत माता की जय’ है। लक्ष्य है कि भारत विश्व में अग्रणी स्थान पाए- प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं, बल्कि अपने सत्य और योगदान के कारण।

आज दुनिया एक-दूसरे के बहुत करीब आ गई है, इसलिए अब वैश्विक स्तर पर सोचना जरूरी हो गया है। मानवता एक होते हुए भी उसके अनेक रूप और रंग हैं और इन्हीं विविधताओं से विश्व की सुंदरता बढ़ती है। स्वामी विवेकानंद के शब्दों में, ‘प्रत्येक राष्ट्र का एक मिशन होता है और उसे दुनिया में अपना योगदान देना होता है।’ भारत का भी अपना विशेष योगदान है। किसी देश का बड़ा होना उसके अहंकार हेतु नहीं, बल्कि इसलिए आवश्यक है कि उसके माध्यम से विश्व के जीवन में नई गति और सकारात्मक योगदान आए। संघ का अस्तित्व और प्रयोजन भी इसी से जुड़ा है-भारत को उसकी भूमिका निभाने योग्य बनाना। भारत जब विश्वगुरु बनेगा, तभी वह अपना वास्तविक योगदान मानवता को दे पाएगा और अब उसका समय आ गया है।

पहले दिन के सत्र में मंच पर (बाएं से) श्री पवन जिंदल, श्री मोहन भागवत, श्री दत्तात्रेय होसबाले व डॉ. अनिल अग्रवाल

क्यों हुई संघ की स्थापना?

“संघ क्यों शुरू हुआ, कैसे बाधाओं के बीच स्वयंसेवकों ने इसे आगे बढ़ाया और आज सौ साल बाद भी नए क्षितिज की बात क्यों हो रही है, इसका उत्तर एक वाक्य में है। प्रार्थना के अंत में हम कहते हैं ‘भारत माता की जय’। अपना देश है, उसकी जय-जयकार होनी चाहिए और उसे विश्व में अग्रगण्य स्थान मिलना चाहिए।” डॉ. हेडगेवार जी ने अनुभव किया कि समाज निर्माण की दिशा में किसी के पास समय नहीं था, इसलिए उन्होंने स्वयं पहल की। संघ का विचार उनके मन में कई वर्षों पहले आया था और 1925 की विजयादशमी को इसकी औपचारिक घोषणा की गई। डॉ. हेडगेवार जी का मानना था कि संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन ही राष्ट्र निर्माण का आधार है। जो अपने नाम के साथ ‘हिंदू’ जोड़ता है, वह देश व समाज के प्रति जिम्मेदार बनता है। ‘हिंदू’ शब्द बाहरी पहचान का प्रतीक नहीं, बल्कि व्यापक मानवशास्त्रीय दृष्टिकोण है। भारत की परंपरा व्यक्ति, समाज और सृष्टि को एक-दूसरे से जुड़ा और प्रभावित मानती है।

डॉ. हेडगेवार जी के अनुसार, मनुष्य का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब वह व्यक्तिगत उन्नति के साथ समाज और सृष्टि के विकास को भी अपनाए। इस देश में हिंदू, सिख और बौद्ध आपस में संघर्ष नहीं करेंगे, बल्कि राष्ट्र के लिए जिएंगे और बलिदान देंगे। नेता, नीति और पार्टी सहायक तत्व हैं, किंतु मूल कार्य समाज का परिवर्तन है। भारत माता ने अपने बच्चों को संस्कार दिए हैं, जिनके लिए पूर्वजों ने बलिदान दिए। वही पूर्वज संघ के प्रेरणा केंद्र हैं। उन्होंने कहा कि हिंदुओं के अलग-अलग प्रकार हैं-कुछ गर्व से इसे मानते हैं, कुछ सामान्य मानते हैं और कुछ किसी कारणवश स्वीकार नहीं करते।

प्रेरणा के सूत्र

स्वतंत्रता मिलने के बाद समाज को जिस प्रकार प्रबोधित करना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ। रूढ़ियां, कुरीतियां, अंधविश्वास और शिक्षा का अभाव बने रहे। अनेक सुधार आंदोलनों और स्वामी दयानंद–विवेकानंद जैसे महापुरुषों के प्रयासों से चेतना तो जागी, पर समाज पूरी तरह नहीं बदला। 1857 का संघर्ष, क्रांतिकारी धारा, राजनीतिक आंदोलन और सामाजिक सुधार आंदोलन—इन चारों धाराओं का प्रभाव भारत पर आज भी है। इसी सच्चाई ने डॉ. हेडगेवार को प्रेरित किया। वे जन्मजात देशभक्त थे। वे बचपन में ही अनाथ हो गए, दरिद्रता का सामना किया, लेकिन देशभक्ति की चिंगारी उनके मन में हमेशा रही। विद्यार्थी जीवन में पढ़ाई में अव्वल रहते हुए भी उन्होंने आंदोलन में भाग लिया।

रा.स्व.संघ के 100 वर्ष : इतिहास की देहरी पर यह संवाद

1905-06 के वंदे मातरम् आंदोलन में उन्होंने नागपुर के स्कूल विद्यार्थियों का नेतृत्व किया। तब स्कूल निरीक्षण के समय हर कक्षा में ‘वंदे मातरम्’ गाया जाता था। अंग्रेजी प्रशासन ने नाराज होकर स्कूल बंद कर दिए। बाद में समझौता हुआ, लेकिन डॉ. हेडगेवार और एक साथी ने माफी मांगने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि भारत माता और वंदे मातरम् हमारी श्रद्धा के विषय हैं, यह सपनों में भी नकारा नहीं जा सकता।

मैट्रिक के बाद नागपुर के नेताओं ने उन्हें कलकत्ता भेजा ताकि वे मेडिकल की पढ़ाई करें और क्रांतिकारी अनुशीलन समिति से जुड़ सकें। डॉ. हेडगेवार का उल्लेख त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती और रासबिहारी बोस की पुस्तकों में मिलता है। उनका कोड नेम ‘कोकेन’ था। कई घटनाओं में उनका नाम सामने आया और अंग्रेजी खुफिया विभाग सक्रिय रहा। हालांकि बाद में क्रांतिकारी आंदोलन कमजोर हो गया और अंग्रेजों ने उसे दबा दिया। मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें बर्मा में 3,000 रुपये मासिक की नौकरी मिल रही थी। लेकिन उन्होंने कहा कि वे नौकरी करने के लिए नहीं आए, उनका उद्देश्य देश की सेवा है। इसी संकल्प के साथ वे नागपुर लौट आए और राष्ट्र के लिए समर्पित जीवन की राह चुनी।

डॉ. हेडगेवार से उनके चाचा ने विवाह के विषय में पूछा तो पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि उनका जन्म केवल देश के लिए समर्पित है। उन्होंने प्रतिज्ञा ली थी कि व्यक्तिगत सुख का विचार अगले जन्म में करेंगे। डॉ. हेडगेवार जी ने कांग्रेस के आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। 1920 में आंदोलन के प्रचार के दौरान उनके भाषणों पर मुकदमा चला। अदालत में उन्होंने स्वयं अपना बचाव प्रस्तुत किया और कहा कि अंग्रेजों का भारत पर शासन किस अधिकार से है? स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। इसी कारण उन्हें एक वर्ष सश्रम कारावास की सजा हुई।

डॉ. हेडगेवार जी ने क्रांतिकारी आंदोलन, राजनीतिक जागरण, समाज सुधार और धर्म जागरण-सभी धाराओं में निस्वार्थ भाव से कार्य किया। उन्होंने कार्यपद्धति, समाज की स्थिति और नेतृत्व की भूमिका का गहन अनुभव प्राप्त किया। यही अनुभव आगे चलकर संघ स्थापना में उनके लिए आधार बना। संघ की स्थापना के बाद भी वे समाज आंदोलनों से जुड़े रहे। 1930 के जंगल सत्याग्रह में उन्होंने सरसंघचालक पद छोड़कर आंदोलन में भाग लिया और एक वर्ष का कारावास भोगा। बाद में संघ का नेतृत्व पुनः संभाला। इस दौरान उनकी मुलाकात सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और राजगुरु जैसे नेताओं से हुई। इस दौरान चर्चाओं से उन्हें यह स्पष्ट हुआ कि केवल आंदोलन, संगठन या नेता ही पर्याप्त नहीं हैं। समाज की कुरीतियां और दोष दूर किए बिना स्वतंत्रता स्थायी नहीं हो सकती। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि समाज की गुणात्मक उन्नति ही राष्ट्र निर्माण का मूल है।

श्री अरविंद, गांधीजी और रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे महान विचारकों ने भी कहा था कि राष्ट्र की जागृति राजनीति से नहीं, बल्कि समाज में शुद्ध चरित्र वाले नायकों के निर्माण से होगी। डॉ. हेडगेवार ने अनुशीलन समिति और भारत सेवाश्रम संघ जैसे संगठनों से प्रेरणा लेकर समाज निर्माण के प्रयोग किए। उनका उद्देश्य था-कैसे संपूर्ण देश को जोड़ा जाए और प्रत्येक व्यक्ति में गुणवत्ता विकसित की जाए। यह चिंतन और प्रयोग कई वर्षों तक चला और धीरे-धीरे एक ठोस रूप में सामने आया।

डॉ. हेडगेवार जी ने अपने साथियों के साथ गहन चर्चा की और 1925 में विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की घोषणा की। यह संघ केवल संगठन नहीं, बल्कि समाज को गुणात्मक रूप से बदलने और राष्ट्र को सशक्त बनाने का एक उपाय था। आज संघ की यह यात्रा 100 वर्ष पूरे कर रही है।

हिंदू शब्द का अर्थ और जिम्मेदारी

यदि कोई स्वयं को हिंदू कहता है, तो इसका अर्थ केवल एक पहचान नहीं, बल्कि इस देश के प्रति जिम्मेदारी का भाव भी है। ‘हिंदू’ नाम जिम्मेदारी का प्रतीक है। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि जरथुष्ट्र के काल में बाहर के लोगों ने भारतीयों को ‘हिंदू’ कहा। वास्तव में हमें अलग नाम की आवश्यकता नहीं थी। हमारे धर्मशास्त्र का नाम ‘मानव धर्मशास्त्र’ था, क्योंकि भारतीय परंपरा का मूल विचार ही था-‘वसुधैव कुटुम्बकम्’।

एक कथा के अनुसार, ईरान के लोग सिंधु नदी के पार रहने वालों को ‘सिंदु’ कहते थे, जो बाद में ‘हिंदू’ बना। दूसरी कथा के अनुसार, ईरानियों ने इस्राएलियों से कहा कि उनका एक हिंदू गुरु है। यह शब्द व्यापार के जरिए पश्चिमी तट पर पहुंचा और धीरे-धीरे लोकप्रचलन में आया। ‘हिंदू’ शब्द लोकभाषा में बहुत बाद में आया। संतों की वाणी में यह शब्द पहली बार मिलता है। गुरु नानकदेव जी ने बाबर के अत्याचारों का उल्लेख करते हुए ‘हिंदुस्थान’ शब्द का प्रयोग किया। उस समय ‘मुसलमान’ का आशय था-अल्लाह, कुरान और पैगंबर को मानने वाले। वहीं, ‘हिंदू’ किसी एक आस्था या ग्रंथ से सीमित नहीं था। इसमें बौद्ध, जैन, शैव, शाक्त व वैष्णव परंपराएं समाहित थीं।

हिंदू समाज की विशेषता है-सबको स्वीकार करना। सभी पंथ और पूजा-पद्धतियों को समान मान्यता मिली, यह विश्वास रहते हुए कि सभी मार्ग अंततः ईश्वर तक ही ले जाते हैं। ऋ षियों ने कहा-‘ऋ जु कुटिल नाना पन्थाः, परं गत्येकम्’ अर्थात् मार्ग अनेक हो सकते हैं, पर लक्ष्य एक ही है। जैसे, वर्षा का जल समुद्र में मिलता है, वैसे ही सभी साधनाएं परमात्मा तक जाती हैं।

हिंदू वह है, जो अपने मार्ग पर श्रद्धा रखे, दूसरों का सम्मान करे और सभी के साथ मिलकर चले। यही भारत की आत्मा और संस्कृति है। भारत का भूगोल सुरक्षित था, इसलिए जीवन सहज और समृद्ध था। पश्चिमी दुनिया में ‘स्ट्रगल फॉर एग्जिस्टेंस’ और ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ की स्थिति रही, लेकिन यहां संघर्ष नहीं, यहां संघर्ष नहीं, बल्कि सहयोग और आत्मचिंतन की परंपरा विकसित हुई। भारतीय संस्कृति का स्वभाव संघर्ष नहीं, बल्कि समन्वय है।

भारत माता केवल पालन करने वाली नहीं, बल्कि संस्कार देने वाली माता है। हमारे पूर्वजों ने इस भूमि के संरक्षण और संवर्धन के लिए बलिदान दिए। वही इतिहास और आदर्श आज हमारी प्रेरणा हैं। हिंदू समाज के चार प्रकार हैं-
1. जो जानते हैं कि वे हिंदू हैं और गौरव भी मानते हैं।
2. जो जानते हैं कि वे हिंदू हैं, लेकिन गौरव नहीं मानते।
3. जो जानते हैं, लेकिन कहते नहीं।
4. जो जानते ही नहीं कि वे हिंदू हैं।
ऐसे लोगों को भारतीय, सनातनी या हिंदवी कहने से आपत्ति नहीं होती। ‘हिंदू’ शब्द केवल नाम नहीं, बल्कि भारत माता की भक्ति, पूर्वजों की परंपरा और साझा सांस्कृतिक इतिहास का प्रतीक है। यह हमारी जीवनशैली और संस्कृति को पूर्णता से अभिव्यक्त करता है। भारतीय संस्कृति की विशेषता विविधता में एकता है-यह मानती है कि एकरूपता के बिना भी एकता संभव है। विभिन्न रूप और परंपराएं होते हुए भी अलगाव की भावना नहीं है। पहला कदम उन लोगों को संगठित करना है जो स्वयं को हिंदू कहते हैं, उसके बाद सहज ही पूरा समाज जुड़ जाएगा। यही संपूर्ण हिंदू समाज के संगठन का मार्ग है। ‘हिंदू’ का आग्रह किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि सबको जोड़ने के लिए है। इसका अर्थ समावेशी और सार्वभौमिक दृष्टिकोण है, जिसकी मर्यादा परिवार से लेकर संपूर्ण विश्वमानवता तक विस्तारित है।

संघ और स्वयंसेवकों की भूमिका

केवल तैयारी पर्याप्त नहीं, उसका समाजहित में उपयोग जरूरी है। इसलिए संघ की कार्यपद्धति दो भागों में है-पहला, संस्कारित मनुष्य तैयार करना और दूसरा उन तैयार मनुष्यों से समाजहित के कार्यों में लगाना। संघ स्वयं प्रत्यक्ष कार्य नहीं करता, बल्कि उसके स्वयंसेवक विभिन्न क्षेत्रों में जाकर अपनी विशेषज्ञता से सकारात्मक बदलाव लाते हैं। जैसे, भारतीय मजदूर संघ ने श्रमिक जगत में नया दृष्टिकोण दिया। स्वयंसेवकों द्वारा बनाए संगठन स्वतंत्र और स्वायत्त होते हैं। संघ केवल विचार और संस्कार का स्रोत है। वह इन संगठनों का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नियंत्रण नहीं करता। स्वयंसेवक कहीं भी हों, संघ से उनका भावनात्मक संबंध अटूट रहता है। संघ सहयोग करता है, पर दबाव नहीं डालता-निर्णय स्वयंसेवक अपने विवेक और अनुभव से लेते हैं। संघ की शिक्षा है- “मतभेद हों, लेकिन मनभेद न हों।” संगठन का उद्देश्य सबको साथ लेकर चलना है। धीरे-धीरे ये संगठन स्वावलंबी बन जाते हैं और समाज में सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। 30-40 साल पहले जो लोग संघ के विरोधी थे, वे आज समर्थक हो सकते हैं। अलग मत होना अपराध नहीं है, बल्कि यही प्रगति का आधार है। विविध विचारों को सुनकर ही सहमति और विकास संभव है। अंग्रेजी में कहा गया है-
– Coming together is beginning.
– Standing together is progress.
– Working together is success.
यही संगठन का सार है और यही समाज की प्रगति का मार्ग है। देश की जिम्मेदारी केवल नेता, पार्टी या सरकार की नहीं है। यह संपूर्ण समाज की है। जैसे हम होंगे, वैसे ही हमारे प्रतिनिधि, नेता और पार्टियां होंगी। इसलिए हमें स्वयं को अच्छा बनाना होगा और अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। संघ का मानना है कि देश के कल्याण के लिए संपूर्ण समाज का संगठन आवश्यक है। इसीलिए हमारी प्रार्थना में कहा जाता है-“विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्”। कार्यशक्ति हमारी संगठित शक्ति के आधार पर होगी-यानी संपूर्ण हिंदू समाज की।

कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य लोग उपिस्थित रहे

‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा और संघ में समर्पण

हम सभी हिंदू राष्ट्र के अंग हैं, इसलिए पूरे समाज का दायित्व है कि वह संगठित और आदर्श बने। हमारी संगठित कार्यशक्ति ही राष्ट्र की वास्तविक शक्ति है। भारत का राष्ट्र सत्ता या राज्य से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक एकता से जुड़ा है। इसलिए चाहे सत्ता बदलती रही हो, चाहे अंग्रेज हों, तुर्क-अरब हों या अन्य विदेशी शासन- हमारा राष्ट्र कभी समाप्त नहीं हुआ। हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पश्चिमी ‘नेशन-स्टेट’ से भिन्न है। हिंदू राष्ट्र का अर्थ किसी के विरोध में नहीं, बल्कि समावेश और समान न्याय में है। संघ भी किसी प्रतिक्रिया से उत्पन्न नहीं हुआ, उसका ध्येय केवल समाज का संगठन है। यह संगठन किसी विशेष समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि समाज को मजबूत बनाने के लिए है। जैसे व्यायाम का उद्देश्य शरीर को स्वस्थ रखना है, युद्ध करना नहीं-वैसे ही संगठन का उद्देश्य समाज को मजबूत बनाना है, न कि किसी से संघर्ष करना।

संघ की स्थापना के समय डॉ. हेडगेवार ने कहा था कि संगठन तीन अवस्थाओं से गुजरता है-उपेक्षा, विरोध और स्वीकार्यता। शुरुआती दौर में लोग संघ और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को नकारते थे। प्रचारक बिना साधनों के समाज में गए-जैसे भागलपुर में एक प्रचारक मात्र सवा रुपया लेकर पहुंचे और भुना चना बेचने वाले की मदद से जीवनयापन करते हुए कार्य आगे बढ़ाया। संघ ने कठिन परिस्थितियों में भी समाज संगठन का कार्य जारी रखा, जिससे समाज में बड़े बदलाव आए हैं। स्वयंसेवकों को समाज से सहयोग मिलता रहा-एक बाल स्वयंसेवक की माताजी ने प्रचारक के भोजन की जिम्मेदारी उठाई।

समय-समय पर कड़े विरोध और झूठे आरोप भी लगे। 1948 में गुरुजी के घर पर हमला हुआ, लेकिन उन्होंने स्वयंसेवकों को रोका और कहा-“यह अपना ही समाज है। यदि सराहे तो अच्छा है, यदि मारे तो मेरा रक्त बहेगा, समाज का नहीं।” समाज ने जैसे संभाला, वैसे संघ कार्यकर्ता आगे बढ़ते रहे। संघ को लंबे समय तक कड़े विरोध और झूठे आरोपों का सामना करना पड़ा। यहां तक कि 1948 में गुरुजी के घर पर हमला हुआ। लेकिन गुरुजी ने स्वयंसेवकों को रोक दिया और कहा, “यह अपना ही समाज है। यह समाज जब अपने को सराहता है तो अच्छा लगता है। वही अगर मारने आता है तो मेरे घर के आंगन में मेरा रक्त बहेगा, समाज का रक्त नहीं बहेगा। आप सब लोग वापस जाइए।”

संघ कार्य का आधार न विरोध है, न प्रतिक्रिया, बल्कि शुद्ध सात्त्विक प्रेम और करुणा है। इसी भाव से विविधता में एकता देखी जाती है। संघ केवल हिंदू समाज के लिए नहीं, बल्कि ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के सिद्धांत पर चलता है। स्वयंसेवक परिवार से लेकर गांव, देश और विश्व तक अपनेपन की भावना का विस्तार करते हैं। उनका विश्वास है कि सब अपने हैं। यही जीवन और विश्व विकास का क्रम है। संघ की शुरुआत केवल कुछ स्वयंसेवकों की निष्ठा, श्रद्धा और विश्वास से हुई और इसी आधार पर वह आगे बढ़ा।

संघ की विशेषता है कि इसे स्वयंसेवक ही चलाते हैं। हम परावलंबी नहीं, पूर्णतः स्वावलंबी हैं। रेडीमेड कार्यकर्ता नहीं लिए गए, बल्कि शाखाओं के माध्यम से स्वयं कार्यकर्ता तैयार किए गए। संघ में चंदा या दान की बजाय गुरु दक्षिणा की परंपरा है। स्वयंसेवकों का यह व्यक्तिगत समर्पण है। बच्चे तक अपनी आदतें बदलकर सालभर पैसे बचाते हैं और गुरु दक्षिणा के रूप में अर्पित करते हैं।

नौवीं में पढ़ने वाला शामू पवार स्वयंसेवक था। उसके माता-पिता मजदूर थे। गुरु दक्षिणा में उसके गण ने तय किया कि प्रत्येक स्वयंसेवक को 21 रुपये गुरु दक्षिणा देनी चाहिए। उसने माताजी से मूंगफली बनवाई- सॉल्टेड पीनट्स, जिसे महीने तक उसने इंटरवल में सिनेमा टॉकीज में जाकर बेचा व 21 रुपये जमाकर गुरु दक्षिणा में समर्पित किए। मैं बचपन में शाखा में जाता था तो वहां एक डिब्बा रखा रहता था। स्वयंसेवक घर से बड़ी राशि नहीं ला सकते थे, लेकिन कभी-कभार मेहमान आने पर मिले पैसे या पुराने छेद वाले तांबे के सिक्के उसमें डाल देते थे। इन्हीं छोटे-छोटे योगदानों से संघ की स्वावलंबी परंपरा बनी। नागपुर का रेशिमबाग परिसर, डॉक्टर हेडगेवार का स्मृति मंदिर या दिल्ली का कार्यालय-ये सभी स्वयंसेवकों के त्याग और समर्पण से बने हैं। इसी स्वावलंबन ने संघ को मजबूत आधार दिया है।

संघ का आधार विरोध या बैर नहीं, बल्कि आत्मीयता और प्रेम है-“ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर; वास्तव में सब अपने हैं।” आज संघ जिस स्थान पर पहुंचा है, वह स्वयंसेवकों की निष्ठा, तपस्या और अनगिनत त्याग-बलिदानों का परिणाम है। उनके प्रति मन में गहरी श्रद्धा है, जिसका वर्णन शब्दों में संभव नहीं। संघ को आगे ले जाना है, क्योंकि भारत को खड़ा करना है। भारत का उत्थान ही संघ का
उद्देश्य है।

‘स्वेच्छा से हो अंतरराष्ट्रीय व्यापार’

समाज और जीवन में संतुलन ही धर्म है, जो किसी भी अतिवाद से बचाता है। भारत की परंपरा इसे मध्यम मार्ग कहती है और यही आज की दुनिया की सबसे बड़ी आवश्यकता है। दुनिया के समक्ष उदाहरण बनने के लिए समाज परिवर्तन की शुरुआत घर से करनी होगी। इसके लिए संघ ने पंच परिवर्तन बताए हैं- कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्व-बोध (स्वदेशी) और नागरिक कर्तव्यों का पालन। आत्मनिर्भर भारत के लिए स्वदेशी को प्राथमिकता दें तथा भारत का अंतरराष्ट्रीय व्यापार केवल स्वेच्छा से होना चाहिए, किसी दबाव में नहीं। संघ का कार्य शुद्ध सात्त्विक प्रेम और समाजनिष्ठा पर आधारित है। संघ का स्वयंसेवक कोई व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा नहीं रखता। यहां ‘इंसेंटिव’ नहीं है, बल्कि ‘डिसइंसेंटिव’ अधिक हैं। स्वयंसेवक निस्वार्थ सेवा करता है। स्वयंसेवक समाज-कार्य में आनंद का अनुभव करते हुए कार्य करते हैं। जीवन की सार्थकता और मुक्ति की अनुभूति इसी सेवा से होती है। सज्जनों से मैत्री करना, दुष्टों की उपेक्षा करना, कोई अच्छा करता है तो आनंद प्रकट करना, दुर्जनों पर भी करुणा करना-यही संघ का जीवन मूल्य है।

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हिंदुत्व क्या है

हिंदुत्व सत्य, प्रेम और अपनापन है। हमारे ऋ षि-मुनियों ने हमें सिखाया कि जीवन अपने लिए नहीं है। यही कारण है कि भारत को दुनिया में बड़े भाई की तरह मार्ग दिखाने की भूमिका निभानी है। इसी से विश्व कल्याण का विचार जन्म लेता है।

दुनिया की दिशा

दुनिया कट्टरता, कलह और अशांति की ओर जा रही है। पिछले 350 वर्ष में उपभोगवादी और जड़वादी दृष्टि के कारण मानव जीवन की भद्रता क्षीण हुई है। महात्मा गांधी ने सात सामाजिक पाप बताए थे —बिना श्रम की संपत्ति, विवेकहीन भोग, चरित्रहीन ज्ञान, नैतिकता विहीन व्यापार, मानवता विहीन विज्ञान, त्यागहीन धर्म और सिद्धांतहीन राजनीति। आज ये सातों पाप संसार में सर्वत्र बढ़ रहे हैं। उपाय क्या है?

धर्म का मार्ग अपनाना होगा

आज दुनिया में समन्वय का अभाव है और दुनिया को अपना नजरिया बदलना होगा। दुनिया को धर्म का मार्ग अपनाना होगा। पूजा-पाठ और कर्मकांड से परे धर्म है। सभी प्रकार के ‘रिलिजन’ से ऊपर धर्म है। धर्म हमें संतुलन सिखाता है। हमें भी जीना है, समाज को भी जीना है और प्रकृति को भी जीना है। धर्म ही मध्यम मार्ग है जो अतिवाद से बचाता है। धर्म का अर्थ है मर्यादा और संतुलन के साथ जीना। इसी दृष्टिकोण से ही विश्व शांति स्थापित हो सकती है। ‘धर्म वह है, जो हमें संतुलित जीवन की ओर ले जाए, जहां विविधता को स्वीकार किया जाता है और सभी के अस्तित्व को सम्मान दिया जाता है।’ यही विश्व धर्म है और हिंदू समाज को संगठित होकर इसे विश्व के सामने प्रस्तुत करना होगा।

विश्व की वर्तमान स्थिति और उपाय

विश्व में शांति, पर्यावरण और आर्थिक असमानता पर चर्चा तो हो रही है, उपाय भी सुझाए जा रहे हैं, लेकिन समाधान दूर दिखाई देता है। इसके लिए प्रामाणिकता से सोचना होगा और जीवन में त्याग तथा बलिदान लाना होगा। संतुलित बुद्धि और धर्म दृष्टि का विकास
करना होगा।

भारत ने नुकसान में भी संयम बरता

हमने हमेशा अपने नुकसान की अनदेखी करते हुए संयम रखा है। जिन लोगों ने हमें नुकसान पहुंचाया, उन्हें भी संकट में मदद दी है। व्यक्ति और राष्ट्रों के अहंकार से शत्रुता पैदा होती है, लेकिन अहंकार से परे हिंदुस्थान है। भारतीय समाज को अपने आचरण से दुनिया में उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। आज समाज में संघ की साख पर विश्वास है। संघ जो कहता है, उसे समाज सुनता है। यह विश्वास सेवा और समाजनिष्ठा से अर्जित हुआ है।

भविष्य की दिशा

संघ का उद्देश्य है कि सभी स्थानों, वर्गों और स्तरों पर संघ कार्य पहुंचे। साथ ही समाज में अच्छा काम करने वाली सज्जन शक्ति आपस में जुड़े। इससे समाज स्वयं संघ की ही तरह चरित्र निर्माण और देशभक्ति के कार्य को करेगा। इसके लिए हमें समाज के कोने-कोने तक पहुंचना होगा। भौगोलिक दृष्टि से सभी स्थानों और समाज के सभी वर्गों एवं स्तरों में संघ की शाखा पहुंचानी होगी। सज्जन शक्ति से हम संपर्क करेंगे और उनका आपस में भी संपर्क कराएंगे।

संघ मानता है कि हमें समाज में सद्भावना लानी होगी और समाज के प्रबुद्ध वर्ग से निरंतर मिलना होगा। इनके माध्यम से एक सोच विकसित करनी होगी। वे अपने समाज के लिए काम करें, उसमें हिन्दू समाज के अंग होने का अनुभव पैदा हो और वे भौगोलिक परिस्थितियों से जुड़ी चुनौतियों का स्वयं समाधान ढूंढे। दुर्बल वर्गों के लिए काम करें। संघ ऐसा करके समाज के स्वभाव में परिवर्तन लाना चाहता है। बाहर से आई आक्रामकता के कारण मजहबी विचार भारत में आए। किसी कारण से उन्हें कुछ लोगों ने स्वीकार किया। वे लोग यहीं के हैं, लेकिन विदेशी विचारधारा होने के कारण जो दूरियां बनीं, उन्हें मिटाने की ज़रूरत है। हमें दूसरे के दर्द को समझना होगा। एक देश, एक समाज और एक राष्ट्र के अंग होने के नाते, विविधताओं के बावजूद, समान पूर्वजों और साझा सांस्कृतिक विरासत के साथ आगे बढ़ना होगा। यह सकारात्मकता और सद्भाव के लिए आवश्यक है। इसमें भी हम समझ-बूझकर एक-एक कदम आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं।

आर्थिक प्रगति के नए रास्ते

छोटे-छोटे प्रयोग हुए हैं, लेकिन अब राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक प्रतिमान गढ़ना होगा। हमें एक ऐसा विकास मॉडल प्रस्तुत करना होगा, जिसमें आत्मनिर्भरता, स्वदेशी और पर्यावरण का संतुलन हो, ताकि वे विश्व के लिए उदाहरण बने। “नदियां, पहाड़ और लोग वही हैं, केवल नक्शे पर लकीरें खींची गई हैं। विरासत में मिले मूल्यों से सबकी प्रगति हो, इसके लिए उन्हें जोड़ना होगा। पंथ और संप्रदाय अलग हो सकते हैं, पर संस्कारों पर मतभेद नहीं है।

पंच परिवर्तन–अपने घर से शुरुआत

दुनिया में परिवर्तन लाने से पहले हमें अपने घर से समाज परिवर्तन की शुरुआत करनी होगी। इसके लिए संघ ने पंच परिवर्तन बताए हैं, कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्व की पहचान तथा नागरिक कर्तव्यों का पालन। हंसते-हंसते हमारे पूर्वज फांसी पर चढ़ गए, लेकिन आज आवश्यकता है कि हम 24 घंटे देश के लिए जिए। हर हाल में संविधान और नियमों का पालन करना चाहिए। यदि कोई उकसावे की स्थिति हो तो न टायर जलाएं, न पत्थर फेंकें। उपद्रवी तत्व ऐसे कार्यों का लाभ उठाकर हमें तोड़ने का प्रयास करते हैं। हमें कभी उकसावे में आकर अवैध आचरण नहीं करना चाहिए। छोटी-छोटी बातों में भी देश और समाज का ध्यान रखकर अपना काम करना चाहिए। भारत को आत्मनिर्भरता की दिशा में ठोस कदम बढ़ाने होंगे और इसके लिए स्वदेशी को प्राथमिकता देनी होगी। अंत में सरसंघचालक जी ने कहा कि संघ ‘क्रेडिट बुक’ में नहीं आना चाहता। संघ चाहता है कि भारत ऐसी छलांग लगाए कि उसका कायापलट तो हो ही, पूरे विश्व में सुख और शांति कायम हो जाए।

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