'भारत हिन्दू राष्ट्र है, किसी घोषणा की जरूरत नहीं' : RSS सरसंघचालक जी ने संघ में महिलाओं की भूमिका की स्पष्ट
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‘भारत हिन्दू राष्ट्र है, किसी घोषणा की जरूरत नहीं’ : RSS सरसंघचालक जी ने संघ में महिलाओं की भूमिका की स्पष्ट

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने दिल्ली में आयोजित "जिज्ञासा समाधान" सत्र में विकसित भारत 2047, मीडिया और संघ, संघ और महिला, और संघ के आगामी लक्ष्य को लेकर दिए स्पष्ट जबाव

Written byShivam DixitShivam Dixit
Aug 30, 2025, 03:42 am IST
inभारत, संघ @100, दिल्ली
100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज कार्यक्रम में RSS सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी

100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज कार्यक्रम में RSS सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी

नई दिल्ली । संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के तृतीय और अंतिम दिवस पर ‘जिज्ञासा समाधान’ कार्यक्रम में विकसित भारत 2047, मीडिया और संघ, संघ और महिला, और संघ का आगामी लक्ष्य से सम्बंधित प्रश्नों के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने उत्तर दिए।

प्रश्न – विकसित भारत 2047 के लिए हमारे देश को क्या अपनाना चाहिए? इसमें संघ की क्या भूमिका हो सकती है?

  • वेब सीरीज़ में बेमेल संबंधों और अप्रिय आपराधिक प्रवृत्तियों के दुष्प्रचार को कैसे रोका जा सकता है?
  • मीडिया में दलित और वनवासी को प्रायः हिंदू से अलग क्यों दिखाया जाता है?
  • संघ में महिलाओं की अलग से शाखा क्यों है और उन्हें मुख्य संगठन में स्थान क्यों नहीं दिया जाता? शाखा में अधिक से अधिक महिलाओं को जोड़ने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं?
  • क्या संघ में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कोई संस्था है?
  • महिलाओं की सहभागिता संघ में अपेक्षाकृत कम है। वे किस प्रकार संघ से जुड़ सकती हैं?
  • संघ का आगामी लक्ष्य क्या है?

 

उत्तर –  विकसित भारत के लिए सबसे पहले हमें देश के लिए जीना-मरना सीखना होगा। मैं बेसिक बता रहा हूं। पॉलिसीज बहुत है। उनका वर्णन करूंगा तो समय बहुत जाएगा। दूसरी बात—उद्यमिता बढ़नी चाहिए। देशभक्ति से देश की सुरक्षा सुनिश्चित होती है और उद्यमिता से देश की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे मजबूत होती है। इसलिए हमें यह करना ही होगा। आज दुनिया में जो कुछ भी बनता है, वह हमारे देश में भी बने—यह सोच अपनानी चाहिए। इन दो बातों पर हमें विशेष जोर देना होगा।

तरुण पीढ़ी की भूमिका

आज की तरुण पीढ़ी में उत्साह है कि वे अपने देश को महान बनाएंगे। उनमें यह सामर्थ्य भी है कि केवल अपने स्वार्थ की न सोचकर देश को भी बड़ा करने का प्रयास करें। यदि उन्हें थोड़ी दिशा दी जाए तो यह कार्य सहज रूप से हो सकता है। इसी से भारत आत्मनिर्भर भी बनेगा और विकसित भी। हमें अपने विचारों के आधार पर अपना विकास मॉडल खड़ा करके चलना चाहिए।

विकास मॉडल और सीख

हम देख रहे हैं कि अर्थव्यवस्था से जुड़े प्रयोगों और नीतियों के क्या-क्या परिणाम सामने आए हैं। इसलिए यदि आगे चलकर किसी को ठोकर लगी है तो हमें उससे सीख लेकर सावधानी बरतनी चाहिए और समय रहते रास्ता थोड़ा बदलना चाहिए। यह तभी होगा जब हम यह सोचेंगे कि हम कौन हैं? हमें कहाँ जाना है? और क्या करना है? उसी आधार पर हमारा विकास मॉडल बनेगा। हमारा अपना मॉडल बहुत अलग है और आज के सभी प्रश्नों का उत्तर देने में सक्षम है।

यह भी पढ़ें – क्या आरक्षण और जातिवाद समाज को तोड़ रहे हैं.?

नीति-निर्माण और पश्चिमी व्यवस्थाएँ

हाँ, अभी हम उतने बड़े स्तर पर उस पर नहीं हैं, लेकिन विचार हो रहा है। कुछ मामलों में एक-दो डिग्री का बदलाव करके आगे बढ़ना होगा। नीति-निर्माण के लिए जिनको जिम्मेदारी दी गई है, उन्हें बहुत ही ध्यान और संयम से रास्ता निकालकर जाना पड़ेगा। धीरे-धीरे, परंतु दृढ़ निश्चय के साथ यह करना होगा।

मीडिया की भूमिका

अब जहाँ तक मीडिया का प्रश्न है—वह ऐसा क्यों करता है, यह प्रश्न मीडिया से पूछना चाहिए। हम तो सबको एक ही मानते हैं, किसी को अलग नहीं मानते, क्योंकि कोई अलग है ही नहीं। भारत में सभी अनादिकाल से साथ रह रहे हैं। जो पहले वनवासी थे, वे ग्रामवासी और फिर नगरवासी हो गए। हजारों वर्षों में कपड़े, देवी-देवता और भाषाएँ भिन्न हो गईं। किसी भी देश के विकास का यह स्वाभाविक परिणाम होता है कि उसमें विविधता उत्पन्न होती है। हमारे यहाँ कभी किसी विविधता को मिटाया नहीं जाता, इसलिए जो विविधता प्राचीन काल से चली आ रही है, वह आज भी विद्यमान है।

यह भी पढ़ें – मंदिर मुक्ति, मथुरा-काशी और भविष्य की तैयारी!

मीडिया को यह समझना चाहिए कि देश को एक दिशा देनी है और संस्कार भी देने हैं। उसी सोच के साथ उसे अपना कार्य करना चाहिए।

संघ में महिलाओं की भूमिका 

महिलाओं के बारे में मैंने बताया है। राष्ट्र सेविका समिति 1936 से कार्यरत है। तभी से यह तय है कि वे वहां शाखाएं चलाएंगी। हमारी शाखाएं पुरुषों के लिए चलेंगी। दोनों संगठन समानांतर रूप से रहेंगे, आपस में मिलेंगे नहीं, लेकिन एक-दूसरे की मदद करेंगे। यदि इसमें कोई परिवर्तन करना होगा तो यह निर्णय राष्ट्र सेविका समिति ही करेगी।

यह भी पढ़ें – अंतरराष्ट्रीय व्यापार अनिवार्य है, लेकिन दबाव में नहीं

जब वे कहेंगी कि अब बदलाव होना चाहिए, तब हम करेंगे। अभी हम उस वचन का पालन कर रहे हैं। वर्तमान में उनकी भी लगभग 10,000 शाखाएं हो गई हैं और 50 से अधिक प्रचारिकाएं सक्रिय हैं। उनका काम भी अच्छी तरह से बढ़ रहा है।

संयुक्त कार्यों में महिलाओं की भूमिका

अन्य सभी कार्यों में पुरुष और महिलाएं मिलकर काम करते हैं, और कई जगह महिलाओं का नेतृत्व भी होता है। संघ के स्वयंसेवकों द्वारा संचालित विविध संगठनों में, जैसे सेवा भारती, वहाँ की अध्यक्ष महिला ही हैं।

परिवार और महिलाओं का अप्रत्यक्ष जुड़ाव

महिला इस रूप में भी संघ से जुड़ी है कि प्रत्येक स्वयंसेवक का घर संघ का घर होता है। इसलिए परिवार की महिलाएं भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संघ से जुड़ी रहती हैं। अनेक महिलाएं हमारी आचार्य-पद्धति को हमारे मुख्य शिक्षक से भी अधिक भली-भांति जानती हैं। कई महिलाएं दर्जनों गीतों और पाठों को कंठस्थ रखती हैं। इस प्रकार उनका योगदान गहरा और निरंतर है।

यह भी पढ़ें – संघ में 3 चीजें छोड़कर सब कुछ बदल सकता है!

महिलाओं के सहयोग से प्रगति

हम उनके सहयोग से ही आगे बढ़ रहे हैं। हम न उन्हें नज़रअंदाज़ कर सकते हैं, न करना चाहते हैं। हमारा उद्देश्य सम्पूर्ण समाज को साथ लेकर चलना है, और उसमें महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

व्यवस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व

हमारी यह भी इच्छा है कि सभी व्यवस्थाओं में महिलाओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो। वास्तव में, संघ की गतिविधियों में भी उनकी सहभागिता कम नहीं है। कई बार वे हमें हमारी भूलें सुधारने के लिए कठोरता से भी मार्गदर्शन करती हैं।

महिलाओं का स्थान और संघ दृष्टिकोण

हम मानते हैं कि महिला हर भूमिका निभा सकती है। हमारे दृष्टिकोण से स्त्री और पुरुष को समान दर्जा प्राप्त है—दोनों परस्पर पूरक हैं। यदि अकेले कुछ करना हो तो किया जा सकता है, लेकिन यदि कुछ बड़ा करना हो तो दोनों का साथ होना आवश्यक है। यही महिलाओं की भूमिका और उनका स्थान है।

यह भी पढ़ें – आज़ादी के आंदोलन में क्या रही संघ की भूमिका..?

हिंदू राष्ट्र की अवधारणा

हिंदू राष्ट्र घोषित करने की आवश्यकता नहीं है। वह पहले से ही है। ऋषि-मुनियों ने इसे राष्ट्र घोषित कर दिया था। हिंदू शब्द आज के समय में किसी अधिकृत घोषणा का मोहताज नहीं है। यह एक सत्य है। इसे मानने से आपका लाभ है, और न मानने से आपका नुकसान होगा। इसे आप आज़मा कर देख सकते हैं।

संघ की सदस्यता प्रक्रिया

संघ की सदस्यता के लिए कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं है। संघ में आने का अर्थ है शाखा में आना।

संघ से जुड़ने के तरीके

इसका एक तरीका यह है कि अपने आस-पास किसी कार्यकर्ता को खोजें। आज भी आपने कुछ चेहरे देखे होंगे—उन्हें ढूंढिए या फिर वेबसाइट पर जाइए। वहां एक विकल्प है—Join RSS। उस पर क्लिक करने से आपको संपर्क सूत्र मिल जाएगा। इसके बाद कार्यकर्ता आपको मार्गदर्शन देंगे।

संघ की गतिविधियों में सहभागिता

संघ और स्वयंसेवकों के इतने सारे कार्य चल रहे हैं, उनमें आप सहभागी हो सकते हैं।

संघ को जानने का सही तरीका

मेरा केवल एक आह्वान है—पढ़ने-सुनने के आधार पर मत जाइए, स्वयं अंदर (शाखा) आकर संघ को देखिए। आपको संघ का अनुभव (feel) प्राप्त होगा। “RSS is a thing to be known by experience”. यह बात हमेशा ध्यान में रखिए।

यह भी पढ़ें – संघ का आदेश सर्वोपरि! : संघ में “रिटायरमेंट” जैसी संकल्पना नहीं
Topics: RSS और मीडियासंघ और महिलाएंआरएसएस का आगामी लक्ष्यहिंदू राष्ट्र RSS विचारविज्ञान भवन RSS कार्यक्रमराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघआरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवतपाञ्चजन्य विशेषभारत 2047 विज़नविकसित भारत 2047आत्मनिर्भर भारत RSS विचारसंघ शताब्दी वर्ष कार्यक्रमRSS women roleमोहन भागवत बयानRSS media statementRSS प्रमुख मोहन भागवत
Shivam Dixit
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अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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