मंदिर मुक्ति, मथुरा-काशी और भविष्य की तैयारी! : जानिए क्यों RSS सरसंघचालक जी ने कहा- संघ अब नहीं लेगा आंदोलनों में भाग!
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मंदिर मुक्ति, मथुरा-काशी और भविष्य की तैयारी! : जानिए क्यों RSS सरसंघचालक जी ने कहा- संघ अब नहीं लेगा आंदोलनों में भाग!

RSS के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने विज्ञान भवन में आयोजित व्याख्यानमाला में लव जिहाद, मंदिर प्रबंधन, मांसाहार प्रतिबंध, काशी-मथुरा विवाद, अंधविश्वास और हिंसा जैसे मुद्दों पर दिया स्पष्ट जबाव

Written byShivam DixitShivam Dixit
Aug 30, 2025, 02:16 am IST
inभारत, संघ @100, दिल्ली

नई दिल्ली । संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के तृतीय और अंतिम दिवस पर ‘जिज्ञासा समाधान’ कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कुछ समसामयिक विषयों को लेकर प्रश्नों के उत्तर दिए।

प्रश्न – क्या संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार मत, पंथ, संप्रदायों के प्रसार के लिए विदेशी धन आना उचित है?

  • क्या लव जिहाद जैसी समस्याओं के विरोध में संघ कोई योजना बना रहा है?
  • हिंदू मंदिरों को पुनः प्राप्त करने के लिए क्या प्रयास होने चाहिए?
  • माननीय भागवत जी ने कहा था कि भोजन का धर्म से कोई संबंध नहीं है, परंतु कुछ भाजपा शासित राज्यों में त्योहारों के समय मांस बिक्री पर प्रतिबंध लगाया जाता है। क्या आरएसएस ऐसे प्रतिबंधों का समर्थन करता है?
  • आपने सार्वजनिक रूप से कहा था कि राम मंदिर बनाने का आग्रह हमारा था और हमने इस आंदोलन को समर्थन दिया। काशी और मथुरा के विषय में संघ की क्या योजना है?
  • अंधविश्वास को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से दूर करने के लिए संघ क्या कर रहा है?
  • ऑपरेशन सिंदूर को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए थे कि भारत खुलकर साथ खड़ा दिखाई नहीं दिया। इस पर संघ की क्या सोच है?
  • पिछले कुछ वर्षों से अनेक स्तरों पर हिंसा बढ़ रही है। आंदोलनों में हिंसक प्रवृत्ति दिखाई देती है। ऐसा लगता है मानो किसी युद्ध की तैयारी हो रही हो। भविष्य में हिंसा बढ़ सकती है—इस पर संघ का क्या दृष्टिकोण है?

 

उत्तर – मत, पंथ, संप्रदायों के लिए विदेश से धन आना यदि सेवा कार्यों के लिए है तो कोई आपत्ति नहीं। लेकिन वह धन केवल उसी उद्देश्य के लिए उपयोग होना चाहिए, जिसके लिए आया है। समस्या तब खड़ी होती है जब यह धन मतांतरण के लिए खर्च किया जाता है। ऐसे में उस पर रोक लगाना आवश्यक हो जाता है। मेरा मानना है कि विदेश से आने वाले किसी भी प्रकार के धन की सख्त जाँच (scrutiny) होनी चाहिए और जहाँ आवश्यक हो, वहाँ प्रतिबंध भी होना चाहिए। यह काम सरकार का है।

हिंदू मंदिरों की वर्तमान स्थिति

जहाँ तक हिंदू मंदिरों का प्रश्न है, पहला काम यह होना चाहिए कि मंदिर सरकार के अधीन न रहें। अनेक मंदिर निजी ट्रस्टों के अधीन हैं, कुछ सरकार के अधीन भी हैं। कुछ निजी मंदिर और ट्रस्ट बहुत अच्छे से चलते हैं, वहीं कुछ मंदिरों में अव्यवस्था है। यही स्थिति सरकार द्वारा अधिगृहित मंदिरों की भी है— कुछ ठीक चलते हैं, तो कुछ में लूट और अव्यवस्था है।

यह भी पढ़ें – संघ में “रिटायरमेंट” जैसी संकल्पना नहीं

मंदिर प्रबंधन हेतु व्यवस्था

इसलिए पहले व्यवस्था को ठीक करना आवश्यक है। इसके लिए आवश्यक है कि मंदिरों के संचालन हेतु भक्तों, स्थानीय नागरिकों और संबंधित पंथ/संप्रदाय के धर्माचार्यों की एक प्रणाली बने। यह प्रणाली स्थानीय स्तर, जिला स्तर, प्रांतीय स्तर और अखिल भारतीय स्तर पर होनी चाहिए। ताकि जब न्यायालय यह कहे कि मंदिर सरकार से स्वतंत्र किए जा रहे हैं, तो उन्हें संभालने के लिए सक्षम व्यवस्था तैयार हो। ऐसी तैयारियाँ चल रही हैं। धीरे-धीरे यह कार्य होगा—यही उचित दिशा है।

भोजन और Religion का संबंध

भोजन का रिलिजन से कोई संबंध नहीं है। लेकिन व्रत के दिनों में न खाना, पर्व-त्योहारों पर शाकाहारी रहना—ऐसा लोग करते हैं। उस समय यदि हमारे घर के सामने कोई मांसाहार दिखाई दे तो भावनाओं को ठेस पहुँच सकती है। यह दो-तीन दिन की ही बात होती है। ऐसे समय में समझदारी दिखाते हुए परहेज करना चाहिए, ताकि कानून बनाने की नौबत ही न आए।

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समझदारी का महत्व

अब यह समझदारी अक्सर दिखाई नहीं देती। कौन क्या खाता है, इससे मेरी भावना आहत होने का कोई कारण नहीं है। हाँ, विशेष प्रसंगों (अवसरों) पर जब सब लोग एकसाथ धार्मिक भावना से जुड़े हों, तो उस संवेदनशीलता को समझते हुए हमें स्वयं तय करना चाहिए कि इस समय ऐसा आचरण न करें।

कानून और प्रतिबंध की आवश्यकता

जब समझदारी नहीं होती, तभी कानून या प्रतिबंध लगाने पड़ते हैं। वैसे उन कानूनों और प्रतिबंधों का उद्देश्य “यह खाना-यह न खाना” तय करना नहीं होता, बल्कि यह होता है कि भावनाओं के टकराव से झगड़े न हों। इस दृष्टि से यह उचित ही है।

दोनों पक्षों की संवेदनशीलता

परंतु बेहतर यही है कि समझदारी दोनों ओर से आए। मांसाहारी लोग तो रोज मांस खाते हैं, ऐसा नहीं है, और शाकाहारी लोग भी रोज मांसाहारियों को खाते हुए देखते हैं, ऐसा ही नहीं है। लेकिन विशेष अवसरों और विशेष कालखंडों में संवेदनशीलता दिखाना आवश्यक है। ऐसा हुआ तो कोई समस्या नहीं रहेगी।

संघ और आंदोलनों में भागीदारी

संघ आंदोलन में सामान्यतः भाग नहीं लेता। एकमात्र आंदोलन राममंदिर का था, जिसमें हम जुड़े। इसलिए उसे हम अंत तक साथ लेकर गए। परंतु अब अन्य आंदोलनों में संघ नहीं जाएगा।

काशी, मथुरा और अयोध्या का महत्व

हाँ, हिंदू मानस में काशी, मथुरा और अयोध्या—इन तीनों का विशेष महत्व है। अयोध्या और मथुरा जन्मभूमि हैं और काशी निवासस्थान है। इसलिए हिंदू समाज इसका आग्रह करेगा। संस्कृति और समाज की दृष्टि से संघ इस आंदोलन में नहीं जाएगा, लेकिन संघ के स्वयंसेवक, जो स्वयं हिंदू हैं, उसमें भाग ले सकते हैं।

इन तीन स्थानों को छोड़कर मैं कहता हूँ कि हर जगह मंदिर ढूँढ़ना, हर जगह शिवलिंग खोजना—यह उचित नहीं है। यदि हिंदू संगठन का प्रमुख यह कह रहा है और स्वयंसेवक भी इस पर प्रश्न पूछते रहते हैं, तो सामने से इतना तो होना ही चाहिए कि चलो इन 3 ही की तो बात है ले लो, यह भाईचारे की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

संघ में अंधविश्वास का स्थान नहीं

संघ में अंधविश्वास का कोई स्थान नहीं है। संघ में वैज्ञानिक दृष्टि को जोड़ा जाता है और स्वयंसेवकों को उसी दिशा में प्रेरित किया जाता है। कोई कर्मकांड संघ की शाखा का अंग नहीं है। जहाँ किसी को जैसा विश्वास है, वह व्यक्तिगत रूप से कर सकता है, परंतु संघ कर्मकांडों में सम्मिलित नहीं होता। आपने देखा होगा कि संघ में केवल पुष्पांजलि अथवा भारत माता की पूजा होती है।

यह भी पढ़ें – क्या विदेशों में होता है संघ कार्य.?

संघ में जितना संस्कृत मंत्र किए जाते हैं, वह केवल भारत माता के लिए ही कहे जाते हैं। संघ की प्रार्थना में भी सबसे पहले भारत माता है। उसके बाद ‘प्रभु’। ‘प्रभु’ से आशय किसी विशेष देवता—राम, कृष्ण या बुद्ध—से नहीं है, बल्कि सर्वत्र प्रभु प्रभु की मान्यता है। जो सर्वश्रेष्ठ है वही है। हम मनुष्य की भावनाओं का सम्मान करते हैं।

अपनी तैयारी 

जहाँ तक हिंसा का प्रश्न है—हाँ, आजकल आंदोलन हिंसक हो रहे हैं और युद्ध जैसी तैयारियाँ दिखाई देती हैं। इतनी दूर नहीं जाना चाहिए। विश्व और भारत में ऐसी शक्तियाँ हैं जो इस प्रकार के झगड़े चाहती हैं। यदि हम अति-प्रतिक्रिया करेंगे, तो परिणाम अच्छे नहीं होंगे। हमें संतुलित और सोच-समझकर तैयारी करनी चाहिए।

यह भी पढ़ें – संघ और सिख परंपराओं की समानता!

लेकिन मन में डर के कारण द्वेष या दुश्मनी कभी नहीं आनी चाहिए। संघ पर जब-जब प्रतिबंध लगा, हर बार संघ के सरसंघचालक ने यही कहा। पहले प्रतिबंध के बाद गुरुजी ने कहा था कि “दांतों ने अपनी ही जुबान को काट लिया, इसलिए कोई अपने दांतों को गिरता नहीं है”। और आपातकाल के बाद बालासाहब ने कहा—“Forget and Forgive।” यही ध्यान में रखना चाहिए, तभी सब ठीक रहेगा।

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अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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