नई दिल्ली । संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के तृतीय और अंतिम दिवस पर ‘जिज्ञासा समाधान’ कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने संघ से जुडी जिज्ञासाओं से जुड़े प्रश्नों के उत्तर दिए।
प्रश्न – शताब्दी की दीर्घ यात्रा में कभी किसी गृहस्थ स्वयंसेवक को महासचिव या सरसंघचालक नहीं बनाया गया। नए क्षितिज का संकेत देते हुए क्या हमें यह कल्पना करनी चाहिए कि भविष्य में कोई वरिष्ठ गृहस्थ स्वयंसेवक महासचिव की कुर्सी पर बैठकर व्याख्यान देगा?
- क्या संघ को लगता है कि 75 वर्ष की आयु के बाद राजनेताओं को भी पद छोड़ देना चाहिए?
- कुछ समय पूर्व आपने मोरोपंत पिंगले जी के कथन का हवाला देते हुए कहा था कि “75 साल किराए पर शाल पहनने का मतलब है—अब आपकी उम्र आ गई है।”
- क्या यह संन्यास की तरफ इशारा था? क्या पाँच वर्ष के लिए चुने गए व्यक्ति पर भी 75 वर्ष की परंपरा लागू होती है?
उत्तर – आपकी जानकारी थोड़ी अधूरी है। लंबे समय तक, और संघ के सबसे कठिन कालखंड में, श्रीमान भैयाजी दाणी—जो एक उत्कृष्ट किसान और भरी-पूरी गृहस्थी वाले व्यक्ति थे—संघ के सरकार्यवाह रहे।
इससे स्पष्ट है कि गृहस्थ होकर भी यह दायित्व निभाया जा सकता है। संघ में यह कोई नियम नहीं है कि गृहस्थ इसे नहीं कर सकता। हाँ, यहाँ आने के बाद पूर्ण समय देना आवश्यक होता है।
पूर्ण समय की आवश्यकता और गृहस्थी का संतुलन
सामान्य गृहस्थ अपनी गृहस्थी सँभालते हुए इतना समय नहीं दे पाते। लेकिन संघ की अपेक्षा यही रहती है कि जो भी स्वयंसेवक काम करे, वह अपने परिवार और गृहस्थी को भी अच्छी तरह सँभाल ले। भैयाजी दाणी की स्थिति ऐसी थी कि उनका परिवार सुचारु रूप से चल रहा था और गृहस्थी किसी अन्य के जिम्मे सौंपकर वे संघ-कार्य हेतु घूम सकते थे। इसलिए वे सरकार्यवाह बने।
आज भी, मेरे जितना (या उससे भी अधिक) भाषण देने वाले हमारे अनिल जी गृहस्थ ही हैं। इसी प्रकार हमारे अखिल भारतीय सह-संपर्क प्रमुख भारत भूषण जी भी गृहस्थ हैं।
संघ में हमारे पूर्णकालिक प्रचारक लगभग 3,500 हैं। लेकिन कार्यकर्ता- जो छोटे-बड़े दायित्वों में जुड़े हुए हैं- उनकी संख्या पाँच से सात लाख तक पहुँचती है। यानी हम प्रचारक अल्पसंख्यक हैं। परंतु चूँकि हम पूर्णकालिक उपलब्ध रहते हैं और गृहस्थी का बोझ नहीं होता, इसलिए अधिक कार्यभार हमारे कंधों पर आ जाता है।
गृहस्थ और प्रचारक का आपसी सहयोग
आप यह समझिए—गृहस्थ लोग अपने सर का बोझ हमें देकर हमको पीछे से चला रहे हैं। बाज़ार उन्हें जाना होता है, लेकिन माल हमारे कंधे पर होता है। यानी हम उनके मजदूर की तरह हैं। संघ एक बड़ा विचित्र संगठन है। इसकी वास्तविकता भीतर (संघ में) आकर ही समझी जा सकती है।
75 वर्ष और मोरोपंत जी का हास्य
बाकी रही 75 वर्ष की बात, तो मैंने मोरोपंत जी को उद्धृत किया था। वे बहुत ही मजाकिया स्वभाव के व्यक्ति थे। तो उन्होंने एक बार कहा- “75 वर्ष की आयु में यदि कोई व्यक्ति किराए की शॉल ओढ़कर मंच पर बैठता है तो उसके लिए मंच पर बैठना और वस्त्रों की मर्यादा बनाए रखना कठिन हो जाता है।”
शेषाद्रि जी और शॉल का प्रसंग
एक बार अखिल भारतीय कार्यकर्ता शिविर में शेषाद्रि जी को शॉल दी गई और उनसे कुछ कहने का आग्रह किया गया। तब उन्होंने बड़े हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा कि “जब आप लोगों को शॉल दी जाती है तो उसका अर्थ है कि अब आपका काम पूरा हुआ, आप विश्राम कीजिए। शॉल का अर्थ है—अब जीवन की संध्या का समय है।”
लेकिन उन्होंने कभी नहीं कहा कि “मैं रिटायर हो जाऊँगा” या “संघ से कोई व्यक्ति रिटायर होता है।”
संघ की परंपरा : जीवनभर तत्परता
संघ में तो स्थिति बिल्कुल अलग है। यहाँ स्वयंसेवक जीवनभर स्वयंसेवक ही रहता है—चाहे उसकी इच्छा हो या न हो। यदि मैं बीमार पड़ूँ या वृद्ध हो जाऊँ, तो भी शाखा जाकर बैठ सकता हूँ। संघ में कोई “रिटायरमेंट बेनिफिट्स” नहीं है, न ही किसी पद के लिए ऐसी शर्त है। यहाँ कोई यह कहकर नहीं आता कि “मैं यह करूँगा”—बल्कि संघ जो कहे, वही करना पड़ता है। इसीलिए संघ में “रिटायरमेंट” जैसी कोई संकल्पना नहीं है।
मैं अभी सरसंघचालक हूँ तो इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल मैं ही यह दायित्व निभा सकता हूँ। कल यदि संघ चाहे तो कोई अन्य स्वयंसेवक इस दायित्व को निभाएगा। यह कोई व्यक्तिगत पद नहीं है, बल्कि परंपरा और संगठन की धरोहर है। संघ का प्रत्येक दायित्व मूल्यवान है और हर योगदान अपने स्थान पर आदरणीय है।
इसलिए यहां प्रश्न “रिटायरमेंट का” नहीं है। जब भी संघ चाहेगा, मैं या कोई भी अन्य स्वयंसेवक तैयार रहेगा—और जीवनभर तैयार रहना ही संघ की परंपरा है। यही इसकी विशेषता है।
प्रश्न – पूरा भारत महाकुंभ में उमड़ा, परन्तु आप इससे दूर रहे, ऐसा क्यों.?
अब रही कुंभ की बात—पूरा भारत कुंभ में उमड़ पड़ा था। पर मैं वहाँ नहीं गया। कारण यह था कि हमारे कार्यकर्ताओं ने तय किया था कि उस समय बहुत भीड़ होगी और मेरे अन्य कार्यक्रमों पर उसका प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने कहा कि आप मत आइए। मैंने कहा—“इतना बड़ा पुण्य सब लोग ले रहे हैं और मुझे आप वंचित कर रहे हैं।”
पर संघ का निर्णय था, तो मुझे मानना पड़ा। मैंने कहा- कम से कम मेरे लिए महाकुंभ का जल भेज दीजिए। कृष्णगोपाल जी ने कलकत्ता में मुझे कुंभ का जल भेजा और मौनी अमावस्या के दिन मैंने उसी जल से स्नान किया। लेकिन वास्तविक स्नान का पुण्य मुझसे छूट गया। अब उसके लिए मैं कुछ नहीं कर सकता। संघ यदि मुझे कहे कि नरक में जाओ, तो मैं वहाँ भी जाऊँगा।
















